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Unknown Folk Singers Of Uttarakhand - उत्तराखंड के बेनाम लोक गायक

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 31, 2007, 11:27:16 AM

Sanjay Pal


Is khabar ko padhne per bohot dukh huwa.. Devi Saraswati ko bilkul help millni cahiye... Umeed hai jald hi koi step uthaya jayega....

Quote from: पंकज सिंह महर on March 12, 2010, 12:41:50 PM
संस्कृति को बढ़ावा देने का सरकार भले ही दावा कर ले, आज उत्तराखण्ड में सरस्वती देवी जैसे कई लोक कलाकार सरकार की उपेक्षा के कारण गुमनाम और कष्टमय जीवन बिताने को मजबूर हैं। देखिये दैनिक हिन्दुस्तान में आज के अंक में प्रकाशित यह खबर


जीवन भर मालिकों की मंगल कामना के लिए गीत गाए। उनके देवताओं को खुश करने के लिए जागर, भड़ौ, बदरी, केदार नाग सेम राजा की गाथाएं गाईं। चैती गीतों के जरिए नव विवाहिताओं को मायके का संदेश पहुंचाया। ऋतु बदलने पर पहाड़ के कठिन जीवन में उल्लास भरने के लिए जितनी सामथ्र्य थी, नाची। लेकिन आज जब बुढ़ापे और बीमारी ने आ घेरा तो सभी ने मुंह फेर लिया।

यह विडम्बना ङोल रही हैं, बेडा परम्परा की लोकगायिका सरस्वती देवी। एक जमाने में जिसके सुर सुनने और नृत्य देखने के लिए गांव के गांव जुट जाते थे, आज वह श्रीनगर के पास डांगचौरा में पीपल के एक पेड़ के नीचे जीवन के बचे हुए दिन गुजार रही है। किसी ने दे दिया तो खा लिया, नहीं तो भूखी ही सो गईं।

72 साल की यह लोकगायिका चैती, मांगल, बदरी, केदार, गंगोत्री माणिकनाथ, सेमनागराजा, गंगामाई एवं भड़ौ जैसी लोकगायिकी की विधाओं की लोकप्रिय गायिका रही है। एक जमाने में टिहरी के राजा इन्हें मेहनताना और ग्रामीण 'डडवार' दिया करते थे। लेकिन जमाना बदला और इन लोकगीतों के कद्रदान घटते चले गए। बदले हुए जमाने में इन गीतों और इनके गाने वालों की कोई पूछ नहीं रही। इसलिए सरस्वती देवी जैसे कई गायक रोजी-रोटी के लिए मोहताज हो गए।

राज्य सरकार की ओर से लोग गायकों को दी जाने वाली पेंशन भी सरस्वती देवी को नसीब नहीं हुई। सरस्वती देवी बताती हैं कि, इसके पास न रहने को घर है और न कोई सहारा। बस सड़क किनारे का यह पीपल जब तक आसरा दिए हुए हैं, जी लूंगी। गढ़वाल विवि के लोक कला केंद्र के निदेशक प्रो. डीआर पुरोहित बताते हैं कि सरस्वती देवी बेडा परंपरा के लोक गीतों की सबसे धनी कलाकार रही हैं।

1991 में उन्हें नार्थ जोन कल्चरल सेंटर द्वारा आयोजित सांस्कृतिक उत्सव में भाग लेने का मौका मिला। गढ़वाल विवि के अनेक प्रोजेक्ट में भी वह काम कर चुकी हैं। पुरोहित कहते हैं कि, यदि सरस्वती देवी की मदद के लिए सरकार आगे आए तो अब भी उनके पास बचे पहाड़ की संस्कृति के अनमोल खजाने में से कई बहुमूल्य मोती बचाए जा सकते हैं।


दीपक पनेरू

साथियों यहाँ पर में एक गुमनाम पर बहुत ही सुरीले गायक के बारे में कुछ जानकारिया देना चाहूँगा........
     
      नाम :- जगदीश चन्द्र उपाध्याय
      पिता का नाम :- स्व० श्री बी० डी० उपाध्याय
      माता जी का नाम :- श्रीमती चनुली देवी
      पैत्रिक गाँव :- पिपना, मल्ला सल्ट, जिला - अल्मोड़ा
      जन्म दिन :- ०१- जुलाई - १९६१,
      मोबाइल नंबर : - 09548338135

  ये चार भाई बहन है, दो भाई, दो बहन, ये सब भाई बहनों में सबसे बड़े है,   वर्तमान में मिलिटरी मैस हल्द्वानी में कार्यरत है, ये मैट्रिक पास है तथा   सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हुए है, ये एक नियमित रक्तदान करता है जो अमूमन   १०० लोगो में एक ही मुश्किल से होता है.
 
  श्री उपाध्याय जी को श्री हीरा सिंह राणा जी, मीना राणा जी, श्री दीवान   कनवाल जी तथा श्री प्रह्लाद महरा जी के साथ थोडा बहुत कार्य करने का अनुभव   है , मेरा परिचय इनसे ललित मोहन जोशी को एक कार्यक्रम में हल्द्वानी   बुलवाने के दौरान सन २००६ में हुयी,.....................
 
  समय के आभाव में ज्यादा जानकारी नहीं दे पाउँगा बंकि बाद में जरुर बताऊंगा आप लोगो से सहयोग की आशा करता हूँ...........धन्यवाद

हेम पन्त

कुमाऊंनी संगीत के पुरोधा मोहन सिंह रीठागाड़ी के छोटे सुपुत्र गिरीश सिंह बोरा "रीठागाड़ी" भी लोकसंगीत की सभी विधाओं में पारंगत है.. पिछले दिनों रुद्रपुर में उत्तरायणी के उपलक्ष्य में "शैल परिषद" द्वारा आयोजित कार्यक्रम में "संगीत एवं नाट्य प्रभाग" की टीम गिरीश जी को ले कर आयी थी... उनके द्वारा गाये गये झोड़े-चांचरी और भगन्यौलों ने जनता को मन्त्रमुग्ध कर दिया...


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


प्रताप सिंह बफिला

प्रताप सिंह बाफिला जो कि उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के नाकुरी क्षेत्र के बाफिला गाव में पैदा हुए! प्रताप सिह बफिला ने बहुत से लोक गीत गाए और हाल ही में उनका निघन हुवा!

लोक प्रिय गीतों में में,

    -     ओ दीपा चुप हैजा, तू बुलान्छे कापना
      लौंडा रे सोपना भली के रैये गोपन

   -    ओ बदला, घूमी आये म्यार पहाड़ देश में

अन्य बहुत सारे लोक गीत..  जो कि बहुत लोक प्रिय हुवे !


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड की बेनाम लोक गायिका सरस्वती देवी   September 25, 2011 - nufeeder - गीत    बेडा (वादि) परम्परा की लोक गायिका 72 वर्षीय सरस्वती आज एक पेड़ के नीचे जीवन बिता रही है, कभी खाना मिलता है तो कभी भूखी ही सो जाती है। किसी जमाने में मालिकों की मंगल कामना के साथ देवी-देवताओं को खुश करने के लिये जागर, भड़ौ, बदरी, केदार, नाग सेम तथा चैती गीतों के जरिये नव विवाहिताओं को उनके मायके का संदेश गाने वाली सरस्वती तब तक नाचती रही जब तक उसमें सामथ्र्य थी, ऋतु बदलने पर पहाड़ के कठिन जीवन में उल्हास मरने वाली सरस्वती से अब लोगों ने मुंह फेर लिया है।  श्रीनगर-कीर्तिनगर के पास डांगचौरा में पीपल के एक पेड़ के नीचे बैठी जीवन के बचे हुए दिन काट रही थी। चैती, मांगल, बदरी, केदार, गंगोत्री, माणिकनाथ, सेमनागराजा, गंगामाई तथा भड़ौ गाने की विधाओं की ज्ञानी इस गायिका को एक जमाने में टिहरी के राजा मेहनताना तथा गांवों से डड्वार मिलता था। जमाना बदला और लोकगीत के कद्रदान भी नहीं रहे तो सरस्वती भी रोटी की मोहताज हो गई।
गढ़वाल विश्वविद्यालय लोककला केन्द्र के निदेशक डी.आर. पुरोहित बताते हैं कि सरस्वती बेडा (वादि) परम्परा की एक जमाने में सबसे धनी कलाकार थी। उसने 1991 में नार्थ जोन कल्चरल सेन्टर आयोजित सांस्कृतिक उत्सव में भी भाग लिया था। सरस्वती ने गढ़वाल विश्वविद्यालय के अनेक प्रोजेक्टों में भी काम किया। प्रो. पुरोहित कहते हैं कि अगर सरकार उसकी कोई मदद करें तो आज भी पहाड़ी संस्कृति के इस अनमोल खजाने से कई बहुमूल्य मोती बच सकते हैं।


http://www.niralauttarakhand.com


Hisalu

Wonderful Mehar Jee.. I am seeing this topic today only.

We must do something for these kind of hidden talents present in Uttarakhand..

I love lyrics mentioned below by Prakash Daa...

Quote from: पंकज सिंह महर on December 07, 2007, 02:23:00 PM
Quote from: हेम पन्त on December 07, 2007, 01:57:03 PM
प्रकाश दा पिथोरागढ़ के नैनी-सैनी गाँव के रहने वाले हैं. उनके गानों ने कुछ साल पहले बहुत धूम मचायी थी.  पति-पत्नी की सामान्य छेड़छाड़ पर आधारित उनका यह गाना बेमिसाल है


ने खानु-  ने खानु कुछी, नौ रोटा खा जाछी,


मजा आ गया हेम दा,..........
ने खानु-  ने खानु कुछी, नौ रोटा खा जाछी,
नान्तिन बूढा बाड़ी, चाईयां रै जानी,
काम धन्धा का दिन आया त ह्वै जांछी बीमार,
खान खिन सब हैं पैली, ह्वै जांछी तैयार.... ने खानु-  ने खानु कुछी, नौ रोटा खा जाछी,"