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ON-LINE KAVI SAMMELAN - ऑनलाइन कवि सम्मेलन दिखाए, अपना हुनर (कवि के रूप में)

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 11, 2010, 11:45:47 AM


dramanainital

अता हुआ है आदमी को ऐसा मुस्तक्बिल,
पा जाये सब, मगर पा कर भी परेशान रहे.

फ़िक्र में डूब रहे सब अदीब-ओ-दानिशमन्द,
एक ग़ाफ़िल को मगर पूरा इत्मिनान रहे.

कहर देखा तेरा, तेरी नवाज़िशें देखीं,
कोइ दो चार दिन हम भी तेरे मेहमान रहे.

कोई तो सीख गया चन्द किताबी बातें.
किसी के हिस्से ज़िन्दगी के इम्तिहान रहे.

आज जी आया जी भर के जी की बात कहूँ,
जी में आए तो मुझे कोई बदगुमान कहे.

दीपक पनेरू

यो काली चंचल आख्यू मा,
सुरमा को रंग कतु भौल लागू,
तेरी गोरी मुखुड़ी मा यो,
चन्दन टीका भौल लागू,
तेरी रूप की क्या बात करू,
चाँद ले शरमा गयी...
ओ गोरी मुखुड़ी वाली आब तू मेरी,
मैं तेरी भई, हाँ मैं तेरी भई....

दीपक पनेरू


तेरी मजबूरियों को हम गुनाह समझ बैठे,
खुद से की थी वफ़ा इस कदर....
इम्तेहान लेती रही जिंदगी दर-ब-दर,
तेरी
गलतियों को गुनाह समझकर...

सत्यदेव सिंह नेगी

यूँही नहीं आपको हम गुरु मान बैठे दीपक
साहित्य मानो आपसे सट के गया है चिपक
आपकी हर नज्म से प्रेरणा रही है टिपक
ढुं ढुं  मै आपको हर गली पलक झपक
Quote from: दीपक पनेरू on November 16, 2010, 10:03:46 AM[/q]

तेरी मजबूरियों को हम गुनाह समझ बैठे,
खुद से की थी वफ़ा इस कदर....
इम्तेहान लेती रही जिंदगी दर-ब-दर,
तेरी गलतियों को गुनाह समझकर...

सत्यदेव सिंह नेगी

आप हैं

नंबर एक गवय्या

आपकी हर मात्रा में छोटा छोटा

कलाकार है

जय हो दीपक आपकी


Quote from: दीपक पनेरू on November 16, 2010, 10:02:15 AM
यो काली चंचल आख्यू मा,
सुरमा को रंग कतु भौल लागू,
तेरी गोरी मुखुड़ी मा यो,
चन्दन टीका भौल लागू,
तेरी रूप की क्या बात करू,
चाँद ले शरमा गयी...
ओ गोरी मुखुड़ी वाली आब तू मेरी,
मैं तेरी भई, हाँ मैं तेरी भई....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


है गयी दस साल उत्तराखंड कै
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अब है गयी दस साल उत्तराखंड कै
का छू विकास, कैके विकास!

धार डान सुखी छा
नौकरी चाकरी फीकी छा!

भागा भाग उस्से छू
पानी क प्यास उस्से छो

बिजुली ओण जान उस्से छो
पर्यटन क विकास, विकास नि भई

१० साल क शाशन में
५ मुख्यमंत्री .. यो सो असली विकास


दीपक पनेरू

दस साल का उत्तराखंड

आज विकास के लिए, फिर रोता मेरा पहाड़ है,
  कही नदी बनी कहर, तो कही पहाड़ो की दहाड़ है,

    दस साल का उत्तराखंड, अब लगा है बोलने, 
  धीरे धीरे पर अब सब, राज लगा है खोलने,

  कि किसने बसाया है इसे, कौन उजाड़ने को है तैयार, 
  कौन बना बैठा है दुश्मन, कौन बना बैठा है प्यार,

  शिक्षा का बाजारीकरण, और गरीबी कि मार, 
  फिर पहाड़ो से पलायन, फिर वही अत्याचार,

  कोई दबा स्कूल के नीचे, कोई नदियों का बना निवाला, 
  कोई गिरा चट्टानों से और, कोई नहीं देखने वाला,

  बस साल दर साल,  इसके खंड खंड होते रहे, 
  अपनी पवित्र देव भूमि को, अब पवित्र कौन कहे ?

  चोरी यहाँ मक्कारी यहाँ, हर चीज कि बाजारी यहाँ, 
  पानी भी लगा है बिकने, गरीब आदमी जाए कहा ?

  चीख चीख कर  ये सड़के, और छोटे छोटे रास्ते, 
  दम तोड़ रहे है सब, कोई जल्दी कोई आस्ते,

  क्या निशंक क्या खंडूरी, विकाश से रही सभी कि दूरी, 
  अपने लिए है लड़े है सब, कौन करे जरूरतें पूरी,

  केंद्र से करें उधारी, इन पर उधारी का पाप चड़ा, 
  डकार गए विकाश का पैसा, कौन इनमें हक़ के लिए लड़ा,

  इस पांच सौ करोड़ का, क्या हिसाब ये बताएँगे, 
  छीन लिए जिन गरीबो के आशियाने, क्या फिर से ये बसायेंगे,

  टिहरी डूबाकर इनके मन को, अभी तक ना चैन मिला, 
  पता नहीं क्या डूबेगा अब, कोई शहर या कोई जिला,

  दीपक यही अब सोचकर, क्या क्या इनके बारे में लिखे, 
  कुछ करनी कुछ करतूत इनकी, सारी करनी यही दिखे,

  उत्तराखंड अब बचपन से, कुछ समझदार होने को आया है, 
  अब थोडा मुस्कराने दो इसे, नेताओं ने खूब सताया है,

विनोद सिंह गढ़िया

 
दीपक जी पनेरू को "दस साल का उत्तराखंड" शीर्षक पर अपनी रचना के लिए धन्यवाद.