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Should Gairsain Be Capital? - क्या उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण होनी चाहिए?

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2007, 12:23:04 PM

Do you feel that the Capital of Uttarakhand should be shifted Gairsain ?

Yes
97 (71.3%)
No
26 (19.1%)
Yes But at later stage
9 (6.6%)
Can't say
5 (3.7%)

Total Members Voted: 136

Voting closed: March 21, 2024, 12:04:57 PM

Thul Nantin

Apart from this most of the netas, whether from the ruling party or the opposition have their business operations/ palatial houses in Noida, haridwar, rudrapur etc. , it will be tough for them to move around easily from Gairsain, so they'll keep opposing
Quote from: mahender_sundriyal on October 11, 2007, 03:10:51 PM
Namaskar,

This issue is emotional as well as developmental.  Emotional because all along our struggle for statehood, we had believed that the capital would be Gairsain (Chandranagar).  Suddenly, we find that Dehradun is going to be our capital for all times to come if the politicians and bureaucrats have their way.   Emotional because all along we believed that the capital would be in Pahad and not plains or Doon valley.  Emotional because we believed that the State belonged to the Pahadis, created for Pahadis.  With the capital in the plains, we seem to be cheated. 

There is the developmental aspect.  If the capital is situated in the hills (Gairsain), a whole range of activities would follow suit.  Roads would have to be carved/widened, whole structure of capital would mean spending a huge amount in the hills, thus beneficial to the Pahadis.  Pahadis would get work, jobs would be created, UP-Cadre wallas would leave, crores of rupees would be spent in the Pahad, facilities in the hills nearby would be upgraded.  Now, this would not materialise.  Why?

I have a sneaking feeling that the politicians would never agree to Gairsain.  After chatting informally with all hues of politicians (smaller fries as well as ministers) during the last 5-6 years, I feel they are afraid of shifting/establishing the capital in the hills because then they would be at the mercy of the local populace in the hills with no getaways. 

So far as bureaucrats are concerned, they would never agree nor would they allow the politicians to establish the capital in the hills, that too at a remote place like Gairsain.  As we are aware, the bureaucracy in UK is dominated by UP-cadre/plainswallas.  They have a vested interest in keeping the capital at Doon.  They are not interested in serving the Pahadis but in exploiting it.  Please go through the list of officers posted in the hills.  You will find that most of the plainswallas/UP-Cadrewallas are posted in larger cities like Doon, Nainital, Mussorie, while most of the lower-rung officers belong to Pahad and posted in the hills.  It is surprising that headquarters of most of the posts located in the remote corners have been shifted to the capital and nobody has pointed it out, not even our reportedly vigilant media.

Now the third angle.  If I remember correctly, most of the agitations have been held at Gairsain instead of Dehradoon, therefore the media avoided it.  Without the media attention/hype, it petered out.  If the agitations are held at Doon or Delhi, the media would lap it up and a pressure would be built on the politician-bureaucracy nexus.

Please do air your views on this.

Namaskar

Thul Nantin

Only public can do something. either elect very good netas or come to the streets for AANDOLAN otherwise ये लोग झुनझुना थमाते रहेंगे जनता को
Quote from: राजेश जोशी/rajesh.joshee on December 13, 2007, 12:49:09 PM
मेहता जी,
आपने विषय तो अच्छा चुना है पर मेरा कहना है की इस विषय पर काम कम और राजनीति ज्यादा हो रही है.  दोनों पार्टियों की सरकारें इसके लिए बराबर जिम्मेदार हैं.  उ०क्रा०द० के अलावा कोई भी दल नारेबाजी के अलावा गैरसैन राजधानी नही चाहता.  उसमें उन सबके अपने स्वार्थ हैं, यह आरोप है की उ०क्रा०द० के लोगों ने राजधानी के लालच में वहाँ पर जमीनी खरीद ली थी.  आपने गैरसेन का नाम सुना है पर निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम/हल्द्वानी से करीब १५० किलोमीटर जाने में वहाँ तक कितना समय लगता है ये शायद कम लोग ही जानते हैं.  अगर सरकार की इच्छा लोगों के साथ होती तो अब तक कम से कम गैरसेन में कुछ विकास तो किया होता.  राजधानी नही तो वहाँ तक पहुँचने की सुविधा तो विकसित की होती, कोई जन सुविधाओं का विकास तो गैरसेन के लिए किया होता.   
राजनीतिज्ञ और नौकरशाह देहरादून जैसी फाइव स्तर सुविधाएं छोड़कर गैरसेन कभी जाने वाले नही हैं.  गैरसेन केवल एक राजनैतिक नारा बन कर रह गया है.  हमारे देश में जनतंत्र जैसी कोई चीज़ नही है यह जनता को महसूस करना होगा.  अंग्रेजों के जाने के बाद नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों का गठजोड़ इस देश को बरबाद करने में लगा है. जिसके लिए जनता पुरी तरह से जिम्मेदार है, क्योंकि हम ही अपने निजी स्वार्थों की वजह से इन लोगों की कठपुतली बने हुए हैं.  नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ द्वारा भोली भाले पड़ी लोगों को गैरसेन राजधानी का सपना दिखाकर अपने स्वार्थ पूरे किए गए हैं. उत्तराखंड राज्य बनने से राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के अलावा किसी को लाभ हुवा हो तो बताएं.  जिन नेताओं की हैसियत ग्राम प्रधान या ब्लाक प्रमुख बनने की नही थी वह विधायक बने हुए हैं.  नया जिला बनने से किसको लाभ होता है नौकरशाहों को क्योंकि जनता के लिए तो वह फ़िर भी अपनी सीट पर नही होते.  गैरसेन का नारा ये लोग भुना चुके हैं और अब यह देहरादून छोड़कर कहीं जाने वाले नही हैं.  अब सात साल तक मामला लटकाकर किसी दिन कोई भी आधार बताकर गैरसेन को राजधानी के लिए अनुपयुक्त बता देंगें और फ़िर देहरादून में बैठे रहेंगे.
जनता को अपने निजी स्वार्थ छोड़कर और इनके बहलावे न आकर अपने विवेक से काम करना होगा और इन नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों को अपनी मांग पुरी करने के लिए मजबूर करना होगा.  ताकि ये टाई और खादी वाले वास्तव में जनतंत्र का अर्थ समझ सकें.   यह केवल गैरसेन राजधानी ही नही हमारी सभी समस्याओं के समाधान हेतु अति आवश्यक है.
अंत में मेरा कहना यही है की हर पहाड़ का वासी चाहता है की राजधानी गैरसैन बने तथा मैदान के लोग भी शायद इसके लिए कुछ शर्तों के साथ तैयार हो जाएं. पर इसके लिए हमारे राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों का सहयोग कभी भी हमें आसानी से मिलने वाला नही है.

Thul Nantin

दिल्ली भी भूकंप के जोन ४ व उसके कुछ हिस्से जोन ५ में आते हैं . राजधानी वहां से हटा कर साउथ में बंगलोर या हेदराबाद कर देनी चाहिए |
Quote from: पंकज सिंह महर on September 11, 2008, 05:13:28 PM
सत्य बचन चारु दा,
        अगर गैरसैंण भूकम्प की दृष्टि से संवेदनशील है या वहां पर पानी की कमी है तो सरकार को वहां के निवासियों को पुनर्वासित करना चाहिये, वह भी उत्तराखण्ड की जनता हैं और उन्हें भी जीने का अधिकार है.....तो क्यों सरकार उन्हें मौत के मुंह में रहने दे रही है... क्या गैरसैंण वासी किसी दूसरे प्रदेश या देश के निवासी हैं?
      ये सब उलझाने की बातें हैं, सबको देहरादून की बासमती और मौसम भा गया है, यहं की सुविधाओं की आदत पड़ गई है, जान-बूझकर यह मामला लगातार लटकाया जा रहा है।

Thul Nantin

यह दोनों जिले शामिल ही इसीलिए किये गए थे कि पहाडियों कि ताकत कम हो सके , नेता मनमानी कर सके छोटे राज्य में , ऐशगाह बना सके पहाड़ों में | उत्तराखंड इसलिए क्योंकि हिमांचल , कश्मीर आदि पहाड़ी राज्यों में बाहरी लोगों का जमीन खरीदना काफी मुश्किल है सो हमारे राज्य पे इनकी नज़र थी | अगर भविष्य में कभी ये गैरसैं को राजधानी बनायेंगे भी तो तब जब सारी बाहर के लोग यहाँ खरीद चुके होंगे और पहाड़ी लोग अल्पसंख्यक हो चुके होंगे |
Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on October 05, 2008, 02:22:04 PM
पहाड़ी राज्य की अवधारणा गैरसैण राजधानी से ही सार्थकOct 05, 12:03 am

रानीखेत (अल्मोड़ा)। पहाड़ी राज्य की अवधारणा तभी सार्थक हो सकती है जब उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैण होगी। आज राज्य का दुबारा पुनर्गठन करने की आवश्यकता है और राजधानी देहरादून से हटाकर गैरसैण बनाई जाए।

यह बात राजनीतिक विश्लेषक प्रो. पुष्पेश पंत ने जागरण से विशेष वार्ता के दौरान कही। उन्होंने कहा कि गैरसैण को प्रदेश की राजधानी बनाने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति बिल्कुल नहीं है। यही कारण है कि राजधानी को लेकर कभी आयोग कभी समिति बैठाकर मामला टाल दिया जाता है। उन्होंने बताया कि गैरसैण को राजधानी न बनाने के पीछे जो तर्क दिए जाते है वह तर्कसंगत नहीं है। भूकम्पीय क्षेत्र व धन की कमी के कारण गैरसैण को राजधानी न बनाना उचित नहीं लगता। श्री पंत ने बताया कि आयोग या समिति यह बताए की भूकम्प का खतरा कहां नही है दिल्ली में तक भूकम्प का खतरा है। धन के अभाव का रोना जो नेता रटते है उन्हे एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि केवल पक्के मकानों से ही राजधानी नहीं बनती। इसके लिए समाज व प्रदेश का विकास जज्बा होना चाहिए। आज नेता इतने सुविधाभोगी हो गये है कि वह गैरसैण को राजधानी बनाना ही नही चाहते। गैरसैण राजधानी के मुद्दे को लेकर जो पार्टी आवाज भी उठा रही है वह भी सिर्फ राजनीतिक है। गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए बहस की जरूरत है। राज्य की आम जनता को एक मंच में आकर गैरसैण राजधानी के लिए संघर्ष करना चाहिए। तभी पहाड़ी राज्य की अवधारणा सफल हो सकती है।

प्रो. पंत ने कहा कि राज्य बनते ही राज्य को बनाने की अवधारणा की खत्म हो गयी थी। राज्य का दुबारा पुनर्गठन की आवश्यकता है। जिसमें हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर को शामिल न किया जाए। वैसे भी नये परिसीमन के बाद आम पहाड़ियों की ताकत कम हुई है। उन्होंने कहा कि राज्य के आम लोगों का विकास तभी हो सकता है जब विकेन्द्रीकरण का मॉडल तैयार किया जा सके

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


ठुल  दाजू,

मेरे हिसाब से सरकार का यह निर्णय सही है! प्रथक उत्तराखंड राज्य बनाने  भी बाद भी लोग छला सा महसूश कर थे क्योकि राजधानी को देहरादून बना दिया गया था! अभी  के हाल एसे है कोई भी कर्मचारी पहाडो में अपनी पोस्टिंग नहीं चाहता! राज्य बनाने के बाद भी पलायन जोरो पर है! अगर गैरसैंन को स्थाई राजधानी घोषित किया जाता है तो इससे पर्वतीय  का इलाको के विकास को गति मिलेगी!


बाबा मोहन उत्तराखंडी ने राजधानी गैरसैंन बनाये जाने के लिए 35 दिनों तक लम्बा अनसन करके गैरसैंन में अपने प्राण त्यागे थे! राजधानी गैरसैंन बनाये जाने के बाद अमर शहीदों की आत्मा को भी शांति जरुर मिलेगी!


जहाँ तक बाहर के के लोगो के जमीन  खरीदने की बाद है सरकार इस नियम पर बदलाव कर सकती है !
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

You can go through this details below. Gairsain is the ideal place for capital.
कहां से कैसे पहुंचे गैरसैंण
  रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग (33 किमी): स्टेशन - रुद्रप्रयाग, नगरासू, गौचर और कर्णप्रयाग हैं।
सड़क मार्ग : बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित।
ठहरने की जगह : जीएमवीएन के गेस्ट हाउस सहित लॉज-रेस्टोरेंट पर्याप्त संख्या में हैं। मार्ग में जगह-जगह ढाबे भी हैं।

कर्णप्रयाग से गैरसैंण (56 किमी): कर्णप्रयाग-ज्योलीकोट-नैनीताल एनएच।
रहने की व्यवस्था : इस मार्ग पर केवल आदिबदरी में ही जीएमवीएन का गेस्ट हाउस है। इसके अलावा गैरसैंण में जीएमवीएन, पीडब्ल्यूडी व वन विभाग के गेस्ट हाउस के साथ ही छोटे लॉज हैं। यात्रा रूट नहीं होने की वजह से मार्ग पर रहने-खाने की व्यवस्थाआें की कमी है।

गोपेश्वर से कर्णप्रयाग (41 किमी) : स्टेशन : चमोली, नंदप्रयाग, लंगासू
रहने की व्यवस्था : श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति की धर्मशाला, जीएमवीएन के गेस्ट हाउस के साथ निजी लॉज-रेस्टोरेंट पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं।

नैनीताल-गैरसैंण (132 किमी) : स्टेशन : रानीखेत, द्वारहाट, चौखुटिया
राजमार्ग : कर्णप्रयाग-ज्योलीकोट-नैनीताल।
रहने की व्यवस्था : सभी स्थानाें पर होटल, लॉज पर्याप्त हैं।

बागेश्वर-गैरसैंण (96 किमी) : स्टेशन - गंगोली बैजनाथ, ग्वालदम, थराली, नारायणबगड़   
सड़क मार्ग : ग्वालदम-सिमली-गैरसैंण
ठहरने की व्यवस्था : सभी स्थानाें पर होटल और लॉज हैं।

देहरादून से गैरसैंण : (204 किमी) ऋषिकेश, देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, गैरसैंण।
सड़क मार्ग : ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक ऋषिकेश-बदरीनाथ राजमार्ग। कर्णप्रयाग से नैनीताल राजमार्ग।
ठहरने की व्यवस्था। सभी प्रमुख स्थानों पर

(Source - Amar Ujala)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 गैरसैंण के लिए टू-लेन हाई-वे बनाने की तैयारी भी शुरू 
गैरसैंण और पहाड़ के दिन बहुरने शुरू
एनएच-87 ज्योलीकोट से घिंघारीखाल तक 109 किमी हिस्से की फाइल दौड़ी

नवीन जोशी नैनीताल। प्रदेश की स्थायी राजधानी के रूप में प्रदेशवासियों की पसंद बताये जाने वाले गैरसैंण के दिन बहुरने शुरू हो गये हैं। दो दिन पूर्व ही गैरसैंण में पहली बार राज्य कैबिनेट की ऐतिहासिक बैठक हुई थी और अब एक और खुशखबरी है कि गैरसैंण के लिए टू-लेन हाईवे की फाइल दौड़ने लगी है। पहले चरण में राष्ट्रीय राजमार्ग-87 की ज्योलीकोट से अल्मोड़ा होते हुए रानीखेत के पास घिंघारीखाल तक 109 किमी लंबी सड़क की चौड़ाई दोगुनी यानी टू-लेन होने जा रही है। बाद में इसके गैरसैंण तक जुड़ने का प्रस्ताव है।
केंद्र सरकार के भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा अधिसूचना के अनुसार एनएच-87 के ज्योलीकोट से घिंघारीखाल तक के हिस्से को देश के अन्य राष्ट्रीय राजमागरे के साथ विस्तारित करने की योजना के तहत टू-लेन किया जाना है। इसके लिए करीब तीन दर्जन गांवों की सीमा की भूमि पर सड़क विस्तार के कार्य किए जाएंगे। इन कायरे के लिए नैनीताल एवं अल्मोड़ा जनपद के जिलाधिकारियों से सक्षम प्राधिकारियों का नाम मांग लिया गया है। गौरतलब है कि देश की राजधानी से कुमाऊं जल्द ही फोर लेन से जुड़ने जा रहा है। रामपुर से काठगोदाम के शेष बचे एनएच के हिस्से को फोर लेन करने का नोटिफिकेशन होने के बाद अब सड़क के लिए आवश्यक भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है और काठगोदाम से ज्योलीकोट का एनएच-87ई यानी नैनीताल आने वाली सड़क का हिस्सा पहले ही टू- लेन है, इसलिए ज्योलीकोट से घिंघारीखाल तक के 109 किमी हिस्से को टू-लेन के रूप में परिवर्तित करने की कवायद शुरू हो गई है। नैनीताल जनपद में अधिग्रहण के लिए जरूरी भूमि के चिह्नांकन का होमवर्क शुरू हो गया है। डीएम निधिमणि त्रिपाठी ने पूछे जाने पर कहा कि एनएच-87 के चौड़ीकरण के लिए जरूरी भूमि के अधिग्रहण की तैयारी की जा रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मार्ग के टू-लेन हो जाने से पूरे कुमाऊं वासियों को लाभ होगा। साथ ही पर्यटन एवं विकास को भी पंख लग जाएंगे। गौरतलब है कि पहाड़ के राष्ट्रीय राजमागरे को टू- लेन करने का प्रस्ताव तत्कालीन केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने तैयार कर दिया था, लेकिन देर से ही सही यह प्रस्ताव अब फाइलों में दौड़ने लगा है।

इन गांवों की सीमा में होगा चौड़ीकरण
नैनीताल। केंद्रीय भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी ताजा अधिसूचना के अनुसार नैनीताल के बलुवाखान चक देवलागढ़, चक गेठिया, कुरिया गांव, भवाली के सेनिटोरियम, कहलक्वीरा, मल्ला निगलाट, तल्ला निगलाट, हरतपा, बारगल, छड़ा, लोहाली, जौरासी, जोगी नौली, जोगी माड़े, मनर्सा, गंगोरी, गगरकोट, औलिया गांव, सुयालबाड़ी, सिर्सा, चोपड़ा व क्वारब, अल्मोड़ा के चौसली, बड़सिमी, देवली, खत्याड़ी, अल्मोड़ा नगर पालिका के बाहर बाईपास क्षेत्र, पांडेखोला, सुनौला मल्ला, सिमकुड़ी, अघेली सुनार, अघेली तेवाड़ी, सुनौला तल्ला, रैलाकोट, मटेला, लायम स्टेट फार्म हवालबाग, कटारमल, शौले, ज्यौली, स्यूना, क्वेराली, कयेला, गढ़वाली, कुरचौड़ा, तुस्यारी व सिमल्टा और रानीखेत के बबूरखोला, डीडा, तल्ली रियूनी, मल्ली रियूनी, नैणी व डडगल्या गांवों की सीमा में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-87 के विस्तार के लिए अपेक्षित कार्य होने हैं।

By - our Member Naveen Joshi g.

Anand S Rawat

Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on October 06, 2007, 12:06:28 PM

Pant Ji,

During the last 7 yrs none of hte Govt has paid any attention on this vital issue. How can we forget that a lot of our people have sacrified their lives for this.

We definelty foresee development of uttarakhand hill areas by shifting the capital to gairsain.

People would have easy access to the capital to address their developmental issues and one more thing is that tourism will increase in manifold there by shifting the capital.



Quote from: Hem Pant on October 05, 2007, 05:46:54 PM
agar sarkaar ki neeyat Gairsain ko rajdhaani banane ki hoti to in 7 saalo me is ilaake ko viksit karke aaj tak raajdhani shift bhi ho jaati....

Lekin wo to date aage hi badate ja rahi hai........commitee ki......aur ye UKD kyu shaant hai bhai...humein to lagta tha ki sarkar me shamil hokar UKD Gairsain ko rajdhani banane ke liye sarkar par davaab banayegi.......

Pankaj da aap to Doon me baithe ho.......kuchh bataye is mudde ka kya hoga


Mehtaji 
I  am 100% in agreement with all who favor Gairsain as an Capital.  as you rightly described how development will evolve in the area but also it will greatly help in migration issue from Pahad.


विनोद सिंह गढ़िया

 स्थापना दिवस पर उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का सवाल अब और महत्वपूर्ण हो गया है। गैरसैंण में कांग्रेस सरकार की ओर से हुई कैबिनेट और इसके बाद की गई घोषणाओं ने इस मुद्दे को अब और गरमा दिया है। राज्य गठन के 12 साल बाद राजधानी के सवाल पर चुप्पी टूटी है। पर यह कितनी सार्थक होगी, यह अभी धुंधलक में है। स्थायी राजधानी का मुद्दा जस का तस है। बल्कि कहें कि यह मुद्दा अब और उलझ गया है।
स्थायी राजधानी का मुद्दा अब सीधे-सीधे दो हिस्सों में बंटा दिख रहा है। गरसैंण में विधानभवन बनने की घोषणा को प्रदेश में स्थायी राजधानी के मुद्दे को दफन किए जाने के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में आगे आने वाले समय में सियासी गुणाभाग सिर्फ प्रदेश को दो अस्थायी राजधानी देने की ओर बढ़ता दिख रहा है। देहरादून के सिर पर अस्थायी राजधानी ताज सजा रहेगा और गैरसैंण भी अस्थायी राजधानी के खिताब से गौरवान्वित होता रहेगा। कारण प्रदेश की राजनीति में अब मैदान का दबदबा है और पहाड़ की राजधानी की बात करने वाले को मैदान में कमजोर होने का डर सता सकता है। इसलिए पहाड़ और मैदान के चश्मे से मूल्यांकन करने वाले दल फिलहाल स्थायी राजधानी के सवाल को हल करने से बच सकते हैं। ऐसे में देहरादून के सर से अस्थायी राजधानी का ताज हटाना संभव नहीं होगा और गैरसैंण को ताज पहनाने में मुश्किल होगी। खुद कांग्रेस के सामने अब इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़ने के बाद अब आगे बढ़ने की चुनौती है। सियासी पंडित पूछ रहे हैं कि गैरसैण में विधानसभा भवन बनाने की घोषणा करने के बाद अब कांग्रेस आगे क्या करेगी। यह साफ है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठ सकती। लिहाजा गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी की ओर भी बढ़ सकता है। कांग्रेस के अंदर गैरसैंण पर अब तक सबसे अधिक मुखर रहे गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज इस मांग को उठा भी चुके हैं। दूसरी ओर, यह भी माना जा रहा है कि गैरसैंण पर कांग्रेस की सक्रियता से स्थायी राजधानी का मुद्दा अब और सुलग सकता है। यह अब क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व का सवाल भी बन सकता है। यूकेडी ने गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित करने की मांग कर इसका संकेत भी दे दिया है। यह भविष्य ही बता सकता है कि क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल कितनादमदार होगा।


सुधाकर भट्ट : अमर उजाला

bhandari58

विनोदजी सर्वप्रथम स्थायी राजधानी जल्दी से जल्दी बननी आवश्यक है  यह चाहे देहरादून हो या फिर गैरसेन। प्रॉब्लम यह है कि क्या सियासी पार्टियाँ सही मैं चाहती है की इस समस्या का तुरंत निदान होना चाहिए। ऐसा प्रतीत नहीं होता, क्योंकि समस्या ही नहीं रहेगी तो सियासी पार्टियों की पूछ कैसे होगी। इनके रवये से तो  ऐसा लगता है कि जितना वक्त राज्य बनने में लगा उससे ज्यादा वक्त यही तय करने में लगेगा की राजधानी किस जगह बनायीं जाये, कब बनायीं जाये वो तो बाद की बात है । लगता है राजधानी मसले के लिए भी लोगों को ही सड़क पर आना पड़ेगा?



पूरन सिंह भंडारी

नई दिल्ली