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जौनसार बावर उत्तराखंड -JAUNSAR BAWAR UTTARAKHAND

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, March 01, 2010, 12:22:05 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

जौनसारी : यह बोली देहरादून के जौनसार भाबर क्षेत्र में बोली जाती है।


जौनसारी हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटे पश्चिमी गढ़वाल के निवासी हैं। भारत सरकार ने उन्हें जन जाति का दर्जा दिया है। उनमें बहुपति प्रथा प्रचलित है और उनकी संस्कृति शेष गढ़वाल की संस्कृति से मिलती है।

उनकी शारीरिक विशेषताओं के आधार पर, जाने माने मानव विज्ञानी डी.एन. मजुमदार उन्हें खस जाति का वंशज बताते हैं। वह लिखते हैं कि, "खस लोग सामान्यता लंबे, संदर, गोरे चिट्टे गुलाबी और पीले होते हैं, उनका सिर लंबा, ललाट खड़ा, नाक तीखी या लंबी पतली, आंखें धुंधली नीले छीटों वाली, बाल घुंघराले तथा अन्य विशेषताओं वाले सुंदर ढ़ंग से करें समान होते हैं औरतों की तुलनात्मक दृष्टि से लंबी, छरहरी, मनोहर और आकर्षक होती हैं।"

मार कंडेय पुराण, भागवत पुराण हरिवंश पुराण और वायु पुराण जैसे विभिन्न प्राचीन ग्रंथों के अनुसार खस गढ़वाल पहाड़ियों में रहते थे। महाभारत में उल्लेख है कि युधिष्टिर के राज्यभिषेक समारोह के अवसर पर भारत तथा पड़ोसी देशों के राजाओं ने उन्हें बहुत से उपहार भेट किए- कहा जाता है कि अन्य जातियों के साथ-साथ खस तथा तनगणों ने द्रोणों (पात्रों) में भर-भरकर सोना भेट किया।

डी.पी. सकलानी के अनुसार कुरूक्षेत्र के मैदान में एकत्र विशाल पांडव सेना में खसों का उल्लेख नहीं है, किंतु वे दुर्योधन की सेना में थे और तलवारों और बल्लभों से लैस थे और उन्होंने सात्यको के साथ पत्थरों से लड़ाई की। एक जौनसरी लोक कथा में ऐसे युद्ध की चर्चा है और गढ़वाली पहाड़ी के शिखरों पर पत्थरों के ढेर के रूप मे उन बीते दिनों की है।

एक स्मृति चिटटन आज भी मौजूद है। इसलिए जौनसारी भगवान सोमेसु के रूप में दुर्योधन की पूजा आज भी करते हैं, जबकि गढ़वाल के शेष भाग में पांडवों की पूजा पांडवलीला और पांडवार्ता की प्रचलित परम्परा में की जाती है।

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कब मिलेगा जौनसारी मिट्टी का लाभ



ढाई सौ साल पहले की बात है, कारगिल से शुरू हुआ दो दर्जन परिवारों का व्यावसायिक सफर उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में आकर रुका। क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता का प्रभाव ही था कि अस्थायी प्रवास के लिए ठहरे ये परिवार यहीं के होकर रह गए।

यहां अब तक इन लोगों की तीन-चार पीढि़यां गुजर चुकी हैं, लेकिन जौनसारी मिट्टी का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। अपने इस मुल्क में ये लोग खुद को बेगाना महसूस करने लगे हैं। और तो और, एक ऐसा भी समय आया, जब वर्ष 1947 में देश विभाजन के वक्त इन लोगों को देशभक्ति के इम्तिहान से भी गुजरना पड़ा।

बात देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में निवास कर रहे मुस्लिम समुदाय की बल्ती जाति के परिवारों की हो रही है। इन परिवारों के यहां आने की कहानी भी बड़ी रोचक है।

ढाई सौ वर्ष पूर्व कश्मीर से उत्तराखंड होते हुए कुछ कश्मीरी लोग लद्दाख तक व्यवसाय किया करते थे। उनमें बल्ती जाति के लोग भी शामिल थे। हुआ यूं कि उस समय लगभग दो दर्जन बल्ती परिवार व्यावसायिक सफर के दौरान कुछ समय के लिए चकराता के डाकरा गांव में ठहर गए। यहां की मिट्टी की खुशबू उन्हें इतनी भायी कि वे यहीं के होकर रह गए। वक्त के साथ-साथ इन लोगों का कुनबा बढ़ता गया।

वर्तमान में इस क्षेत्र में बल्ती जाति के लोगों की कुल जनसंख्या लगभग तीन हजार के आसपास है। डाकरा के अलावा अब ये लोग जौनसार-बावर के हरिपुर, कालसी, लालकुर्ती व चूना भटटा गांव में भी रहने लगे हैं। अब कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं, जो बल्ती समुदाय के लोगों का मन कचोट रही हैं। जौनसार की वादियों में 250 वर्ष का लंबा सफर तय करने के बाद भी उन्हें उनका हक नहीं मिल पा रहा है।

इन लोगों का कहना है कि सन 1967 में भारत सरकार ने जौनसार-बावर को जनजाति क्षेत्र घोषित किया था, लेकिन कई पीढि़यां गुजारने के बाद भी बल्ती समुदाय के लोगों को आज भी जौनसारी अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा रहा है। और तो और सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी उन तक नहीं पहुंच पा रहा है। जबकि, ये लोग लंबे अरसे से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते चले आ रहे हैं। इस कदर की जा रही सरकारी उपेक्षाओं से डाकरा निवासी मोहम्मद अली (83 वर्ष) काफी व्यथित हैं।

उनका मन दुखी है, लेकिन आज भी गर्व के साथ वो एक पुराना किस्सा सुनाना नहीं भूलते। कहते हैं कि वर्ष 1947 में पार्टीशन के वक्त जौनसार-बावर में रह रहे बल्ती समुदाय के सभी लोगों को चकराता में रह रही आर्मी के ब्रिगेडियर ने तलब किया और 19 नंबर कोठी में उन्हें नजरबंद कर दिया। कुछ दिनों बाद कमिश्नर की मौजूदगी में उनसे सवाल पूछा गया कि वे हिन्दुस्तान में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में।

अली गर्व से बताते हैं कि जौनसार बावर में रहे रहे बल्ती समुदाय के लोगों में से सिर्फ एक व्यक्ति मोहम्मद हुसैन ने पाकिस्तान की राह चुनी। उन्हें फख्र है कि बल्ती समुदाय अपने वतन हिन्दुस्तान को दिलोजान से चाहता है।


SOURCE http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5824787.html

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चकराता में दूर-दूर फैले घने जंगलों में जौनसारी जनजाति के आकर्षक गांव हैं। यह नगर उत्तर पश्चिम उत्तराखंड के जौनसर बवार क्षेत्र के अंतर्गत आता है। चकराता का स्थापना कर्नल ह्यूम और उनके सहयोगी अधिकारियों ने की थी।

उनका संबंध ब्रिटिश सेना के 55 रेजिमेंट से था। यहां के वातावरण को देखते हुए अंग्रेजों ने इस स्थान को समर आर्मी बेस के रूप में इस्तेमाल किया। वर्तमान में यहां सेना के जवानों को कमांडों की ट्रैनिंग दी जाती है।

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जौनसार और रवांई क्षेत्रों मैं शान से  होती है अंतिम विदाई

मानव जीवन में बच्चे के जन्म के बाद कई ऐसे मौके आते हैं, जब जश्न का माहौल बनता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो वह अपने पीछे मातम मनाते परिजनों, रिश्तेदारों को छोड़ जाता है। सामान्यत: जीवन के इस अंतिम सत्य को दुखदायी माना जाता है, लेकिन उत्तराखंड के सुदूरवर्ती अंचल में बसे कुछ लोगों के लिए मौत महज आंसू बहाने की वजह नहीं है।

उत्तरकाशी जिले के रवांई जौनसार इलाके और टिहरी जिले के जौनपुर व में रोने-धोने की बजाय परिजन मृतक की शानदार अंतिम यात्रा निकालते हैं। मृत्यु को मनुष्य जीवन के संकटों से पीछा छूटने का जरिया मानने वाली सदियों पुरानी परंपरा के तहत यहां के लोग मृतक को पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ अंतिम विदाई देते हैं।

रवांई क्षेत्र के विकासखंडों पुरोला मोरी और नौगांव के पट्टी कमल सिंराई, रामा सिंराई, आराकोट, पंचगांई, बडासू, सिंगतूर, अडोर, फते पर्वत, बनाल, ठकराल, मुगरसंती, बड़कोट तथा जौनपुर की दो पट्टियों अलगाड़ व सिलवाड़ सहित जौनसार बावर क्षेत्र के कुछ भागों में रहने वाले हजारों ग्रामीण सदियों से इस परंपरा का निर्वाह करते आ रहे हैं।

इसके तहत गांव के किसी की मृत्यु होने पर रोने-धोने की बजाय, उसकी शानदार अंतिम विदाई देने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। शव के लिए देवदार की लकड़ी से खास डोली तैयार कर उसे रंग बिरंगी फूल मालाओं से सजाया जाता है। मृतक के रिश्तेदार शव के लिए कफन, धूपबत्ती आदि लाते हैं। इसके बाद शव को डोली में रखा जाता है। इस दौरान क्षेत्र के कई गांवों से दर्जनों बाजगी या जुमरिया ढोल, दमाऊ व रणसिंघा जैसे वाद्ययंत्र लेकर मृतक के गांव के बाहर एक विशेष स्थान पर इकट्ठा हो जाते हैं।

गांव से शवयात्रा जब इस स्थान पर पहुंचती है, तो रिश्तेदार डोली के ऊपर रुपये उछालते हैं। जैसे ही मुख्य बाजगी यह रुपये उठाता है, एक साथ दर्जनों ढोल, नगाड़े, दमाऊ व रणसिंघा बजने लगते हैं। इसके बाद शवयात्रा शुरू होती है। रास्ते भर परिजन मृतक के हिस्से का खाद्यान्न, सेब, मूंगफली, दाल, मिर्च, अखरोट आदि बिखेरते हुए चलते हैं। मान्यता है कि यह सामग्री जानवरों व चिड़ियों के खाने से मृतक को पुनर्जन्म तक भोज्य मिलता रहेगा।

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यात्रा के दौरान पूर्वनिर्धारित स्थान पर शवयात्रा को रोका जाता है। यहां डोली को रखकर मुख्य बाजगी उसके सामने एक खास कपड़ा बिछाता है। इसके बाद मौके पर मौजूद सभी बाजगी एक एक कर अपनी जोड़ी के साथ ढोल, दमाऊ, रणसिंघा आदि के वादन कौशल का प्रदर्शन करते हैं।

मृतक के परिजन व शवयात्रा में शामिल अन्य लोग कपड़े पर बतौर ईनाम रुपये रखते जाते हैं। जो बाजगी जीतता है, उसे यह राशि मिलती है। इस परंपरा को पैंसारे के नाम से जाना जाता है।

अंतिम संस्कार का तरीका भी बेहद खास है। डोली को श्मशान घाट लाने के बाद शव को मुखाग्नि दी जाती है। यह रस्म निभाने वाले व्यक्ति (सामान्यत: मृतक का पुत्र) को सबसे अलग एक खास स्थान पर बिठाया जाता है। इसके बाद शवयात्रा में शामिल सभी लोग एक-एक कर उसकी गोद में रुपये डालते हैं। इसे मुख दिखाई कहा जाता है।

इस दौरान गांव में मौजूद महिलाएं महिलाएं गोमूत्र से घर की सफाई करती हैं। शवयात्रा के वापस लौटने पर सभी लोगों पर गोमूत्र व गंगाजल छिड़का जाता है। परंपरा के मुताबिक उस दिन बिरादरी के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता, बल्कि सभी घरों से थोड़ा-थोड़ा आटा, दाल, चावल मृतक के घर पहुंचाया जाता है। सब लोग एक साथ वहीं भोजन करते हैं। इसे 'कोड़ी बेल' कहा जाता है।

क्षेत्र के बुजुर्ग बालकृष्ण बिजल्वाण, खिलानन्द बिजल्वाण, जरबी सिंह, मायाराम नौटियाल, गौरीराम, केशवानंद, गोपाल सिंह नेगी, नोनियालु आदि बताते है कि मृत्यु जीवन का अभिन्न अंग है। ऐसे में जिस तरह बच्चे के पैदा होने पर खुशियां मनाई जाती हैं, वैसे ही मरने पर भी उसे खुशी-खुशी विदा करना चाहिए।

'मुख दिखाई' रस्म के बारे में उन्होंने बताया कि परिवार के मुखिया की अकस्मात मृत्यु होने पर परिजनों के लिए धन की व्यवस्था करने में दिक्कतें होती थीं। इसीलिए सभी के सहयोग से थोड़ी-थोड़ी राशि देकर मृतक के परिजनों की मदद की व्यवस्था की गई।

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हिमला हाउ उनु कोता ये है जौनसारी गीत ,इस गीत को गाया, श्री नरेंदर सिंह नेगी जी ने

इस गीत की सबसे बड़ी मधुरता है इसकी ल्य्ब्दहता और संगीत और भाषा अगर किसी को समझ मैं न आये तो भी इस गीत का आनद उठाया जाता है

Himla, how un kota a josari Garhwali song by Negi ji

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ये गीत  भी जौनसारी भाषा से मिलता जुलता है ,लेकिन इस गेट के बोलों को नेगी जी ने गढ़वाली और जौनसारी भाषा मैं लिखा और गाया है ,ये गीत है सुरमा सरेला एल्बम से

bhujelli ki badi lo jausari folk by narendra sing negi

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DEVIKA CHAHAN




Devika Chauhan was the first girl to graduate from Jaunsar hills in 1954. She, again was the first woman to become a Block Development Officer in the entire state of Uttar Pradesh. She later rose to the level of Asst. Director - tribal welfare.

Played an important part in the survey of tribal communities in the UP hills and securing privileges from Government for them. Retired but comitted to women's cause, She is still working with voluntary agencies in Jaunsar Bawar. Currently lives in Dehradun with a number of children.
Her Biography

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