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Why Uttarakhandi living outside the state are more successful?

Started by राजेश जोशी/rajesh.joshee, November 05, 2007, 11:52:35 AM

mahender_sundriyal

नमस्कार, इस विषय पर चर्चा शुरू कर के बहुत ही अच्छा काम हो रहा है. 
मैं इस विषय पर दो बिन्दु रखना चाहूँगा.  एक, यदि आप भारत के विभिन्न भागों मैं भ्रमण करें तो पायेंगे कि चाह वो गोवा हो या कि कोलकाता हो या कि तमिल नाडू, सही जगह स्थानीय लोग बहुत ही आलसी हैं अपने घर मैं और इसीलिए इन सभी जगहों पर बाहर से आए हुए लोग व्यापार पर कब्जा कर पाये हैं.  गोवा मैं गोअनीस दिन मैं दूकान बंद कर लेते हैं और शाम तक मस्त रहते हैं.  इस लिए व्यापार मलयाली लोगों के कब्जे मैं है.  इसी तरह का हाल बंगालियों का हैं और व्यापार पर मारवारी काबिज हैं.  लेकिन यही गोअनीस और बंगाली अपने प्रदेश से बाहर आ कर सफल हैं.  यही सिद्धांत पहाडियों पर लागू होता है.

दूसरी बात, मेरा व्यक्तिगत मत है कि पहाड़ मैं रिज़र्वेशन न मिलने से मेरिटो-क्रेसी व्याप्त है.  यही वजह है कि पड़ी हर क्षेत्र मैं और लोगों के मुकाबले सफल हैं.  क्या ख़याल है?

  नमस्कार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Sundriyal Ji,

Sure i will give my views on that later.


Quote from: mahender_sundriyal on December 04, 2007, 05:00:48 PM
नमस्कार, इस विषय पर चर्चा शुरू कर के बहुत ही अच्छा काम हो रहा है. 
मैं इस विषय पर दो बिन्दु रखना चाहूँगा.  एक, यदि आप भारत के विभिन्न भागों मैं भ्रमण करें तो पायेंगे कि चाह वो गोवा हो या कि कोलकाता हो या कि तमिल नाडू, सही जगह स्थानीय लोग बहुत ही आलसी हैं अपने घर मैं और इसीलिए इन सभी जगहों पर बाहर से आए हुए लोग व्यापार पर कब्जा कर पाये हैं.  गोवा मैं गोअनीस दिन मैं दूकान बंद कर लेते हैं और शाम तक मस्त रहते हैं.  इस लिए व्यापार मलयाली लोगों के कब्जे मैं है.  इसी तरह का हाल बंगालियों का हैं और व्यापार पर मारवारी काबिज हैं.  लेकिन यही गोअनीस और बंगाली अपने प्रदेश से बाहर आ कर सफल हैं.  यही सिद्धांत पहाडियों पर लागू होता है.

दूसरी बात, मेरा व्यक्तिगत मत है कि पहाड़ मैं रिज़र्वेशन न मिलने से मेरिटो-क्रेसी व्याप्त है.  यही वजह है कि पड़ी हर क्षेत्र मैं और लोगों के मुकाबले सफल हैं.  क्या ख़याल है?

  नमस्कार


पंकज सिंह महर

Quote from: mahender_sundriyal on December 04, 2007, 05:00:48 PM
नमस्कार, इस विषय पर चर्चा शुरू कर के बहुत ही अच्छा काम हो रहा है. 
मैं इस विषय पर दो बिन्दु रखना चाहूँगा.  एक, यदि आप भारत के विभिन्न भागों मैं भ्रमण करें तो पायेंगे कि चाह वो गोवा हो या कि कोलकाता हो या कि तमिल नाडू, सही जगह स्थानीय लोग बहुत ही आलसी हैं अपने घर मैं और इसीलिए इन सभी जगहों पर बाहर से आए हुए लोग व्यापार पर कब्जा कर पाये हैं.  गोवा मैं गोअनीस दिन मैं दूकान बंद कर लेते हैं और शाम तक मस्त रहते हैं.  इस लिए व्यापार मलयाली लोगों के कब्जे मैं है.  इसी तरह का हाल बंगालियों का हैं और व्यापार पर मारवारी काबिज हैं.  लेकिन यही गोअनीस और बंगाली अपने प्रदेश से बाहर आ कर सफल हैं.  यही सिद्धांत पहाडियों पर लागू होता है.

दूसरी बात, मेरा व्यक्तिगत मत है कि पहाड़ मैं रिज़र्वेशन न मिलने से मेरिटो-क्रेसी व्याप्त है.  यही वजह है कि पड़ी हर क्षेत्र मैं और लोगों के मुकाबले सफल हैं.  क्या ख़याल है?

  नमस्कार
महेन्द्र जी मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं, आप आज उत्तराखण्ड के किसी भी बड़े शहर में जाइये, जो बड़ा दुकानदार या व्यवसायी है, व्ह निश्चित रूप से बाहरी है, हमारे पहाड के एक या दो ही होंगे, मैं पिथौरागढ़ का उदाहरण देना चाहूंगा, वहां पर प्रमुख व्यवसायी हैं, चुन्नी लाल मेहरा, राम लाल साहनी, शब्बीर अहमद, माहेश्वरी, सचदेवा, सरीन, नजीर अहमद आदि ; और हमारे पहाडी़ भाई, दो घूंट फिर है कोई उनसे बड़ा?  बागेश्वर के प्रमुख व्यवसायी से मेहता जी परिचित होंगे और मुझे विश्वास है वहां भी यही स्थिति होगी :o  :o......................हम मेहनत क्यों नहीं करते, क्यों नही व्यवसायी मानसिकता के हो पाते और आज के पूर्णतः व्यवसायिक युग में भी हम आराम तलब ही क्यों हैं?  ???  ???  :-[  :-[

Risky Pathak

जब तक लोग पहाड़ में रहते है, वे अपनी असफलता के लिए सरकार को ही कोसते रहते है| वो मूलभूत सुविधाओ के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते है| हालांकि ये बात सही है की सरकार ने उत्तराखंड बनने के ७ साल बाद भी, पहाडो के ग्रामीण क्षेत्रो को नजर अंदाज ही कर दिया है|

पर अपनी आदमी पहाड़ से बाहर चला जाता है, वो अपनी कठिन मेहनत व लगन से अपनी किस्मत का दरवाजा ख़ुद खोलता है|