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Articles On Environment by Scientist Vijay Kumar Joshi- विजय कुमार जोशी जी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 03, 2010, 10:38:04 PM


VK Joshi

नवीन जोशी जी देरी से उत्तर के लिए क्षमा चाहता हूँ:
जोशी जी, जापान की स्थिति बड़ी विचित्र है. उसकी स्थिति ५ प्लेटों के जोड़ पर है, तथा वहाँ पर १०५ एक्टिव ज्वालामुखी भी हैं साथ ही जापान पैसिफिक रिंग ऑफ फायर का हिस्सा भी है. जापान की ७८% जमीन घने वनों से आच्छादित है तथा रिहायिश के काबिल नहीं है. बाकी बची जमीं पर ही उनको सब कुछ करना होता है. बेहद कर्मठ लोग हैं उन्होंने अपने घरों को ऐसा बनाया है कि बड़े से बड़े भूकंप भी कुछ नहीं कर पाते. हादसा जो फुकिशिमा में हुआ वह सुनामी के कारण हुआ-जिसका अनुमान तो लग चुका था पर बचाव का उपाय नहीं था. हिमालय में समस्या दूसरे प्रकार की है. भूकंप रोधी घर नहीं हैं, नवोदित पर्वत श्रेणी है इसलिए भूस्खलन बहुत होते हैं.भूकंप के साथ भी भूस्खलन होते हैं-जैसा चमोली में हुआ था. इसलिए वहाँ पर आवश्यकता है भूकम्परोधी मकानों की तथा भूस्खलन से बचाव की. उत्तरकाशी में कोठी बनाल गाँव का उदाहरण आज भूकम्परोधी निर्माण के लिए दिया जाता है. वहाँ के घर १००० वर्ष से अधिक खड़े हैं. दूसरे शब्दों में हम यदि पुरुखो का अनुकरण मात्र ही कर लेते तो सेफ रहते. पर अब शायद कुछ नही हो सकता. भूकंप के रिक्टर स्केल पर मत जाइए-यदि घर कमजोर नींव पर है तो जरा से कंपन से गिर जाएगा. उपाय मात्र इतना करना है कि नियमों का पालन सरकार व समाज दोनों करे-नहीं करेंगे तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


जोशी जी धन्यवाद,

उत्तराखंड को सबसे ज्यादे खतरा भूकंप एव भूस्खलन से है !  हमारा आपदा प्रवंधन बहुत ही कमजोर है! आज जापान में इतना बड़ा
भूकंप और सुनामी के आने के बाद भी उन लोगो ने रात दिन एक कर एक सप्ताह में ही सारे रेल एव बस सेवाए आदि सुचारू कर दी है !

उत्तराखंड में आये पिछले साल के प्राकर्तिक आपदा में अभी तक भी सड़के नहीं बन पायी है और ना ही लोगो के अच्छे
तरह से घर  नहीं बन पाए है !

लेकिन इन खतरों को ध्यान में रखते हुए लोगो को सचेत करना चाहिए! चाहे गैर सरकारी संस्था या सरकार को आगे आना चाहिए !



VK Joshi

I want to post regularly Warrior, but I have taken too many assignments. I think I will go slow like this for some time for this site and then catch up. Sorry for being irregular-but there are places where I have to be regular. Here I write for sake of my Uttarakhand and my frens, while at other places I write for the sake of profession.

VK Joshi

लो फिर आ गया मौसम बरसात का
पिछली  बरसात की त्रासदी के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि अगली बरसात प्रारम्भ हो गयी. इस विषय परकुछ भी लिखने के पूर्व मित्रों आप सबसे माफी मांगना चाहता हूँ, क्योंकि इतने दिन से मैं गायब था, हायिबरनेट कर रहा था और आज फिर बरसाती मेढक के समान आपके सामने उपस्थित हो गया. पर यकीन मानिए ऐसा मजबूरीवश होता है, जानबूझकर नहीं.
खैर अब बात करे बरसात की. उत्तराखंड में बरसात तो पिछले दो करोड वर्षों से हो रही है, आज कोई नई बात नहीं है. इसलिए जब कोई कहता है कि इस वर्ष वर्षा अधिक हुई तो मुझे हंसी आती है क्योंकि कहने वाल तुलना करता है पिछले वर्ष की वर्षा से. यहाँ तो करोड़ों वर्षों की बात हो रही है. इन्ही प्रागैतिहासिक बरसातों के कारण पहले नालियों का, फिर गधेरों का और फिर छोटी और बड़ी नदियों का जन्म हुआ.
इसी बात तो दूसरे नजरिये से सोचिये कि यदि इस ड्रेनेज का क्रमिक विकास न हुआ होता तो आज क्या होता-पर्वतवासी भी सब मेरी भाँती 'प्लेन्स' में रह रहे होते! अर्थात प्रकृति ने जल की निकासी का पूरा ध्यान रखा. जहां पर निकासी न हो सकी और पानी अधिक रुक गया वहाँ पर ताल बन गए.
आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व की बात करे तो मेरे नानाजी बरसात के दिनों में उस समय के अल्मोडा जनपद के दौरे पर जाते थे और सिवा इसके कि बरसात में अक्सर सामान भीग जाता था और कोई परेशानी नहीं होती थी. बारिश तब कुछ अधिक ही होती थी आज से, ऐसा मौसम विभाग के आंकड़े बोलते हैं. भूस्खलन तब भी होता था, पर मुख्य मोटर मार्ग काठगोदाम-रानीखेत-अल्मोडा यदा-कदा ही बंद होता था. क्योंकि प्रकृति के रूप को पहचानते हुए 'क्रूर' अँगरेज़ शासकों ने मोटर रोड की 'ब्रेस्ट वाल' और 'रिटेनिंग वाल' दोनों में कुछ कुछ दूरी पर 'वीप होल्स' छोड़े हुए थे-जिनको हमेशा साफ़ रखा जाता था. लिहाजा बारिश का पानी बिना रुके तुरंत बह कर घाटी में चला जाता था. सड़क की एक निश्चित लम्बाई के लिए गैंग लगी रहती थी और उनका एक मेट होता था. सिस्टम तो आज भी वही है, लेकिन हम हिन्दुस्तानी उस टाईम में भी 'मस्टर रोल' में गडबड करके अमीर बनने की कोशिश करते थे, पकड़े गए तो अँगरेज़ 'इनक्वायरी ' नहीं करता था, सीधे जेल भेजता था-इसलिए ज्यादातर लोग ऐसा करने से डरते थे. जो निडर थे वे 'ओपरसेठ' (ओवर सीयर) कहलाये, पर नाम को ही, क्योंकि नौकरी नहीं बच पाती थी. कुल नतीजा यह था कि भूस्खलन कम होते थे, हुए भी तो तुरंत साफ़ कर रोड खोल दी जाती थी.
आज क्या होता है यह यहाँ मुझे लिखने के जरूरत नहीं है.
सवाल यह है कि क्या इस बरसात में सडकें बचेंगी? इसका उत्तर तो सरकार दे सकेगी. पर आप सोचिये कि इस बरसात में क्या आप अपनी पिछाड़ी की दीवार को गिरने से बचा सकेंगे? इसका उत्तर है 'हाँ'. यदि आप इस लेख को पढते ही उस दीवार पर बने 'वीप होल्स' की सफाई करा लें, दीवार के ऊपर यदि ढलान है और उसमे पद नहीं है तो कमसे कम उस पर घास लगवा कर उसके क्षरण पर रोक लगाएं, घर के चारों और जो नाली है उसे साफ़ रखे और इस बात की पुष्टि करें कि आपके घर से जल निकासी का मार्ग अवरुद्ध नहीं है.
मित्रों अनहोनी को छोड़ दें तो बरसात में काफी हद तक भूस्खलन से बचा जा सकता है यदि जल की उचित निकासी हो. इसलिए अपना और अपने पड़ोसी के घर को बचाने के लिए आपस में मिल कर निकासी का निरीक्षण अवश्य करें.
मोटर मार्ग के किनारे यदि आपका घर है तो इस बात का ध्यान रखें कि आपके घर से निकलने वाला जल मार्ग में न बहे, बल्कि उसकी त्वरित निकासी हो.
पिछली बरसात में जो हुआ, इस बरसात में ना हो इस बात की कामना सहित आपसे बिदा लेता हूँ. शीघ्र मिलूँगा.
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Joshi ji .. welcome back.

जोशी जी पिछले साल के बरसात में उत्तराखंड में जो तबाही हुयी शायद मुस्किल से भुलाया जा सकता है ! आपके के द्वारा दिए गए सुझाव अति महतवपूर्ण है आशा है लोग इन्हें अमल में लायंगे !

जहाँ तक रोड का सवाल है मै इस रविवार को ही घर से लौटा है, अभी भी पिछले साल बारिश से बाई हुयी सडके नहीं बन पाई है इससे प्रतीत होता है उत्तराखंड सरकार कितनी सुस्त है ! 

VK Joshi

मेहता जी रोड का बनने का प्रश्न ही नहीं उठता क्यूंकि ठेकेदारी का मामला है. अगर बारिश का यही हाल रहा तो रोड का और बुरा हाल होगा.


VK Joshi


२०११ तो लगा जैसे चुटकियों में बीत गया! मैं नेताओं की भाँती वादे करता रहा पर बहुत कम लेख यहाँ पर लगा पाया. इसका यह अर्थ नहीं कि मुझे आप सबकी याद नहीं आ रही थी या मैं अपने पहाड़ को भूल गया. ऐसा कुछ नहीं था. अगर था तो कुछ कार्य अधिकता और कुछ सामाजिक व्यस्तता के कारण. कोशिश करूँगा कि अब इस प्रकार गैरहाजिर ना रहूँ. पाठकों २०११ की एक उपलब्धि यह रही कि मैने जीवन में प्रथम बार ६ रेडियो नाटक लिखे  विज्ञान प्रसार विभाग के लिए. यह नाटक प्रत्येक रविवार सुबह ९.१० पर एवं रात ९.३० से आकाशवाणी से प्रसारित किये जा रहे हैं.
ऊर्जा संकट हम सब पर मंडरा रहा है. सरकार और वैज्ञानिक कह रहे हैं कि आणविक ऊर्जा हमको संकट से उबारेगी. क्या वास्तव में हम उबरेंगे या किसी दूसरे संकट में फंसेंगे-यह तो समय ही बता पायेगा-लीजिए पढ़िये इस बारे में मेरा लेख:
जैतापुर बनाम टाईम बॉम्ब
वर्ष 2011 के प्रारंम्भ में जापान के फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर में हुए सुनामी के तांडव के बाद से सभी देशों के निवासी परमाणु ऊर्जाघरों को शक की निगाहों से देखने लगे हैं. फ़्रांस में तो 5 दिसंबर को नोजेंट-सूर-सीन के परमाणु ऊर्जा घर में ग्रीनपीस कार्यकर्ताओं ने धावा बोल कर वहाँ के संयत्र बंद कराने का प्रयास तक कर डाला. फ्रांस में कुल विद्युत की मांग की तीन चौथाई से अधिक परमाणु ऊर्जा से आपूर्ति की जाती है.   
भारत में बढ़ती हुई ऊर्जा की मांग को देखते हुए परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए पूरी तैय्यारी है. इसीलिए 6 दिसंबर 2010 को भारत और फ्रांस के बीच हुए समझौते के अंतर्गत विश्व का सबसे बड़े ऊर्जा संयत्र महाराष्ट्र के जैतापुर में लगाने का निर्णय लिया जा चुका है.
संपूर्ण विश्व में इस समय परमाणु ऊर्जा के विरोध में सुगबुगाहट चल रही है. भारत में भी जैतापुर को लेकर परमाणु ऊर्जा के समर्थन और विरोध की लॉबी अपना-अपना काम कर रही हैं. ऊर्जा तो हमको चाहिए ही. जैविक ऊर्जा, जलविद्युत सभी के अपने अपने पर्यावरणीय जोखिम हैं. साथ ही जैविक ऊर्जा के श्रोत चंद वर्षों के मेहमान हैं.
परमाणु ऊर्जा, प्रदूषण की दृष्टि से सबसे साफ़ है. पर चेरनोबिल और फुकुशिमा दुर्घटनाओं के बाद से सभी राष्ट्रों की जनता रेडिएशन के भय से ग्रसित है. जैतापुर परियोजना को लेकर भी अनेक प्रश्नचिन्ह लगे हैं. अमेरिका के सुप्रसिद्ध भूकंपविद रोजर बिल्ह्म और भारत के ख्यातिप्राप्त भूभौतिकीविद वी. के. सिंह गौड़ के अनुसार परमाणु बिजलीघर बनाने के पूर्व उस क्षेत्र के पिछले एक हजार वर्षों में आये भूकंपों का आंकलन आवश्यक है.
अफ़सोस कि हमारे इतिहास में भूकंपों का बहुत कम रिकार्ड है. जैतापुर के निकट दैबुली में वास्कोडिगामा की नावों को 1525 में एक सुनामी ने अस्तव्यस्त किया था इसका रिकॉर्ड अवश्य मिलता है.
यूँ तो जैतापुर सुरक्षित है. पर जोखिम सिर्फ इस बात का है कि भारतीय प्लेट के प्रतिवर्ष पांच सेंटीमीटर एशियाई प्लेट के अंदर धंसने से जो तनाव पैदा हो रहा है उससे प्लेट का उत्तरी भाग बिल्ह्म और गौड़ के अनुसार लगभग 4-6 कि. मी. नीचे धंस चुका है, तथा मध्य भाग लगभग 400 मी उपर उठ चुका है साथ ही इसी तनाव के प्रभाव से प्लेट का दक्षिणी भाग लगभग 40 से 60 मी नीचे धंस गया है. विश्व की अन्य प्लेटों में इस प्रकार के धंसने और ऊपर उठने की रिपोर्ट अभी तक नहीं है. इस प्रकार के तनाव बड़े भूकंप पैदा कर सकते हैं. कोयना, लातूर के भूकंपग्रस्त क्षेत्र जैतापुर के पास ही हैं और वहाँ अब भी 6.3 से 6.4 परिमाण के भूकंप आ सकते हैं.
परमाणु ऊर्जाघर की आयु 20 से 30 वर्ष होती है. तत्पश्चात जितनी सावधानी से ऊर्जाघर बनाया जाता है उस से भी अधिक सावधानी से उसे निष्क्रिय किया जाता है-जिसकी लागत ऊर्जाघर बनाने और उस से प्राप्त हुई ऊर्जा की कीमत से कहीं अधिक आती है. अंबेडकर विश्विद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर वेंकटेश दत्त के अनुसार उन्होंने इंग्लैंड में वेल्स के परमाणु ऊर्जाघर को निष्क्रिय किये जाने की क्रिया देखी. इस कार्य के लिए वहाँ की सरकारी 'नेशनल डीकमिशनिंग एजेंसी' ने इस कार्य का ठेका एक 'साईट लाईसेंस' कंपनी को दिया है. इस कंपनी के सैकड़ों कर्मचारी रोबोट यंत्रों की सहायता से ऊर्जा संयंत्र को निष्क्रिय करने में लगे हैं. इस कार्य में वर्षों लगते हैं. तिस पर भी यदि निष्क्रिय आणविक ईंधन का निस्तारण सुरक्षित रूप से नहीं किया गया तो वह कभी भी विकिरण फैला सकता है. 
सौभाग्यवश देश के अभी तक बने आणविक ऊर्जाघरों में कोई बड़ी दुर्घटना नहीं घटी है. पर फिर भी विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जाघर बनाने के पूर्व शायद ऊर्जा के अन्य स्रोत जैसे सौर ऊर्जा, एवं बायोमास ऊर्जा की संभावनाओं पर एक बार गंभीर विचार कर लेना उचित होता!
कहीं ऐसा तो नहीं की हम अनजाने में देश को टाईम बॉम्ब पर बैठाने जा रहे हैं?