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Neellkanth Parvat Uttarakhand,नीलकंठ पर्वत पर विराजते हैं शिव !

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, January 02, 2010, 12:10:53 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड के नीलकंठ पर्वत पर स्‍वयं भगवान शिव विराजते हैं. ऐसी मान्‍यता है कि यहां पर महादेव आज भी तपस्‍यालीन है. भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए भक्‍त हजारों फीट की चढ़ाई कर स्‍वयं को धन्‍य मानते हैं.

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भारतीय संस्कृति की विशाल छटा को अपनी संपूर्ण सुषमा के साथ यदि देखना हो तो आइए, चलें हिमालय की गोद में दस हजार तीन सौ पांच फुट की उंचाई पर अवस्थित बदरीनाथ धाम।

बदरीनाथ जहां राष्ट्र की उत्तरी सीमा पर खड़े होकर भारतीय संस्कृति की विशालता और भव्यता का संदेश देता है वहां वह भारतीयों के मन में तप और पावनता की सनातन संवेदना भी जागृत करता है। सारे भातर से हजारों वर्षो से यात्री यहां आकर हिमालय के दिव्य सौंदर्य का पान करते-करते कण-कण में विद्यमान प्रभुता का अहसास किये बिना नहीं रह सकते।

हजारों नदियां, नालों और पहाड़ों की दुर्गम घाटियों को पार करते हुये जब यात्री देवदर्शिनी से बदरीविशाल की एक झलक पा लेता है तो उसका सारा परिश्रम, सारी थकावट एक क्षण में आह्लाद में बदल जाते हैं। यात्री धन्य हो जाता है। हजारों वर्षो से भारतीय आस्था और विश्वास का यह अनोखा केद्र काल और समय को जीतकर प्रसन्नता की हंसी बिखेर रहा है।

बदरीनाथ की यात्रा जेठ महीने की अक्षय तृतीया के आसपास शुरु होती है और कार्तिक-मार्गशीर्ष में संपूर्ण हो जाती है। छह महीनों तक तपोभूमि मानवों की चहल-पहल से मुखर रहती है और शेष छह महीनों तक अपने आप में स्थित हो जाती है। सारी देवभूमि परम शांति की बर्फानी चादर ओढ़कर बिल्कुल नि:शब्द मौन में डूब जाती है। देवों की यह भूमि देवों की हो जाती है।
बदरीनाथ की यात्रा बहुत कठिन मानी जाती है। पहले यात्री घर-गृहस्थी से विदा लेकर पहाडों की ओर देवभूमि के दर्शन के लिए बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ चल पड़ता था।

महीनों यों ही बीत जाते थे। घर वापस आ गये तो अच्छा है अन्यथा यही भूमि उन्हें अपने में समा लेती थी। यह भी एक पुण्यावस्था मानी जाती थी। यहां देवता निवास करते हैं इसलिए देवभूमि है और यहां आना एक तपस्या ही है इसलिए तपोभूमि है।

आधुनिक काल में महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द अपनी तप: साधना के लिए यहां आए थे। तप के लिए ऐसा सुंदर वातावरण अन्यत्र मिलना कठिन है।



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चंपावत के कत्यूरी राजा झलराई की यूं तो सात रानियां थीं, लेकिन संतान एक भी नहीं थी। ज्योतिषियों ने राजा को आठवें विवाह की सलाह दी। अर्द्धरात्रि में राजा को स्वप्न हुआ कि नीलकंठ पर्वत पर कलिंका नामक सुंदरी उनकी प्रतीक्षा कर रही है। राजा लाव-लश्कर के साथ नीलकंठ पहुंचे। कलिंका के साथ वहां उनका विधिवत विवाह हो गया।

कलिंका गर्भवती हुई। सातों रानियों ने ईर्ष्यावश एक षड्यंत्र के तहत प्रसव कै समय कलिंका की आंखों पर पट्‌टी बांध दी और जब शिशु उत्पन्न हुआ, तो शिशु के स्थान पर सिल-बट्‌टा रखकर यह प्रचारित कर दिया गया कि कलिंका ने सिल-बट्‌टे को जन्म दिया है। शिशु को मारने के लिए रानियों ने पहले उसे हिलीचुली नामक खतरनाक गायों के आगे डाल दिया, लेकिन जब एक गाय उसे दूध पिलाने लगी, तब उन्होंने उसे बिच्छू घास के ढेर पर फेंक दिया। जब वहां भी उसे कुछ नहीं हुआ, तो उसे नमक के ढेर पर रख दिया, लेकिन नमक जैसे शक्कर में बदल गया।

अब रानियों ने उसे नमक से भरे संदूक में रख काली नदी में बहा दिया। सात दिन और सात रातें बीतने के बाद वह संदूक गोरीघाट में भाना नामक मछुवारे को मिला। मछुआरे पति-पत्नी ने बालक का नाम गोलू रखा और उसका पालन-पोषण किया।

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 भारतीय नौसेना का यह साहसी जवान साउथ व नार्थ पोल पर विजय पाने वाला देश का आठवां और उत्तराखंड का पहला व्यक्ति है।

26 वर्षीय युवा ब्रिजेंद्र के मुताबिक अजेय समझे जाने वाले 6596 मीटर ऊंचे नीलकंठ पर्वत पर विजय पाने से उनका मनोबल बढ़ा। इसके बाद नौसेना के अभियान के तहत साउथ पोल व नार्थ पोल पर जाने से पहले उन्होंने ग्रीनलैंड में प्रशिक्षण लिया। पत्रकारों से बातचीत में युवा पर्वतारोही ने कहा कि साउथ पोल अभियान 28 दिसंबर, 2006 में पूरा करने के बाद नार्थ पोल अभियान में इसी वर्ष नौ अप्रैल को सफलता हासिल की।

उक्त अभियान में नौसेना के दस सदस्यीय दल का नेतृत्व कमांडर सत्यव्रत ने किया। भारतीय नौ सेनाध्यक्ष ने ब्रिजेंद्र को सम्मानित करने व एक पदोन्नति देने की सिफारिश की है। पौड़ी जिले के धूमाकोट विधानसभा क्षेत्र के ग्राम बड़ेथ, नैनीडांडा के मूल निवासी ब्रिजेंद्र वर्तमान में अपर नत्थनपुर में रहते हैं। मुख्यमंत्री ने ब्रिजेंद्र को उनकी विशिष्ट उपलब्धि के लिए सम्मानित किया।

उन्होंने कहा कि ब्रिजेंद्र ने देश व प्रदेश का नाम रोशन किया है। उनकी उपलब्धि से राज्यवासी गौरवान्वित हैं। इससे पहले कृषि मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ब्रिजेंद्र का परिचय कराया। उन्होंने बताया कि ब्रिजेंद्र दोनों ध्रुवों में स्की करने वाले पहले भारतीय हैं।

इस मौके पर मौजूद ब्रिजेंद्र की माता श्रीमती शांति देवी व पिता मनमोहन सिंह पुत्र की उपलब्धि पर बेहद खुश नजर आए। माता श्रीमती शांति देवी ने कहा कि रोमांचक अभियान में भाग ले रहे ब्रिजेंद्र की सुरक्षा को लेकर उन्हें कई बार चिंता भी हुई, लेकिन पुत्र के विजयी होकर लौटने पर उन्हें भी गर्व महसूस होता है।

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