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Jim Corbett Park, Ram Nagar Uttarakhand- जिम कार्बेट पार्क रामनगर उत्तराखंड

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 12, 2010, 08:14:54 AM



Devbhoomi,Uttarakhand

कार्बेट पार्क: मनोहारी दृश्य देख पर्यटक मुग्ध
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रामनगर

छह माह से बंद पड़े कार्बेट के ढिकाला जोन दूसरे दिन भी पर्यटकों से गुलजार रहा। पर्यटकों ने ढिकाला क्षेत्र के खूबसूरत नजारों का आनंद लिया। इस दौरान पर्यटक पार्क के नैसर्गिक सौंदर्य देख काफी रोमांचित हुए।

कार्बेट के अंदर गये मीडिया कर्मियों ने जब पर्यटकों से पार्क में भ्रमण के बारे में पूछा तो उन्होंने इसे कभी न भूलने वाला दिन बताया।

सूरत से आये हीरा व्यापारी अशोक मेहता ने बताया कि वह 1987 से अब तक यहां पांच बार आ चुके हैं। वह जिम कार्बेट के फैन हैं। उन्होंने बताया कि यहां के घने जंगल, सुंदरता व स्वछंद विचरण करते वन्य जीवों के दृश्य काफी पंसद हैं। यह सभी चीजें उन्हें यहां खींच लाती है। उन्होंने यहां के स्टाफ की सराहना करते हुए कहा कि यहां काफी सुविधा व सुरक्षित जगह है।

महाराष्ट्र से आये डा. कदम ने बताया कि वह अपने परिवार के साथ यहां आये। वह बार - बार यहां आना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा यहां की सुंदरता उन्हें भाती है। शोर शराबे से दूर शांत वातावरण में भ्रमण करना अपने आप में एक रोमांच पैदा करता है। इसलिए इस बार वह अपने परिवार के साथ पार्क में पहुंचे है।

पूना से आई मंगला ने बताया कि जिम कार्बेट के बारे में सुना था। अपने नाम के अनुरूप कार्बेट पार्क बेहद सुंदर है। कई जगह घूमने के बाद वह कार्यक्रम बनाकर अपने परिवार के साथ यहां पहुंची है। उन्होंने बताया कि हाथी, मोर, बंदर, हिरन आदि वन्य जीव देखकर वह काफी खुश हैं। इस दिन को अपने जीवन में हमेशा याद रखेंगी।

पूना से ही आई नौ वर्षीय आरोही तो वाऊ कहकर ही चहक उठी। उसने बताया कि उसे यहां के सुंदर नजारे बहुत पसंद आये हैं। कोई चीज ऐसी नही है जिसे सुंदर नही कहा जा सकता है। उसने कार्बेट का नाम इंटरनेट में देखा था। तब से यहां आने का मन बनाया था। आरोही ने बताया कि वह आगे भी बड़ी होकर यहां आना पसंद करेगी।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6911953.html

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Anil Arya / अनिल आर्य

ग्रामीणों ने गुलदार को जिंदा जला डाला
कोटद्वार। कार्बेट नेशनल पार्क की अदनाला रेंज के अंतर्गत ग्राम बीरोंबाड़ी-धामधार में वन विभाग के पिंजरे में कैद हुआ एक गुलदार ग्रामीणों के गुस्से का शिकार बन गया। ग्रामीणों ने उसे मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया। यह सनसनीखेज वाकया बुधवार देर शाम को हुआ।
कालागढ़ टाइगर रिजर्व प्रभाग के डीएफओ की अगुवाई में वन विभाग की टीम बीरोंबाड़ी की एक गोशाला में बंद गुलदार को पिंजरे में कैदकर लौट रही थी। बताते हैं गांव से निकलते ही रास्ते में महिलाओं सहित कई लोगों ने पिंजरे को अपने कब्जे में ले लिया। देखते ही देखते मिट्टी का तेल उड़ेलकर गुलदार सहित पिंजरे को आग के हवाले कर दिया। ग्रामीण इस कदर गुस्से में थे कि वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी उन्हें रोकने में कामयाब नहीं हो पाए। इस घटना के बाद रेंज अधिकारी जीआर पांडे ने दूरभाष पर बताया कि ग्रामीण दरांती, लाठी-डंडे आदि से लैस होकर आए थे। पांडे ने कहा कि इस मामले में आवश्यक कार्रवाई की जा रही है। गौरतलब है कि बीरोंबाड़ी में गुलदार के हमले में तीन ग्रामीण घायल हो गए थे। उन्हें कोटद्वार के राजकीय संयुक्त चिकित्सालय में दाखिल कराया गया। इस घटना के बाद से लोग ही बेहद भड़के हुए थे। पिंजरे में कैद कर लौट रहे थे वनकर्मी
http://epaper.amarujala.com//svww_index.php

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
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  और मसीहा के रूप में आए जिम कार्बेट     Jul 24, 07:02 pm   बताएं       बृजेश भट्ट, रुद्रप्रयाग
बीसवीं सदी में रुद्रप्रयाग के लिए मसीहा बनकर आए जिम कार्बेट को जिले के लोगों ने भुला दिया है। क्षेत्र को नरभक्षी बाघ के आतंक से मुक्ति दिलाने वाले जिम कार्बेट के नाम पर मुख्यालय में एक मात्र स्मारक है, उसकी भी बदहाल स्थिति किसी से छिपी नही है। अलबत्ता एक संस्था की ओर से गत वर्ष से जिम कार्बेट के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें याद कर लिया जाता है।
25 जुलाई 1875 को नैनीताल में जन्मे प्रकृति प्रेमी व छायाकार एडवर्ड जिम कार्बेट का रुद्रप्रयाग के लिए योगदान अविस्मरणीय है। बीसवीं सदी की शुरूआत में रुद्रप्रयाग क्षेत्र नरभक्षी बाघ के आतंक खौफजदा था, लेकिन इससे छुटकारा दिलाने वाला कोई नहीं था। 125 लोगों को शिकार बना चुके नरभक्षी का आतंक ऐसा था कि लोगों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया था। इसी बीच मसीहा बनकर जिम कार्बेट रुद्रप्रयाग पहुंचे और 70 दिनों के प्रयास के बाद दो नरभक्षी गुलदार को मारने में सफलता हासिल की। इसमें से एक को बेंजी के पास व दूसरे को गुलाबराय में मार गिराया। उस समय के रुद्रप्रयाग निवासी शिव सिंह जगवाण बताते है कि पूरा क्षेत्र उनकी आवभगत में जुटा रहा और उन्हें लोग मसीहा के रूप में पूजने लगे। वहीं इस सबके बावजूद आज जिम कार्बेट को याद करने वाले चंद लोग ही जिले में शेष हैं। जिले में जिस स्थान पर जिम कार्बेट ने नरभक्षी गुलदार को मारा था वहां पर एक मात्र स्मारक बनाया गया है, वह भी बदहाल स्थिति में है। सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले रंगकर्मी ओपी सेमवाल कहते हैं कि पिछले दो वर्षो से जिम कार्बेट स्मारक के सौन्दर्यीकरण एवं संग्रहालय के लिए वन व पर्यटन विभाग से सम्पर्क कर प्रस्ताव भी भेजा गया, लेकिन अभी कोई भी कार्रवाई नहीं हुई है।
आज भी ताजा हैं कार्बेट की यादें
नगर निवासी 92 वर्षीय शिवसिंह जगवाण अपने अनुभवों को बांटते हुए कहते हैं कि हालांकि वह उस समय मात्र छह वर्ष के थे, लेकिन जिमकार्बेट के प्रति जनता में बड़ा प्रेम व श्रद्धा थी, उनका भव्य स्वागत होता था तथा सामुहिक रुप से लोग उनके लिए भोजन बनाते थे। वहीं जिम कार्बेट के काफी नजदीकी रहे गुलाबराय के ईश्वरीदत्त देवली के पुत्र काशीराम देवली कहते हैं जिम कार्बेट ने उस समय सत्तर दिनों तक रुद्रप्रयाग में रह कर संघर्ष किया तथा आखिरकार बाघ को मार गिराया।
जिम कार्बेट से जुडे़ कुछ मुख्य बिन्दु:-
-रुद्रप्रयाग में कार्बेट द्वारा मारे गए नरभक्षी बाघों की संख्या-2
-70 दिनों तक रुद्रप्रयाग में किया प्रवास
-टार्च खराब होने पर मंगाई कलकत्ता से

(Source-dainik jagran)



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देश के सबसे लोकप्रिय टाइगर रिजर्वो में से एक उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट रिजर्व इस साल अपनी 75वीं सालगिरह मना रहा है। 1936 में स्थापित हुआ कॉर्बेट नेशनल पार्क देश का सबसे पुराना वन अभयारण्य है।

इसके लिए कई सारे आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई है। इसमें टाइगर रिजर्व फाउंडेशन की स्थापना से लेकर आसपास के ग्रामीण स्कूलों के बच्चों की 75 मुफ्त ट्रिप, डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, कॉफी टेबल बुक का प्रकाशन तक, सब शामिल हैं। वैसे मुख्य आयोजन 15 मार्च से लेकर 15 अप्रैल के बीच होने हैं। कई वर्कशॉप होंगी जिनमें दुनिया के कई जाने-माने टाइगर एक्सपर्ट हिस्सा लेंगे।

इसी साल पार्क को उसकी नई स्पेशल टाइगर फोर्स भी सुपुर्द किए जाने की योजना है। हाल में कॉर्बेट पार्क में टूरिस्टों की बेलगाम गतिविधियों को लेकर काफी चिंता जाहिर की जाती रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि प्लैटिनम वर्ष में पार्क को इस संकट से दूर करने के भी कदम ढूंढे जाएंगे, जिसने यहां के जानवरों, स्थानीय लोगों और सैलानियों- सबके लिए परेशानी खडी की है।

रामनगर को इसी क्रम में विकसित किए जाने की योजना है ताकि वहां पर्यटन सुविधाओं का ढांचा खडा किया जा सके। प्लैटिनम वर्ष में कॉर्बेट में टाइगर देखने जाने का मजा कुछ और ही सकता है। तैयारी कर लें। यह पार्क हिमालय की तराई में पांच सौ एकड इलाके में फैला है।

शुरू में इसका नाम हैली नेशनल पार्क था। बाद में 1954-1955 में इसे रामगंगा नेशनल पार्क और 1955-1956 में इसे अंग्रेज शिकारी जिम कॉर्बेट का नाम दे दिया गया जिन्हें 1920 के दशक में कुमाऊं के इस इलाके में नरभक्षी बाघों व तेंदुओं के शिकार के लिए जाना जाता है।

कॉर्बेट ने ही इस पार्क की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। यही पार्क 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत आना वाला पहला पार्क था। रामगंगा नदी के किनारे पसरा यह पार्क अपने वन्यप्राणियों के अलावा प्राकृतिक खूबसूरती के लिए भी जाना जाता है।