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Custom of Sacrificing Animals,In Uttarakhand,(उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा)

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, October 28, 2009, 07:18:01 AM

उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा बंद होनी चाहिए !

हाँ
53 (69.7%)
नहीं
15 (19.7%)
50-50
4 (5.3%)
मालूम नहीं
4 (5.3%)

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मोहन जोशी

भोत दुःख भे यो फोट देखि बेर  जा एक बेजुबान बकर के पकड़ी बेर कटी जानो चारो तरफ बठी लोगुली तामस देखनी और तो और कुछ नई जमानक होनहार लुड़ मोड़ फोटो ग्राफी ले करनी सीबो सिब

साफ़ बात छु जब हामी आफु नान्तिने के जरा ले खरोच न उन दिन उ बकरा पाठ ले केक नानतिन होलो

सोचो देव्भूमिक देवपुत्रो की कारणों च तुमि यो सब 

मोहन जोशी
बदरपुर नई देल्ली

Devbhoomi,Uttarakhand

खैरालिंग में पशुबलि को लेकर अभी संशय
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जनपद पौड़ी के कल्जीखाल ब्लॉक में एक और दो जून को आयोजित प्रसिद्ध खैरालिंग मुंडनेश्वर मेले में पशुबलि को लेकर संशय बना है। हालांकि प्रशासन मेले में इस बार पशुबलि रोकने के दावे कर रहा है।

पौड़ी जनपद के बुंखाल कालिंका, बीरोंखाल कालिंका व खैरालिंग मुंडनेश्वर के मेले पशुबलि के लिए विख्यात हैं। इन मेलों में वर्षो से पशुबलि की परंपरा चली आ रही है। पशुबलि पर नियंत्रण के लिए प्रशासन हर वर्ष प्रयासरत रहता है,लेकिन हजारों लोगों की आस्था के सामने हर बार प्रशासन बैकफुट पर आ जाता है।

एक व दो जून को पौड़ी जनपद के कल्जीखाल ब्लॉक में खैरालिंग मुंडनेश्वर मेले का आयोजन होना है। इस मेले में भी नर भैंसे के साथ बकरों की बली दी जाती है। पिछले कई वर्षो से यह परंपरा चली आ रही है।


'पशुबलि प्रथा रोकने के लिए ग्रामीणों से कई दौर की वार्ता हो चुकी है। पूजा के उपरांत ग्रामीणों ने नर भैंसे को प्रशासन को सौंपने पर सहमति जताई है।

यदि क्षेत्र के ग्रामीण मेला समिति का गठन कर मेले के लिए कोई निश्चित तिथि तय कर लेते हैं तो प्रशासन मेला आयोजन में पूर्ण सहयोग करेगा और मेले को विकास मेले के रूप में आयोजित करने का प्रयास करेगा।'


Source Dainik jagran

Devbhoomi,Uttarakhand

आखिर खत्म हो ही गई पशु बलि देने की प्रथा
पौड़ी: कल्जीखाल ब्लॉक में प्रत्येक वर्ष मनाए जाने वाला खैरालिंग (मुण्डनेश्वर कौथीग) ऐतिहासिक रूप लेकर सम्पन्न हो गया। शुक्रवार को गुठिंडा के ग्रामीणों ने नर भैंसा प्रशासन को सौंपने के बाद शनिवार को छोटा खैरालिंग बड़कोट के ग्रामीणों ने भी दो नर भैंसों को प्रशासन को सौंप दिया। इतिहास में पहली बार मेले को बिना पशुबलि के आयोजन कर ग्रामीणों ने नई मिसाल पेश की है।

ऐतिहासिक खैरालिंग कौथीग क्षेत्रीय ग्रामीणों व प्रशासन के सहयोग से शनिवार को निर्विघ्न सम्पंन हो गया। शुक्रवार को नर भैंसा प्रशासन को सौंपने के बाद शनिवार को खैरालिंग मुण्डनेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भगवान शंकर व मां काली के दर्शन कर मन्नतें मांगी। मेले में भगवान को खुश करने के नाम पर मंदिर क्षेत्र में एक भी पशु की बलि नहीं दी गई। आशा के विपरीत पशुबलि न किए जाने का क्षेत्रीय लोगों द्वारा व्यापक स्वागत व समर्थन किया गया।

राजस्व विभाग की चाक-चौबंद व्यवस्था में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने मंदिर पहुंच कर पूजा-अर्चना की। वहीं छोटा खैरालिंग बड़कोट के ग्रामीणों ने भी मंदिर में चढ़ाए जाने वाले दोनों नर भैंसों को नायब तहसीदार जनार्दन प्रसाद गौड़ को सौंप दिया।

जिससे छोटा खैरालिंग में भी इस बार से पशुबलि थम गई। बलि की प्रथा का अंत होने के बाद ग्रामीणों ने भविष्य में मेले में सात्विक पूजा व विकासपरक कार्यक्रम करवाने की पहल करने का भी निर्णय लिया है।


Source Dainik Jagran

Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand

सनगाड़ मंदिर में बलि के बदले देनी होगी दक्षिणा


बागेश्वर : सनगाड़ मंदिर में लगभग 500 साल पुरानी बलि प्रथा तो पिछले सप्ताह ही बंद करने का निर्णय ले लिया गया था लेकिन पहली नवरात्र को मंदिर में बलि के बदले दक्षिणा चढ़ाने की नई परंपरा शुरू की गई है।

पहली नवरात्र को मंदिर कमेटी और श्रद्धालुओं की बैठक आयोजित की गई, जिसमें बलि प्रथा को हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय लिया गया। कमेटी व श्रद्धालुओं ने कहा कि वह अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए यह फैसला ले रहे हैं। निरीह पशुओं की बलि हमेशा के लिए बंद की जाएगी, लेकिन मंदिर में आयोजित होने वाला सनगाड़ मेला और भव्य व आकर्षक बनाया जाएगा।


कमेटी ने मांग की कि शासन प्रशासन भी मेला आयोजन के लिए कमेटी को समय समय पर धन मुहैया कराये ताकि मेला संचालित किया जा सके। एसडीएम केएस टोलिया, तहसीलदार मदन सिंह ने भी ग्रामीणों व मंदिर समिति के फैसले की सराहना की है। बैठक में समिति के अध्यक्ष राजेंद्र महर, क्षेपंस दीपा महर, प्रधान सुरेश महर व मोहन सिंह महर, धन सिंह भौर्याल, धन सिंह बाफिला आदि मौजूद थे।

अंतिम फैसला फूल उठाकर हुआ

बलि प्रथा बंद की जाए या फिर जारी रखाजाए, इस बात का फैसला पहली नवरात्र को फूल उठाकर किया गया। फूल उठाकर ही गांव के अधिकतर पेचीदे मामले सुलझाए जाते हैं। फूल उठाना एक किस्म का लाटरी सिस्टम है।

मंदिर के शक्ति स्थल में हां व ना के दो फूल रखे जाते हैं। अबोध बच्चे से एक फूल उठाने को कहा जाता है, जो भी फूल बच्चे ने उठा दिया उसे दैवीय आदेश माना जाता है। बलि प्रथा में भी यही किया गया बच्चे ने नहीं का फूल उठाया, जिससे यह माना गया कि देवता भी यही चाहते हैं कि बलि नहीं हो।
बलि के बदले दी 5 हजार की राशि

बलि प्रथा के बदले मंदिर को दक्षिणा देने की परंपरा शुरू हो गयी है। श्रद्धालु राजेंद्र सिंह राठौर ने मंदिर में मनौती मांगी थी। पूरी होने पर इस नवरात्र में अष्टमी के दिन बकरा काटना था, लेकिन मंदिर समिति के फैसले के बाद राजेंद्र सिंह राठौर ने मंदिर में बलि न देते हुए 5 हजार की राशि मंदिर को दक्षिणा स्वरूप दी। दक्षिणा के साथ ही मंदिर में नई परंपरा की शुरूआत हो गयी है।

Source Dainik Jagran

abjoshi

Dear Friends,
This is my first post in this forum and luckly I have found the subject which is very close to my heart. I am also dead against the bali pratha. I fail to understand how the so called 'educated & modern' people from Uttarakhand origin are readily available to carry forward this 'cheap' practise. Why the hell they want to worship such a God/Kul Devta/Kul Devi (I don't want to address them as God because those doesn't fall under the properties of the God, nevertheless..)? Why cannot such people adopt more sensible options like 'bhajan kirtan, hawan, yagya, offering nariyal etc etc' instead of killing the innocent animals, pariticularly goats.

Please share your views and do reply.

Thanks
Anand Joshi

msnegi

Pashu bali ko hame jad se he ukhaad fekna hoga...yah hamari sanskriti nahi hai..iski suruwat apne he ghar gaon se suru kari hogi..


Devbhoomi,Uttarakhand


MANOJ BANGARI RAWAT

दीवा माई जतौडा  मटेला (मल्ला) 2011
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