Author Topic: Satire on various Social Issues - सामाजिक एवं विकास के मुद्दे और हास्य व्यंग्य  (Read 99716 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बहुत सही लिखा सर आपने ....

पत्रकार को अपने मर्यादा में रहते हुए सचाई या बुराई के बारे में लिखना चाहिए!

            चतुर पत्रकारों की  चारणशैली में चीफ की चमचागिरी
                                       भीष्म कुकरेती
                           विद्वानों, लेखकों का चीफ /उच्च पदस्त की चारण शैली में चरण वन्दन करना , चमचागिरी करना, चरनबरदार करने   का चलन प्रचलन  सदियों पुराना    है .
  आजकल पत्रकार भी चुगलाते हैं. . इन चमचा पत्रकारों के लिए उच्च्पदस्त  के लिए चहचहाना एक चंग है एक उत्सव है .चमचा पत्रकार उच्चपदस्त के चंकुर को चलाता है और उस बड़े आदमी को अपने कंधों पर चौथेपन में भी  चंक्रमण (घुमाना )  भी करता है .चमचागिरी  की बात है तो यह सब चलता है ..इसका चलन भी है ही.
                     अपने चंग  की खातिर चमचा -चारण पत्रकार चंगला रागिनी में चंग बजाकर बड़े आदमी के चंग पर चढ़ता है . चमचा पत्रकार चंगा (निर्मल)  चंगा (बच्चों का खेल) नही खेलता. किन्तु चंट पत्रकार चकली जैसे खेल खेलता है.
चतुर पत्रकार चंट होता है वह चारणशैली की चोंच या चुन्चपुट  से बड़े आदमी को अपने चंगुल फंसाने की कोशिश करता है चारण शैली के शब्द चमचे पत्रकार के लिए चंगेरी होती हैं .
            चतुर चमचा पत्रकार चंचरीक बन चंचपुट , चंचेरी  ताल में बिन होली के भी चीफमिनिस्टर की चमचागिरी करता है .
                      चालाक चमचा पत्रकार स्वयम  चंचल नही होता है अपितु चीफ को चंचल बनाता है. चारणशैली, चिकने चुपड़े शब्द  चमचे-चुगलखोर पत्रकारों के लिए चीफ को खुश करने के लिए चंचलास्य का  काम करते हैं.
                        चमचे पत्रकार द्वारा प्रयोगित   प्रशंसा  के शब्द चीफ को फँसाने के लिए जहां चंगेरी  का काम करते हैं वहां विरोधी पत्रकार के लिए व चीफ के विरोधी हेतु चंचा का काम करते हैं.
       चतुर , चालाक  चमचा पत्रकार अपनी  चोंच, चंचु, चंचुका से चीफ के विरोधी पर चंडत्व से  , चंडकर  शब्दों से , चंडासु  बनकर , चंडालिता पूर्बक  चंहुदिसा  से चढ़ाई करता है जिससे चीफ के विरोधियों को चतरभंग   का रोग लग जाय और चीफ खुश हो जाय .और चमचा पत्रकार चकाचक हो जाय
   चीफमिनिस्टर  के चमचे पत्रकार की चेष्ठा  चक्षु चंडालपक्षी जैसी होती हैं जो चीफ मिनिस्टर के चदनगोह  रूपी किचन कबिनेट  के चिंतावेश्म  में रहकर चांदी/चाट  की चाह  में लगा रहता है 
       चमचा पत्रकार अपने विरोधी पत्रकार को कभी चंडू (चुहा )  कहता है कभी चणडु (बंदर ) कहता है और अपनेआप चीफमिनिस्टर  का चम्बरढार बन कर चोबदारी कर चहकता रहता  है
  चमचा  पत्रकार   चीफमिनिस्टर के काम से चीफ को  चंद्रकांत नाम देता है और उसी काम के लिए विरोधी नेता को चखिया नाम देता है . जहां चीफ मिनिस्टर का चमचा पत्रकार अपने को चन्द्र जैसा पवित्र कहता है तो दुसरे पत्रकार को उसी गुण के लिए चबाई पत्रकार कहता है
 अपने आप चीफ मिनिस्टर का चमसा , चमसी  पत्रकार विरोधी नेता का चरित्रहनन करने में चोटी पर रहता है पर जब कोई दूसरा पत्रकार चीफ  मिनिस्टर के विरुद्ध छापता है तो चापलूस  पत्रकार उस पत्रकार को चरित्र हनन ना करने की सलाह देने में शर्माता भी नही है .
  चाप्लोस पत्रकार जब चीफ मिनिस्टर की चापलूसी में चरण बंदना करता है तो उसे वह चर्चा नाम देता  है पर कोई दूसरा ऐसा करे तो उसे वह चूहे का च्यूंचाट  नाम देता है,  चलकूट  नाम दे डालता है
            चमचा पत्रकार अपने कृत्य को चारटिका  नाम देता है तो उससे कर्म के लिए दुसरे को चाली नाम दे देता है
  चापलूस पत्रकार चीफ मिनिस्टर के चौक में चरता रहता है पर नही चाहता  क़ि कोई और चेहता चीफ के चौक में चहलकदमी करे कोई  और चीफ का चेहता  बने  .. चापलूस  पत्रकार दुसरे चमचे पत्रकार को  चर्मदंड से  चोट देकर , चांटा मारकर, चांप कर  चलन्तू   कर देता है.
 चमचा पत्रकार चालाक होता है वह भी नारायण दत्त तिवारी की तरह संजय गांधी जैसे चीफ के  चरणपादुक  उठाता है पर वह यह चारण वृति खुलेआम हवाई अड्डे पर नही करता चुपके  से करता है चमचा पत्रकार भी चीफ की चिलम भरता है पर उसे गौरव शाली  पत्रकारिता का चोला पहना दिया जाता है चापलूसी की चिलम पर पत्रकारिता की चादर चढाई  जाती है चंट जो होते हैं ये चकचूंदरे  पत्रकार
पर मै यह भी कह सकता हूँ क़ि यदि पत्रकार चापलूसी  ना करें तो घर कैसे चलाएंगे ?
                       
       
         
 
   
     
 
                           
       
                     
 
 
 


Jugraj Rayan
Regards
Bhishma Kukreti

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फोन

 अनिल कुमार शैलानी

घार ऐजा बेटा महेन्द्रा
बांज प्वड़ग्या जमन फरि
छुईं लगाणक बि प्वड़णा छिन पैसा
घार ऐजा बेटा महेन्द्रा
रूप्यूक नि क्वी सार
इक्वलि आणि छीं बार बार
चिठ्ठी पत्रीक नीच सार
फोन ह्वेगि घार घार
अफमा नीच लाल पैसा
घार ऐजा बेटा महेन्द्रा
पुंगड़ियू°क नीच क्वी सार
खाण पीणक बि बुरा हाल
उनि दुइयों बुढेंदा हाल
नि रैग्या गौमा आर सार
अपड़ा बेटा खाली खीसा
घार ऐजा बेटा महेन्द्रा।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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लब मैरिज

  कुलानन्द घनशाला 
 
जिठाणा कु भैसाब, सासू कू मांजी,
मेरू नौ लेकी भट्योन्दी च,
अपणा बुबा कु कुजाणी क्या ब्वलदि
पर मेरा बुबा कु पापा बोलणी च।
नांगा मुण्ड मां पल्लू धनु, धोती पैरण नि आंदी,
टी शर्ट-जींस पैरण मा जरा भी नी शरमांदी
झुकी सेवा लगौण मा कमर चसक पड़ जान्दी,
गाली़ अर गिच्चा चलौण मा द्वी हाथ अगाड़ी जान्दी।
बिना सौ सलाह का जब मर्जी मैत भाजी जान्दी,
फिक्वाˇ सी घ्ुामिघामी, ब्यखुनी हाथ हल्कैकी ऐ जान्दी,
काम काज कनु बुनै त जन लचुड़ी आई हो, टुप से जान्दी।
अर पकायूं खाणू सबसी पैली गाडी खै जान्दी
जरा कुछ ब्वलणे त बिना बाजौं का ही नचण बैठी जान्दी,
मां-बैणी गाल़-घात देकी धौ-धौ कै घिरे जान्दी।
गाड़-फाˇ , डांडा-फांस-जैर खाण की धमकी तक दे जान्दी,
कि दहेज अर वीं निर्भागी लब मैरिज की भी याद दिलै जान्दी
मिन बोली चुची ब्यो त ब्यो ही च,
दुनिया से बाकी बात थ्वींड़ी हांेयी च,
वींन गुरौं सी ठप-ठपाक मारी खबरदार,
ब्यो नी हमारी त लब मैरिज हांेई च।
शुभ दिन शुभ घड़ी देखी हाथ जोड़ी बोली मिन,
चुची नारी त देवी कु रूप होन्दु
वीन जुता की सी ठक्क चोट मारी,
हां नर भी त वींकु भगत होन्दू।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दुन्या


 साधोसिंह नेगी
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ईं दुन्या का मेला मा,
सुधि फुक्यंा ठेला मां,
कैन बूति कैन बाई
अर क्वी, धाण कैरि गे

खेलियूं मां मिसैकि हमतैं
सट्ट-वो लीगीं थौला मा°,
गौड़ि- भैंसी हमरि लैन्दी,
वू°थै घ्यू कि कमोˇि चैन्दी,
कट्वा कुक्कुरू° घ्यू खवैकि,
हम बैठ्या° छौं छैला मा।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सरकारि तेरैं कु भात

  वीरेन्द्र डंगवाल ‘पार्थ’ 
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हे छोरा किलै नि होणू टोटकू पार घंटी बजिगि
इसकूल कि
खाणू किलै नि छ देणि
भात न पकाई मिन अबि
इसकूलमि खै
पकण लग्यंू पार
ज बे जा मार फरबट्टी
फंडु भात लग खा इसकूलम
पढ़ौड़ लिखौड़ त छा नि मास्टर्याणौन
ए दिदि
क्य छा जी होर बोल्णा सुबेरि
क्य नि सकि बल
मास्टर्याणिन लिखिक?
ए लठ्यालि क्य छ... बल!
ए छोरि सिंगार....सिंगार
कनि पड़ि स्य जू तिन लिखि नि सकि
बै... तनि मास्टर्याणौ छै त
हमि छां खूब
क्वी हमरा घास-पातम
नि निकालि सकदू मीन-मेख
सुदि लेणि छन तनखा?
हम तैं बोलू क्वी घास काटणक
बोला कैकि पोंगड़ी कन छ बांजि
फंडै बैठ बे...
छ्वीं न यख
क्य ∫वे बे...
साला कू खोपरू द्यौलू फोड़िक
अबे द्वी बैठा फंडै साले भाटड़ा

मुक त कबि धोंदू नि
आंखा सि छन भर्यां पागन
अर भिंडि बण्यां बामण।
क्य होंदु छुयांन
तेरू बुबा बि मास्टर
मेरू बुबा बि मास्टर
अर तैकू बुबा बि मास्टर
सब्बि बराबर छन।
कैका थौकला परै लगि लात
अर तब्बि..... खच्चाक
ल्या फुटिगि खोपरि
लगिगि खोपरा उंद पणद्यारि
इसकूलम पड़ै लिखै क बदला
बैठिगि पंचैत
यख देखा यू फोड़ियालि
मेरा छोरा कु बरमंड
बांजा पड्यान त्यंूकू सरकारि भात।
किलै मारि बे ढूंग्गू
तैन मेरू थौकलू छ्वीं
हां भै स्यू फुंडै नि बैठि सकदू छौ
किलै बैठण छौ बैन फुंडै
तुम परै सपचरू बैठिगि छुयांन
खस्या बामण
सबुन जाणि तुमुन हथकड्यौं परै
मि परदान छौं गौं कु
तब नि बोल्यान कि
यनि अमिथ्या करियालि
अपणा छोरौं तैं समझै रक्खा

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आंदोलनकारी राजधानी मा
  ललित केशवान
================
∫य भै कन झकमरै ∫वेया, हमारी राजधानी मा।
दभै अब क्वी बि नी सुणण्यां, हमारी राजधानी मा।।
हमूं तैं रात प्वड़ि ग्याई , वूंकि राति अपणी छन।
अज्यंू तैं रात नि खूले, हमारी राजधानी मा।।
∫य रां क्वी घाम लग गेने, इने बल घाम लगणा छन
अज्यूं तैं घाम नी आए, हमारी राजधानी मा
ज्यों पर छै नजर सबकी,अब वी लोग ब्वन्ना छन।।
झणि कैकी नजर लगगे, हम पर राजधानी मा।
छ्वट-छवट् डाम धारी बड़-बड़ा डाम बणना छन।।
छिः भै कना डाम प्वड़ना छन हम पर राजधानी मा।
हमारी खैरि सूणी की,वंू बी खैरि ऐ ग्याई।।
अब त खैर नी कैकी , हमारी राजधानी मा।
हमूं तैं दाड़ि किटनी ज्योंन, वंूकि दाड़ नी खूली।।
खुल जांदी त हडगी बी नि मिल्दी राजधानी मा।
वु पेटम कुछ बि नी रखदा, वु हैंकाअ पेट जब्कौंदन।
यू जब्का जब्कयों म प्वड़ने ,धब्का राजधानी मा।।
हमन द्वी आ°खा झपकैने, वूनं एकी झपकाये।
यू झप्का झपक्यों म, झप्वडे़ग्यां हम राजधानी मा।।
मनखि मनस्वाग ह्वै गैने, यु सूणी वो बिफिर गैनंे।
वु हमक्वी बाघ बण गेने ,हमारी राजधानी मा।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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छिटगा

 शान्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’
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सुपिन्या

सुबेर बड़ा बणाणा सुपिन्या दिखैनी जौंन
रात अंदेरा मा लिजैकी लूछ्याली तौंन।

गुरौ

अब का लोग गुरौ देखी डरणा नि छन
जब बिटी ≈ंथै ≈परी दूध पिलौणा छन।

तीस

वैकु गुस्सा तब बिटी कम ∫वैगी
जब हैंकै मजबूरी वैकी समझ मा ऐगी।

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देवतो मा फरक

( लीलानन्द रतूड़ी)

स्वर्ग का देवता त् बस्
भोगा कि बास हि बास सुंघदन्
खाणु त् वेतैं हम तुम ही खान्दन
पर, विकास का देवता
मथि बटि अया° भोग तैं
खाणु कु त् अ∂फु खै जान्दन्
सुंघणकु, हम-तुम तैं दे जान्दन्।

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हमर ख्याल भि कर्या°

 आर० डी० शास्त्री 

हैंसा भाग्यों हैसा जौंक दांत पाटि छन
तुमरा त रोटि खाणकु जुगाड़ भि छन
हमत् पैलकि ख्वˇा छवा°
हमर नजर तुम फरि छन
दिदौं हमर ख्याल भि कर्या°
हम त् पेटक आ°सु पेटि घुटणंा छवंा
न हैंसि सकदा न र्वै सकदा
दगणम किदोˇो सि हम भी खैंचणा छवां
पर क्यकन्न हम तुम देखि हैंसणा छवां
उनत् सब्या हम देखि खू°कार बंण्या छन
दुन्या हम देखि गारा पिसणी च
पर हम त चौपट खाˇम् पैलि बैठ्या° छवां।

Anil Arya / अनिल आर्य

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गों बिगाड़ी  सभापति लि
दियाप्त बिगाड़ी अगर्बति लि

चहा बिगाड़ी चाहापति लि 
देश बिगाड़ी राष्ट्रपति लि :-X

 

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