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Custom of Sacrificing Animals,In Uttarakhand,(उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा)

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, October 28, 2009, 07:18:01 AM

उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा बंद होनी चाहिए !

हाँ
53 (69.7%)
नहीं
15 (19.7%)
50-50
4 (5.3%)
मालूम नहीं
4 (5.3%)

Total Members Voted: 76

Devbhoomi,Uttarakhand

07/दिसंबर/२००९ को बुंखाले भगवती मंदिर में 101 बागी व हजारों बकरों की भेट चढ़े,इस साल रिकार्ड तोड़ भेट 101 बागी व हजारों बकरों को बुंखाले भगवती की भेट चढ़ाये गये।

क्या बुन्खाल की भगवती माँ सदियों से चली आ रही इस परम्परा को सदा के लिए कायम रहेगा नहीं एक ऐसा भी आयेगा जब ये भगवती माँ खुद कहेगी अब बहुत हो गया बांध करो ये बेजुबान जानवरों की मार-काट और मझेशिर्फ़ धूप, पिठाई शिरफल,की भेट चढ़ाये!

प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों के समन्वित प्रयासों से कठूड़, कांडा, सवदरखाल, खोला, वरकोट, मुण्डेश्वर में बलिप्रथा पूर्णत: समाप्त हो चुकी है, लेकिन बूंखाल आज भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।

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पशुबलि रोकने के लिए जागरूकता जरूरी
                                                                                       पशुबलि रोकने के लिए जागरूकता जरूरी                                                                                                                                           देहरादून में पशु बलि का विरोध करने सीएम आवास पहुंचे स्कूली बच्चों को रोकने के बजाये अंदर आने का न्यौता दिया गया है।
यह  सब कुछ हुआ मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल 'निशंक" की पहल पर। पूर्व में  मिलने समय न लेने के बावजूद मुख्यमंत्री ने स्वयं उन्हें आमंत्रित किया और  पशु बलि रोकेन के उपायों पर चर्चा की।

मुख्यमंत्री डा. निशंक ने  कहा कि पशु बलि लोगों की आस्था व विश्वास से जुड़ा हुआ मामला है। इसलिए  मात्र कानून बनाकर इसे नहीं रोका जा सकता है। इस क्रुर प्रथा पर प्रभावी  अंकुश लगाने के लिए कानून के साथ ही व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार के साथ  ही जन जागरुकता की आवश्यकता है। इसलिए समाज के सभी वर्गों को आगे आकर अपने  दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

मुख्यमंत्री ने पशु बलि के  खिलाफ स्कूली बच्चों के भावना की सराहना भी की।  उन्होंने कहा कि शिक्षा  के साथ-साथ नैतिक ज्ञान एवं देश व समाज की संस्कृति के प्रति भी सचेत रहने  की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने गोहत्या रोक लगाने की जानकारी भी दी।  बच्चों ने पशुओं क्रूरता रोकने, गैर  बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई एवं  बूचड़खानों को भी स्थानांतरित करने पर चर्चा की। रविवार को दून स्कूल,  स्कालर्स होम, ओलम्पस स्कूल, दून इंटरनेशनल स्कूल के बच्चे सीएम आवास  पहुचे हुए थे।



http://www.samaylive.com/regional-hindi/uttarakhand-hindi/101150.html

   

Devbhoomi,Uttarakhand


पशु बलि को हाईकोर्ट ने दिए कड़े निर्देश
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पशु बलि मेले को लेकर हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है कि जिले में पशु बलि मेले की जानकारी दें और जहां पशुओं की बलि होती है उन क्षेत्रों का चिह्निकरण किया जाए। इसके अलावा पशु बलि देने वाले लोगों को भी चिह्नित किया जाए।

यह जानकारी जिला कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए जिलाधिकारी दिलीप जावलकर ने दी। उन्होंने कहा कि पौड़ी जनपद के बूंखाल मेले को लेकर पीपुल्स आफ एनिमल एनजीओ समेत अन्य धार्मिक संगठनों ने नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है जिसमें कहा गया है कि मेलों में पशु बलि देने का प्रावधान नहीं है।

हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिए कि उत्ताराखण्ड में आयोजित होने वाले पशु बलि मेलों का चिह्निकरण कर दिया जाए। साथ ही पशु बलि देने वाले लोगों का भी चिह्निकरण कर कानूनी कार्यवाही की जाए। उन्होंने कहा कि बूंखाल मेला 11 दिसम्बर को आयोजित किया जाएगा। स्थानीय लोगों से बातचीत कर मेलों को विकास मेला के रूप आयोजित करने का प्रयास किया जा रहा है।

जिलाधिकारी ने कहा कि विकास मेलों को लेकर 15 लाख का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है और इस प्रस्ताव पर शासन ने स्वीकृति दे दी है। उन्होंने कहा कि बूंखाल मेला विकास मेले के रूप में तीन तक आयोजित करने की कवायद चल रही है। इसके अलावा मेले में किसी प्रकार की पशु बलि न हो इसके लिए पुलिस प्रशासन को आवश्यक निर्देश दिए गए है।

क्षेत्र के पटवारियों को निर्देशित किया गया है कि वे पशु बलि देने वालों का चिह्निकरण कर लें, ताकि समय पर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जा सके। प्रेसवार्ता में अपर पुलिस अधीक्षक जसवंत सिंह, जिला सूचना अधिकारी डीएस पुेडीर, विजाल संस्था की अध्यक्ष सरिता नेगी, केशवानंद नौटियाल समेत अन्य उपस्थित रहे।

http://in.jagran.yahoo.com

Devbhoomi,Uttarakhand

पशुबलि के विरोध में ग्रामीणों को किया जागरूक
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पौडी: राठ क्षेत्र के प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका मंदिर में पशु बलि मेला इस साल 11 दिसंबर को आयोजित होगा।

मेले के शुरू होने से पहले बिजाल संस्था की अध्यक्षा सरिता नेगी ने क्षेत्र भ्रमण कर लोगों से पशु बलि न करने की अपील की। इस दौरान चोपडा, मलुंड व मिलाई समेत अन्य गांवों का भ्रमण कर उन्होंने लोगों को बताया कि पशु बलि ठीक नहीं है। इससे देवता प्रसन्न नहीं होते। राइंका चौरीखाल, प्राथमिक विद्यालय छोया के छात्रों के बीच भी जागरूकता अभियान चलाया गया। छात्रों ने संस्था को सहयोग देने का भरोसा दिया। भ्रमण में गायत्री परिवार की सदस्य पीतांबरी रावत, सावित्री रावत, उषा थपलियाल, दीपक बिष्ट, ऋषि बिष्ट शामिल रहे।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6974084.html

Anil Arya / अनिल आर्य

मेरा ये मानना है की जब हमारी धार्मिक भावना, संस्कृति, रिवाज (religious custom) बरसो से चली आ रही है तो ये प्रथा क्यों बंद होनी चाहिए ?  हा पशु क्रूरता के मै बिलकुल खिलाफ हू. मेनका गाँधी हमारी सैकड़ो साल पुरानी प्रथा मै क्यों दखल कर रही है. अगर करना ही है तो sloughter houses को बंद किया जाये. Then I will vote for "YES". 

Devbhoomi,Uttarakhand

बूंखाल कालिंका मेले की तैयारियों में जुटे लोग
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पौराणिक मठ मंदिरों व प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र का अपना अलग ही महत्व है। सुंदर बुग्याल, हरे-भरे वन जहां सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, वहीं पौराणिक सिद्धपीठ, मंदिरों का अपना अलग ही महत्व है। इनके दर्शनों को हर वर्ष लाखों लोग आते हैं। ऐसा ही एक नाम है सिद्धपीठ कालिंका माई का पौराणिक मंदिर।

मंडल मुख्यालय से 45 किमी की दूरी पर स्थित बूखांल क्षेत्र में प्राचीनकाल से स्थापित कालिंका माई का मंदिर आस्थावान लोगों के अटूट विश्वास की परिकल्पना को साकार करता है। हर वर्ष यहां भव्य धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन होता है। इस वर्ष भी 11 दिसंबर को बूंखाल में धार्मिक मेला लगेगा।

इस मेले में एक पुरानी परंपरा भी चली आ रही है। मेले में पशुबलि की पुरानी परंपरा का विरोध भी हो रहा है। बावजूद इसके पशुबलि नहीं रूक रही है। पशु बलि समर्थन और विरोधी आमने-सामने है। प्रशासन पशु बलि रोकने के प्रयासों में जुटा है, वहीं गांवों में पशु बलि की तैयारिया अंतिम चरणों में है।

Dainik jagran

Anil Arya / अनिल आर्य

पीपुल्स फॉर एनीमल में पौड़ी के बूंखाल कालिका मंदिर में पशु बलि न करने की अपील आमजन से की है। यहां 11 दिसंबर से मेला होने जा रहा है। पीएफए का कहना है कि इस मेले से कई तरह की बीमारियां फैलने की आशंका है। साथ ही पर्यावरण पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। प्रशासन की ओर से गैमेक्सिन का छिड़काव किया जाता है, जोकि बेहद खतरनाक रसायन है। इससे भी पशुओं के मरने की आशंका रहती है। पीएफए ने अपील की है कि इसके विरोध में आम लोगों के आगे आने की जरूरत है।

Source - epaper.amarujala

Devbhoomi,Uttarakhand

पशु बलि रोकना प्रशासन के लिए चुनौती
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थलीसैण के बूंखाल में 11 दिसंबर को होने वाले प्रसिद्ध पशु बलि मेले में बलि रोकने की कोशिशें तेज हो गई है। इस बार गढ़वाल आयुक्त ने प्राथमिक विद्यालय मलुण्ड में ग्रामीणों को पशु बलि बंद करने की अपील की, लेकिन ग्रामीणों की शर्त है कि बाहरी क्षेत्रों से आने वाले पशुओं को रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी।

बूखांल में पशु बलि पर रोक प्रशासन के लिए चुनौती बन गया है। यहां बलि कब शुरू हुई इसका इतिहास तो नहीं है, लेकिन क्षेत्र के बुजुर्ग लोग कहते हैं कि उनके बाप-दादा भी उन्हें बूंखाल में बलि के विषय में बताते थे। ग्राम पंचायत मलुण्ड की भूमि पर बूंखाल की देवी है और गांव से हर साल नर भैंसा चढ़ाया जाता है। ग्रामीणों ने तय किया है कि वे मलुण्ड का नर भैंसा प्रशासन को सौंप देंगे, लेकिन अन्य क्षेत्रों से आने वाले नर भैंसों की जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

भले ही बैठक में लोगों ने पशु बलि से इनकार कर दिया हो, लेकिन क्षेत्र में मेले की तैयारियां चल रही हैं। दस दिसंबर को गांवों की रात्रि पूजा में नाते-रिश्तेदारों को भी आमंत्रित किया गया है। कुई, सलणा, ठौर व दूर राठ क्षेत्र के गांवों में बलि के पशु भी बांध दिए गए हैं। बलि समर्थक प्रताप सिंह, मनमोहन रावत, केदार दत्त गुसांई का कहना है कि उनकी मनौती पूरी हुई है और वे बलि देंगे। इनका कहना है कि सैकड़ों साल की यह परंपरा अटूट है और इसे रोकना धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

स्थानीय ग्राम पंचायतें समिति का गठन कर पशु बलि का विरोध करें तो बाहर से आने वाले किसी भी नर भैंसे को बूंखाल में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा

Source Dainik Jagran

kya prshasan 11 december ko thalisain main one wali bali ko rokne main safal ho payega?

Devbhoomi,Uttarakhand

बूंखाल मेला आज, भारी फोर्स तैनात


   पौड़ी गढ़वाल,तकरीबन चार सौ साल पुराना एतिहासिक बूंखाल मेला प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। लंबे समय से बलि रोकने के प्रयास अभी तक रंग लाते नहीं दिख रहे। सैकड़ों साल से चली आ रही परम्परा को लेकर ग्रामीण समझौते के मूड में नजर नहीं आ रहे। शनिवार को होने वाले मेले में बलि को लेकर प्रशासन में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। हालांकि प्रशासन ने बलि प्रथा रोकने के लिए पुलिस, पीएसी व होमगार्ड के करीब डेढ़ हजार जवान तैनात किए गए हैं
मेले में बलि प्रथा रोकने के लिए नब्बे के दशक में शुरू हुई मुहिम फिलहाल किसी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई है। गांव में चल रही मेले की तैयारियों को देखकर हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। गांवों में शुक्रवार की रात स्यूंरत (सपनों की रात) का मंडाण होगा और इसके लिए ग्रामीण तैयारी में जुटे हैं। इस रात बलि के भैंसे और बकरे की पूजा होती है। मुख्यालय से करीब 40 किमी. दूर ग्राम कुई, डुमलोट, बजवाण से 5 नर भैंसे और इतने ही बकरों की बलि होनी है और ग्रामीण शुक्रवार रात्रि पूजा की तैयारी करते रहे।
प्रशासन ने बूंखाल क्षेत्र में बलि रोकने की पूरी तैयारी में जुटा हुआ है। जिलाधिकारी दिलीप जावलकर ने स्पष्ट आदेश दिए है कि बूंखाल मेले में शांति भंग करने वालों को बर्दाश्त नहीं किया ाएगा। दूसरी ओर समाज सेवी भी बलि रोकने के लिए अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। लंबे समय से जन जागरूकता अभियान चला रही सरिता नेगी का दावा है कि इस बार बलि नहीं होगी।
मेले का इतिहास
जनश्रुतियों के अनुसार चार सौ साल पहले चोपड़ा गांव में कन्या का जन्म हुआ और कन्या को गांव के ही बच्चों ने खेल-खेल में एक गड्ढे में दबा दिया और गड्ढे में बकरों व भेंड़ों के कान काट कर डाल दिए। तब कन्या ने सपने में गांव के लोगों को दर्शन देकर बताया कि मैं वहां जमीन के नीचे दबी हूं और अब यहां हर साल बलि दी जाए। यूं तो बूंखाल में हर शनिवार को बकरों की बलि चढ़ाई जाती है किंतु विशेष उत्सव पर सैकड़ों की संख्या में नर भैंसो व बकरों की बलि होती है।
'पुलिस बल को आदेश दिए गए है कि शांति व्यवस्था कायम रहे। इसे लेकर बूंखाल में पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है। शांति व्यवस्था में खलल डालने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।'
दिलीप जावलकर, डीएम गढ़वाल।
'पशु बलि जघन्य अपराध है और इसे हर हाल में रोकना ही होगा। बूंखाल में वीडियो ग्राफी कर रही पीपुल्स फॉर एनीमल्स की कोशिश है कि पशु बलि पर रोक लगे'
गौरी मौखेली, पीएफए सचिव, उत्तरखंड।
प्रशासन को सौंपे पशु
पौड़ी गढ़वाल: बूंखाल कालिका पशु बलि मेले में मलुण्ड गांव की अहम भूमिका होती है। इस गांव का नर  भैंसा सबसे पहले कालिंका की खड्ड में बलि दिया जाता है किन्तु इस बार प्रशासन की बड़ी उपलब्धि यह रही कि पंचायत ने नर भैंसा प्रशासन को सौंप दिया है। इसके अलावा चौरीखाल के अवतार सिंह ने भी नर भैंसा प्रशासन को सौंपा है।
शुक्रवार को बलि ठेठ पहले मलुण्ड गांव के ग्रामीणों ने पंचायत नर भैंसा प्रशासन के हवाले कर दिया है। इसके अलावा बूंखाल मेले के पहले डाव चौरीखाल के अवतार सिंह ने भी नर भैंसा प्रशासन को सौंपा है। बूंखाल के पुरोहित सुरेन्द्र गोदियाल का कहना है कि पुरोहित बलि बंद करने को तैयार हैं किन्तु बूंखाल कालिका की खड्ड तक यदि भैंसे पहुंचते हैं तो उनकी निश्चित रूप से बलि ही दी जाएगी।



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