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Articles On Environment by Scientist Vijay Kumar Joshi- विजय कुमार जोशी जी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 03, 2010, 10:38:04 PM

VK Joshi

नवीन जी आपका स्वागत है-आप किसी भी समय फोरम में या फोन पर (०८८५३७५५८०२) चलक, भूस्खलन इत्यादि की जानकारी मुझ से ले सकते हैं. सेवानिवृति के पश्चात मेरा पुनर्जन्म पत्रकार के रूप में हो चुका है इसलिए अपना समझ कर आप चर्चा कर सकते हैं.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बेहद ख़ुशी मेरापहाड़ के इस मंच पर तो वरिष्ठ पत्रकार एव बुद्धिजीवी लोगो का परिचय हो रहा है!

जय भारत, जय उत्तराखंड

VK Joshi


       
  •     जब फट पड़ा आसमां
    अठ्ठारह अगस्त दो हजार दस का दिन उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद की कपकोट तहसील  के सुमगढ़, सुलिंग एवं सुलिंगउडियार गाँवों में काले अक्षरों में लिखा जाएगा. अचानक  हुई भारी वर्षा के कारण सुमगढ़ का पर्वत चल पड़ा. निकटवर्ती सरस्वती शिशु मंदिर में  निर्बोध १८ शिशुओं एवं एक शिक्षक को अपने प्राण गवाने पड़े. बहुत दुखद घटना है. पर  क्या ऐसा उत्तराखंड में पहली बार हुआ है? इतिहास गवाह है कि पूर्व में भी न जाने  कितनी ऐसी दुखद दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. यदि हम इस प्रतीक्षा में बैठे हैं कि  प्रकृति अपना स्वरूप बदल देगी और बादल फटना बंद हो जाएगा तो हम मुगालते में हैं.  पर्वतीय क्षेत्र और बादल फटना लगभग पर्यायवाची हैं. चोली दामन का साथ है इनका.
    बादल क्यों फटते हैं या इतिहास में कब-कब ऐसा हुआ, इन सब बातों पर विस्तार से  चर्चा फिर कभी होगी. आज तो कपकोट कि दुर्घटना के बाद दुखी मन से केवल कुछ तथ्य  पाठकों तक पंहुचाना चाहता हूँ.
    देखने में एक दम मजबूत चट्टानी लगने वाले हमारे पर्वत बने जब दो महाद्वीप आपस  में २ करोड़ वर्ष पूर्व टकराए. टक्कर का असर यह है कि अभी भी भारतीय प्लेट एशियाई  प्लेट के अंदर धंस रही है. जिस से हिमालय के गर्भ में हर समय तनाव रहता है. कल्पना  कीजिये यदि कोई लोहे की प्लेट को आप एक ओर से दीवार पर जड़ दें और दूसरी ओर से  लगातार उस पर दबाव डालें तो क्या होगा? एक स्थिति के बाद वह चटखने लगेगी. कुछ ऐसे  ही दबाव में पर्वतीय क्षेत्र कि चट्टाने हर समय रहती हैं.
    करोडों वर्ष पूर्व नदियों द्वारा समुद्र में जमा की गई बालू एवं मृदा की परतें  प्राक्रतिक क्रियाओं से ठोस चट्टानों में बदल गयीं. एक समय ऐसा आया कि यही  चट्टानें हिमालय के उदय के साथ फोल्ड होकर आकाश को छूने लगीं. चूंकि यह चट्टाने एक  जैसी नहीं थी इनमे अनेक दरारे बनी. साथ हे अनेक प्रकार के जोड़ भी पड़ गए. उसके ऊपर  भूगर्भ से पड़ता निरंतर दबाव इन चट्टानों को अंदर से और कमजोर करता गया. उधर सतह पर  मौसम की मार, पानी द्वारा कटान, क्षरण आदि से चट्टानों से निरंतर मलबा भी पैदा होता  गया-जो अब भी हो रहा है.
    बस प्रकृति ने एक मेहरबानी की-पर्वतीय ढलानों को वृक्षों के लिए उपजाऊ बना कर  रखा. वृक्षों की जड़े पर्वतीय ढलानों पर बने मलबे एवं चट्टानों को भी जकड कर रखती  हैं. इस प्रकार प्राक्रतिक ताकतों को झेलने के लिए पर्वतीय क्षेत्रों में संतुलन  बना रहता है. इस संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास प्रकृति तो करती ही है, साथ ही अपनी  आवश्यकतानुसार हम भी वृक्षों को कटते रहते हैं. नंगे हो चुके पर्वतीय ढलान प्रकृति  की ताकतों के स्समने असहाय हो जाते हैं.
    पर्वतीय क्षेत्रों में यूँ भी मैदान के मुकाबले अधिक वृष्टि होती है.  सामान्यतः बारिश का पानी ढलानों से होता हुआ गाड़-गधेरे आदि द्वारा नदियों में चला  जाता है. इस पानी का कुछ भाग ऊपर वर्णित दरारों से होता हुआ पर्वत के गर्भ में समा  जाता है. यह पानी कभी भी कहीं भी जगह मिलते ही सीर, नौले, या धारे के रूप में सतह  पर आ निकलता है.
    पर अनेक बार ऐसा नहीं होता. अचानक अति वृष्टि हो जाती है. इस कारण बहुत अधिक  मात्रा में पानी ढलानों पर बहने लगता है जो अपने साथ ढीला पड़ चुके मलबे को  लेकर चलता है, साथ ही काफी सारा पानी पर्वत के गर्भ में चला जाता है. अंदर दबाव  इतना बढ़ जाता है कि पाने चट्टानों के बीच से जहाँ से भी रास्ता मिले पहाड को फाड़  कर बाहर आ जाता है. इस क्रिया से और भी अधिक मात्र में मलबा ढलान में चल पडता है.
    पानी चट्टानों के लिए 'लुब्रिकेंट' का काम करता है. चिकनी पड़ चुकी चट्टाने आसानी से नीचे  खिसकने लगती हैं. बस शुरु हो जता है प्रकृति का तांडव. ऐसा ही कुछ हमेशा होता  है-वो चाहे १८८० में नैनीताल में हुआ हो या १८ अगस्त को कपकोट में. कहानी कुछ ऐसी  ही रहती है-बस मरने वालों की संख्या बदलती रहती है. सरकार मुआवजा देती है, कुछ को  वह भी नहीं मिल पाटा. कालांतर में लोग सब भूल जाते हैं.
    प्रक्रति के इस कोप से तो नहीं लड़ा जा सकता, परन्तु जाने ना जाये इसके उपाय  अवश्य किये जा सकते हैं. सर्वप्रथम तो मकान, स्कूल आदि बनाने से पूर्व भूवैज्ञानिक  की राय अवश्य होनी चाहिए. अमेरिका की यू एस जी एस की वेब साईट पर लिखा होता है 'मकान बना रहे हैं? भूवैज्ञानिक  से सलाह करें'अर्थात वहाँ पर क्लिक करने पर कुछ पैसे देने के बाद स्थान विशेष की भोवैज्ञानिक  स्थिति पर पूरी सलाह मिल सकती है. कुछ ऐसी व्यवस्था उत्तराखंड में होनी चाहिए-उसके  लिए भले ही भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की मदद ली जाये या राज्य सरकार अपना  तन्त्र कायम करे यह सरकार पर निर्भर करेगा. दूसरे जिन्होंने अपने घर पहले से ही  बना रखे हैं उनको ध्यान देना चाहिए कि प्लॉट के चारो ओर पानी की निकासी का उचित  प्रबंध हो. यदि घर के पीछे 'ब्रेस्ट वाल' है तो उसमे 'वीप होल' (पानी निकासी के छिद्र) अवश्य होने चाहिए. स्कूल, अस्पताल,  मंदिर आदि जहाँ अधिक लोगो एकत्रित होते हैं वह स्थान एकदम निरापद होने चाहिए.  सुमगड में जो हुआ अत्यंत दुखद घटना गई-पर चित्रों से देख कर मुझे यही प्रतीत हुआ  कि विद्यालय की स्थिति निरापद नहीं थी-वो बात और है कि पिछले १०० वर्षों में भी  शायद स्थान विशेष में बादल न फटा हो. पर पर्वत को कभी भी 'टेकन फॉर ग्रांटेड' नहीं लेना चाहिए.
  • बाकी फिर. टेक केयर.
  • जय हिंद     

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जोशी जी..

कपकोट यह घटना बहुत ही दुखद है! भगवान् से यही दुवाए है इस प्रकार की घटना कही भी दुबारा na धत्ते !

जोशी जी आपने विचारों से पूर्ण तरह से सहमत.. जिस तरह पहाड़ो में पेड़ कट रहे है वो इस प्रकार के घटनाओ के लिए जिम्मेदार है! पेड़ो की जड़े जमीन को धसने से रोकते है! ज्यादे संख्या में पेड़ कटने से खतरा और भी बड जाती है !

लोगो को इस बारे में जागरुकत देने की भी जरुरत है !

हेम पन्त

सुनने में आ रहा है कि जिस स्थान पर यह घटना घटी है उससे कुछ ही दूरी पर एक जलविद्युत परियोजना की सुरंग बनई है जिसके लिये भारी विस्फोटकों का उपयोग हुआ था. हो सकता है यह जलविद्युत परियोजना ही इन मासूम बच्चों की मौत के लिये जिम्मेदार हो...

सत्यदेव सिंह नेगी

साथ में इस बात की भी आवस्यकता है की लोग भवन बनाने के विशेषज्ञ की राय अवश्य लें स्ट्रक्चर डिजाइन के बिना घर बनाना khatre का सौदा हो सकता है

VK Joshi

हेम-हो सकता है की परियोजना के कारन पर्वत भीतर से दरक गया हो-बिना देखे यूँ कुछ कह सकना कठिन है. पर इतना अवश्य है की स्कूल भवन भूस्खलन की जद में था-अर्थात उसकी लोकेशन सही नहीं थी.
नेगी जी-पहाड़ में शहरों तक में लोग विशेषग्य की राय नहीं लेते-सुदूर गाँव की क्या कहें.

सत्यदेव सिंह नेगी

बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है सर लोग घर पर १०-१५ लाख खर्च कर लेते हैं पर सुरक्षा के नाम पर १०-१२ हजार भी नहीं फिर हम त्रासदी त्रासदी चिल्लाते हैं

VK Joshi

नेगी जी आपको पता हे होगा ई समस्त उत्तराखंड भूकम्प से कभी भी ग्रसित हो सकता है. भूकम्प रोधी भवन बनाने में कुल लागत का २५% अधिक व्यय आता है. लोग ५०% अधिक व्यय कर फालतू बालकनी आदि बनवा लेते हैं पर निर्माण को भूकम्प-रोधी करने से कतराते हैं. भूकम्प या बादल फटने की घटनाएँ बार बार नहीं होती-आमतौर से १०० वर्ष के अंतराल पर होती हैं. इतने समय में लोग भूल जाते हैं कि दादा या परदादा के समय में क्या हुआ था! पर खतरे की बात यह है कि पिछला भूकम्प आये १०० वर्ष से अधिक हो चुके हैं मध्य कुमाऊँ का भाग सबसे अधिक 'रिस्क ज़ोन' में आता है-पर हमारा ध्यान खिन और ही है.

नवीन जोशी

जोशी जी, भूकम्पों से बचने के लिए भूकंपरोधी भवनों की बहुत उपयोगिता है, में इससे इतर शायद एक हास्यास्पद सवाल पूछना चाहता था, वह यह कि भूकम्पों या खासकर भूस्खलनों के लिए मानवीय कारण, खासकर जैसे नैनीताल में शहरीकरण या कंक्रीटीकरण की कितनी भूमिका रहती होगी, सवाल इसलिए कि जो भी धरती पर अतिरिक्त भार निर्माण के रूप में डाला जाता है, वह वास्तव में इसी दुनिया से लाकर  डाला जाता है, जैसे नैनीताल या पहाड़ों से मिट्टी पत्थर बहकर नीचे गौला या अन्य नदियों में गए, और वापस उन्हें लाकर नए भवन चिन
लिए गए. दूसरे ग्रह, चाँद आदि से कुछ नहीं आया, यानी धरती का नेट वजन नहीं बढ़ा. हाँ इसे स्थांनांतरण जरूर कह सकते हैं और कुछ हद तक धरती का बैलेंस बिगड़ना कह सकते हैं. बड़ी सुरंगों से जरूर भू स्खलनों की संभावना बढ़ना समझ में आता है.