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Forts in Uttarakhand State -उत्तराखंड में पुराने समय में राजाओ के बनाये किले

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, April 16, 2010, 11:09:41 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अल्मोड़ा के किले :  अल्मोड़ा नगर के पूर्वी छोर पर 'खगमरा' नामक किला है। कत्यूरी राजाओं ने   इस नवीं शताब्दी में बनवाया था। दूसरा किला अल्मोड़ा नगर के मध्य में है।   इस किले का नाम 'मल्लाताल' है। इसे कल्याणचन्द ने सन् १५६३ ई. में बनवाया   था। कहते हैं, उन्होंने इस नगर का नाम आलमनगर रखा था। वहीं चम्पावत से अपनी   राजधानी बदलकर यहाँ लाये थे। आजकल इस किले में अल्मोड़ा जिले के मुख्यालय   के कार्यलय हैं। तीसरा किला अल्मोड़ा छावनी में है, इस लालमण्डी किला कहा   जाता है। अंग्रेजों ने जब गोरखाओं को पराजित किया था तो इसी किले पर सन्   १८१६ ई. में अपना झण्डा फहराया था। अपनी खुशी प्रकट करने हेतु उन्होंने इस   किले का नाम तत्कालीन गवर्नर जनरल के नाम पर - 'फोर्ट मायरा' रखा था।   परन्तु यह किला 'लालमण्डी किला' के नाम से अदिक जाना जाता है। इस किले में   अल्मोड़ा के अनेक स्थलों के भव्य दर्शन होते हैं।

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चांदपुर गढ़ी
यह कर्णप्रयाग का निकटवर्ती आकर्षण है। यह उत्तराखंड   राज्य में पड़ता है। गढ़वाल का प्रारंभिक इतिहास कत्यूरी राजाओं का है,   जिन्होंने जोशीमठ से शासन किया और वहां से 11वीं सदी में अल्मोड़ा चले गये।   गढ़वाल से उनके हटने से कई छोटे गढ़पतियों का उदय हुआ, जिनमें पंवार वंश   सबसे अधिक शक्तिशाली था जिसने चांदपुर गढ़ी (किला) से शासन किया। कनक पाल   को इस वंश का संस्थापक माना जाता है। उसने चांदपुर भानु प्रताप की पुत्री   से विवाह किया और स्वयं यहां का गढ़पती बन गया। इस विषय पर इतिहासकारों के   बीच विवाद है कि वह कब और कहां से गढ़वाल आया।
कुछ लोगों के अनुसार वह वर्ष 688 में मालवा के धारा नगरी से यहां आया।   कुछ अन्य मतानुसार वह गुज्जर देश से वर्ष 888 में आया जबकि कुछ अन्य बताते   है कि उसने वर्ष 1159 में चांदपुर गढ़ी की स्थापना की। उनके एवं 37वें वंशज   अजय पाल के शासन के बीच के समय का कोई अधिकृत रिकार्ड नहीं है। अजय पाल ने   चांदपुर गढ़ी से राजधानी हटाकर 14वीं सदी में देवलगढ़ वर्ष 1506 से पहले   ले गया और फिर श्रीनगर (वर्ष 1506 से 1519)।
यह एक तथ्य है कि पहाड़ी के ऊपर, किले के अवशेष गांव से एक किलोमीटर   खड़ी चढ़ाई पर हैं जो गढ़वाल में सबसे पुराने हैं तथा देखने योग्य भी हैं।   अवशेष के आगे एक विष्णु मंदिर है, जहां से कुछ वर्ष पहले मूर्ति चुरा ली   गयी। दीवारें मोटे पत्थरों से बनी है तथा कई में आलाएं या काटकर दिया रखने   की जगह बनी है। फर्श पर कुछ चक्राकार छिद्र हैं जो संभवत: ओखलियों के अवशेष   हो सकते हैं। एटकिंसन के अनुसार किले का क्षेत्र 1.5 एकड़ में है। वह यह   भी बताता है कि किले से 500 फीट नीचे झरने पर उतरने के लिये जमीन के नीचे   एक रास्ता है। इसी रास्ते से दैनिक उपयोग के लिये पानी लाया जाता होगा।   एटकिंसन बताता है कि पत्थरों से कटे विशाल टुकड़ों का इस्तेमाल किले की   दीवारों के निर्माण में हुआ जिसे कुछ दूर दूध-की-टोली की खुले खानों से   निकाला गया होगा। कहा जाता है कि इन पत्थरों को पहाड़ी पर ले जाने के लिये   दो विशाल बकरों का इस्तेमाल किया गया जो शिखर पर पहुंचकर मर गये।
यह स्मारक अभी भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की देख-रेख में है।


source - http://hi.wikipedia.org

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Pithoragarh Fort

Pithoragarh Fort is located on a hill top, 300 m from Pithoragarh. It was built by the Gorkhas in 1789. It offers a splendid view of the Himalayas. Nearby places are Kapileshwar Mahadev Temple, Chandak Hills, Dhwaj Shikhar and Thal Kedar.
The nearest airport is Pant Nagar Airport (151 km). The nearest railhead is at Tanakpur.

(Source India9)

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Badharangadi

Badharangadi is a historical place 6 km from the beautiful hill station of Gwaldam. Badharangadi lies on a high mountain that is 2,260 m above sea level. The remnants of old forts can be seen here, which suggest that this had been a strategic location in the past. (Source india9.com)



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गोरखों की गढ़ी (किला) - Gewad

मंदिर के पास ही गोरखों की गढ़ी है जो अब खंडहर के रुंप में है। कहा जाता है कि यहां से दूरबीन से दिल्ली देखा जा सकता था। सन् 1815 में गोरखों ने अंग्रेजों के साथ समझौता करके कुमाऊंं व गढ़वाल के जो क्षेत्र उनको दिए थे उनमें से यह गढ़ी भी एक थी। इस गढ़ी का जीर्णोद्धार कर इसको पर्यटन स्थल के रुंप में विकसित करना वर्तमान संस्था का मुख्य उद्देश्य है। संस्था ने इस मामले को सर्वोच्च स्तर पर उठाया है।

By - Bhaskar Pandit.पं. भास्कर जोशी