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Joshimath,one of the four cardinal institutions, Adi Shankarachary,जोशीमठ

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, October 25, 2009, 08:30:59 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


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नीति घाटी,जोशीमठ

नीति घाटी कभी तिब्बती व्यापारिक पथ का व्यस्त स्थल था और यहां के वासी भोटिया, मरचा एवं तोलचा आदि उन्नतशील व्यापारी थे। इस घाटी से कैलास मानसरोवर के प्रवेश का एक अन्य वैकल्पिक रास्ता निकलता था, जो कुछ लोगों के अनुसार सर्वाधिक सहज था। इसलिए सीमा बंद हो जाना इस क्षेत्र एवं यहां के लोगों के लिए एक बड़ा झटका था जिसने उनके जीवन, जीवन शैली तथा जीविका को प्रभावित किया।



नीति घाटी विश्वप्रसिद्ध पर्वतीय नंदादेवी पक्षी-विहार का प्रवेश द्वार भी है। आज यह यूनेस्को का विश्व-विरासत स्थल है, जिसे नंदादेवी जैविक संरक्षण के नाम जानते हैं जो पर्यावरणीय जैविक विविधता एवं सांस्कृतिक परंपराओं का अलौकिक खजाना है। यहां के एक गांव लाटा में नंदा देवी को समर्पित एक पुराना मंदिर भी है। भारत के इस भाग के अंतिम गांव नीति में पहुंच की एक सड़क है।

यह जानना महत्त्वपूर्ण होगा कि वर्ष 1970 के दशक में वनों के संरक्षण के लिए लोगों के अलौकिक जागरण का चिपको आंदोलन का केंद्र लाटा गांव तथा पड़ोस का रेनी गांव था। चिपको आंदोलन लोगों के संरक्षण जागरूकता का प्रतीक था जिसने लोगों में पर्यावरण के प्रति रूचि तथा चौतरफा जागरूकता पैदा की जिसके परिणामस्वरूप हिमालयी पर्यावरण एवं विकास की नई नीति निरूपण में आया। इसने हिमालय के जंगलों में हरे पेड़ों को काटने से बचाया जो समुद्र तल से 1,500 मीटर ऊंचाई पर थे।

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औली,जोशीमठ

जोशीमठ से सड़क द्वारा 16 किलोमीटरसमुद्र तल से 3,000 मीटर ऊंचाई पर औली का बुगियाल जोशीमठ से सड़क द्वारा 16 किलोमीटर दूर तथा पैदल 8 किलोमीटर दूर है तथा रज्जुपथ (रोप 22वे) से मिनट की दूरी पर है, इस प्रत्येक यात्रा में एक अनुपम एवं उन्नत अनुभव प्राप्त होता है।
गर्मी तथा बरसात में औली से गोरसन तक पैदल यात्रा की जा सकती है और यहां से कुआरी रास्ते तक और इस पथ पर हिमालयी पशु-पक्षियों से भरपूर तथा ढलानों पर ऊंचे पेड़-पौधे दिखाई देते हैं।



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वृद्ध-बदरी,जोशीमठ



जोशीमठ से 8 किलोमीटर दूर।वृद्ध बदरी या पुराना बदरी भगवान विष्णु को समर्पित प्राचीन मंदिर गढ़वाल के पंच बद्रियों में से एक है, मुख्य सड़क पर मंदिर द्वार के नीचे आधा किलोमीटर पैदल जाने पर ऊनीमठ गांव है। इसे वृद्ध बद्री कहा जाता है क्योंकि भगवान विष्णु वृद्ध स्वरूप में यहां नारद के सम्मुख प्रकट हुए थे।

एक छोटे शांत गांव में एक विशाल बरगद के पेड़ की छाया में मंदिर स्थित है। यह स्पष्टत: एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण कत्यूरी शैली में हुआ है। यह एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है जो इस बात से प्रमाणित होता है कि कभी यहां का प्रबंधन दक्षिण भारत के एक रावल के हाथों था।

आजकल यह मंदिर बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की देखरेख में है, पर यहां के पुजारी लक्ष्मी प्रसाद त्रिपाठी जिनका परिवार पीढ़ियों से मंदिर का प्रभारी रहा है, के अनुसार मंदिर की देखभाल वास्तव में यहां के 10-12 पुजारियों के परिवारों तथा स्थानीय लोगों द्वारा ही होता है।

कई बार भगवान विष्णु की सुंदर कमलरूपी शालीग्राम की प्रतिमा की चोरी की गयी, पर उसे फिर पा लिया गया। मूर्ति की सुरक्षा के लिये अभी स्वयं पुजारी ने गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर लोहे का एक घेरा डाल दिया है।पास ही एक अन्य मंदिर भी है, पर अंदर की प्रतिमा गायब है।

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जोशीमठ शहर



जोशीमठ में प्रवेश करते ही आपके सामने सड़क के किनारे एक छोटा झरना जोगी झरना आता है। इसे जोगी झरना इसलिये कहा जाता है क्योंकि कई योगी एवं साधु झील के ठंडे जल में यहां स्नान करने के लिये रूकते हैं।

जोशीमठ के संकडी मुख्य सड़क तथा प्रमुख बाजार का निर्माण निश्चय ही आज के भारी आवाजाही के लिये नहीं हुआ था। तीर्थयात्रियों एवं यात्रियों से लदे विशाल पर्यटक बसें, गाड़ियां सभी प्रकार एवं आकार की कारें बद्रीनाथ की यात्रा पर यहां तांता बांध देते हैं तथा कुछ जगहों पर रास्ता अवरोध के कारण परिवहन की कठिनाइयां आ जाती हैं, क्योंकि सड़क इतना ही चौड़ा होता है कि आराम से दो कारें ही एक-दूसरे को पार कर सकती हैं।

जोशीमठ के पुलिस कर्मचारी परिवहन सेवा कायम रखने का अच्छा कार्य करते हैं, जहां कभी-कभी एक-दूसरे से टकराने से एक बाल की दूरी पर ही इन्हें बचा लिया जाता है।

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मुख्य सड़क के ऊपर पुराना शहर बसा है जहां ज्योतिर्मठ, कल्पवृक्ष तथा आदि शंकराचार्य के पूजास्थल की गुफा है और इसके नीचे बद्रीनाथ की ओर बाहर निकलने पर जोशीमठ के दो प्रमुख आकर्षण नरसिंह मंदिर तथा वासुदेव मंदिर स्थित हैं।

कुछ दूरी तक जोशीमठ के यात्रियों एवं वासियों के जीवन को यहां की द्वार प्रणाली द्वारा नियमित किया जाता है। बद्रीनाथ के लिये गाड़ियां 6-7, 9-10, 11-12 बजे दिन तथा 2-3 एवं 4.30-5.30 बजे दोपहर बाद छूटती हैं।

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गेट खुलने का समय जैसे ही निकट होता है तो नरसिंह मंदिर के पास पुलिस चौकी से लगभग मुख्य सड़क तक गाड़ियों की सर्पिली पंक्ति बनने लगती है।
गर्मियों में एक द्वार पर लगभग 300 गाड़ियां इकट्ठा हो जाती हैं। इसी समय रास्ते पर फेरी वाले व्यस्त हो जाते हैं जो एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी के बीच चाय, हल्का नाश्ता, शाल, स्वेटर तथा मनके बेचते हैं।
बद्रीनाथ से जैसे ही परिवहन शहर में आता है तो मुख्य सड़क बाजार पर फिर जाम हो जाता है। शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हुए आपको गेट का ध्यान रखना पड़ता है, ताकि आप ट्रैफिक में न फंसें।

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