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Untracked Tourist Spot In Uttarakhand - अविदित पर्यटक स्थल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 10, 2007, 09:49:45 AM

हेम पन्त

पंकज दा! इतनी सारे महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थलों की जानकारी देने के लिये शुक्रिया... +1 कर्मा भी

Lalit Mohan Pandey

Narayan Ashram

Narayan Ashram is situated at at an elevation of 2734 mts. above sea level.  It can be reached from Pithoragarh via kanalichhina (25km) Ogla(44 km), Jauljibi(77km), Dharchula(94km), Tawaghat (108km). Tawaghat is the place where Dhauliganga and Kaliganga meet.

From Tawaghat, 10 kms road is good two lane road due to construction of the Dam on the river Dhauliganga. New Sobla town (approx 10 kms from Tawaghat) onwards the road is very narrow, steep and muddy with chances of landslides at some places. 25 kms approx from New Sobla Town on this road. So the driver has to be careful !

The ashram was established by Sri Narayan Swami in 1936. It can accommodate at the most 40 persons at a time. During winter season the ashram remains closed due to heavy snowfall. And rainy season may cause damage to the road. Ashram keeps on conducting various social - spiritual activities for the members so the visitors are strictly advised to convey about their plan to the ashram well in advance.

Although I have never been to this place, but i have heard "this is one of the most beautiful and peaceful place", you will find yourself standing next to "Kailash parwat" in a touching distance, with a beautiful view of snow all around, there are lots of flowers around the ashram.

पंकज सिंह महर

गिरी ताल
काशीपुर शहर से रामनगर की ओर तीन किलोमीटर चलने के बाद दाहिनी ओर एक ताल है, जिसके निकट चामुण्डा का भव्य मन्दिर है।  इस ताल को गिरिताल के नाम से जाना जाता है।  धार्मिक दृष्टि से इस ताल की विशेष महत्ता है, प्रत्येक पर्व पर यहाँ दूर-दूर से यात्री आते हैं।  इस ताल से लगा हुआ शिव मन्दिर तथा संतोषी माता का मन्दिर है जिसकी बहुत मान्यता है।  काशीपुर में नागनाथ मन्दिर, मनसा देवी का मन्दिर भी धार्मिक दृष्टि से आए हुए यात्री का दिल मोह लेते हैं।

पंकज सिंह महर

द्रोण सागर : काशीपुर

चैती मेला स्थल से काशीपुर की ओर २ किलोमीटर आगे नगर से लगभग जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण ताल द्रोण सागर है।  पांडवों से इस ताल का सम्बन्ध बताया जाता है कि गुरु द्रोण ने यहीं रहकर अपने शिष्यों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी।  ताल के किनारे एक पक्के टीले पर गुरु द्रोण की एक प्रतिमा है, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से यह विशिष्ट पर्यटन स्थल है।

पंकज सिंह महर

Quote from: Lalit Mohan Pandey on April 24, 2008, 06:20:08 PM
Narayan Ashram

Narayan Ashram is situated at at an elevation of 2734 mts. above sea level.  It can be reached from Pithoragarh via kanalichhina (25km) Ogla(44 km), Jauljibi(77km), Dharchula(94km), Tawaghat (108km). Tawaghat is the place where Dhauliganga and Kaliganga meet.

From Tawaghat, 10 kms road is good two lane road due to construction of the Dam on the river Dhauliganga. New Sobla town (approx 10 kms from Tawaghat) onwards the road is very narrow, steep and muddy with chances of landslides at some places. 25 kms approx from New Sobla Town on this road. So the driver has to be careful !

The ashram was established by Sri Narayan Swami in 1936. It can accommodate at the most 40 persons at a time. During winter season the ashram remains closed due to heavy snowfall. And rainy season may cause damage to the road. Ashram keeps on conducting various social - spiritual activities for the members so the visitors are strictly advised to convey about their plan to the ashram well in advance.

Although I have never been to this place, but i have heard "this is one of the most beautiful and peaceful place", you will find yourself standing next to "Kailash parwat" in a touching distance, with a beautiful view of snow all around, there are lots of flowers around the ashram.



श्री कैलाश नारायण आश्रम - यह आश्रम भारत विख्यात हो चुका है। स्वामी श्री १०८ नारायण स्वामी ने इसकी स्थापना १९३६ में की थी, उन्हीं के नाम से यह आश्रम प्रसिद्ध हो गया है।
       चौबासपट्टी के सोसा गाँव से ४२-४२ किमी. पूरब की ओर २७०० मीटर की ऊँचाई पर यह आक्श्रम स्थित है। यह अत्यन्त रमणीय स्थल है, यहाँ पर स्वामी जी ने एक भव्य मंदिर बनवाया है। कई भवन बनवाये हैं। उद्यान और फूलों के बगीचे भी लगवाये। इस स्थान की सुन्दरता इतनी अधिक है कि देश के कोने-कोने के प्रकृति प्रेमी इस आश्रम में रहकर हिमालय के अद्भुत दर्शन करते हैं।
       इस आश्रम से कैलाश मानसरोवर जाने के लिए मार्ग है। चीन की सीमा यहाँ से अतिनिकट है। विश्व प्रसिद्ध भूगोलवेता स्वामी प्रणवानन्द इसी आश्रम में रहते हैं और यहीं से वे कई बार कैलास मानसरोवर की यात्रा कर चुके हैं।




एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Pandakholi..

Pandakholi is in Dwarahaat side (Almora). This place is almost 15 km away from mous temple Dronagiri.  It is said the during the Agyaat Vas (Exile) one of the brothers of Pandava Bheem used to come there to take rest. I have visited this place.

पांडूखोलीः पांडुखोली की गुफाएं द्वाराहाट से 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं।

यह माना जाता है कि यह गुफा पांडू के पुत्र पांडवों के शरणस्थलों में से एक है। यह उस समय की बात है जब वे 14 साल के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान छुपे हुए थे, जैसा कि महाभारत में वर्णित है।

पांडुखोली नाम भी इसी कथानक से लिया गया है। पांडव का मतलब पांडू के पुत्र और खोली का मतलब आवास।

जगह कुकूछीना से 5 किलोमीटर पर है, जहां मोटरगाड़ी से पहुंचा जा सकता है।


पंकज सिंह महर

कालीमठ, अल्मोड़ा

यह अल्मोड़ा से ५ कि.मी. की दूरी पर स्थित है।  एक ओर हिमालय का रमणीय दृश्य दिखाई देता है और दूसरी ओर से अल्मोड़ा शहर की आकर्षक छवि मन को मोह लेती है।  प्रकृतिप्रेमी, कला प्रेमी और पर्यटक इस स्थल पर घण्टों बैठकर प्रकृति का आनन्द लेते रहते हैं।  गोरखों के समय राजपंडित ने मंत्र बल से लोहे की शलाकाओं को भ कर दिया था।  लोहभ के पहाड़ी के रुप में इसे देखा जा सकता है।

पंकज सिंह महर

ब्राइट एण्ड कार्नर :

यह अल्मोड़ा के बस स्टेशन से केवल २ कि.मी. कब हूरी पर एक अद्भुत स्थल है।  इस स्थान से उगते हुए और डूबते हुए सूर्य का दृश्य देखने हजारों मील से प्रकृति प्रेमी आते रहते हैं।
इंगलैण्ड में 'ब्राइट बीच' है।  उस 'बीच' से भी डूबते और उगते सूरज का दृश्य चमत्कारी प्रभाव डालने वाला होता है।  उसी 'बीच' के नाम पर अल्मोड़ा के इस 'कोने' का नाम रखा गया है।

पंकज सिंह महर

गरम पानी

कैंची से आगे 'गरमपानी' नामक एक छोटा सा नगर आता है।  यह स्थान हल्द्वानी, काठगोदाम और अल्मोड़ा के बीच का ऐसा स्थान है जहाँ पर यात्री चाय पीने और भोजन करने के लिए आवश्यक रुप से रुकते हैं।  गरमपानी का पहाड़ी भोजन प्रसिद्ध है।  यहाँ का रायता और आलू के हल्दी से रंग गुटके दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।  हरी सब्जियों की यह मण्डी है।  यहाँ से दूर-दूर तक पहाड़ी सब्जियाँ भेजी जाती हैं।  पहाड़ी खीरे, मूली और अदरक आदि के लिए भी गरमपानी विख्यात  है।

पंकज सिंह महर

कैंची मन्दिर, रातीघाट

कैंची, भुवाली से ७ कि.मी. की दूरी पर भुवालीगाड के बायीं ओर स्थित है।  नीम करौली बाबा को यह स्थान बहुत प्रिय था।  प्राय: हर गर्मियों में वे यहीं आकर निवास करते थे।  बाबा के भक्तों ने इस स्थान पर हनुमान का भव्य मन्दिर बनवाया।  उस मन्दिर में हनुमान की मूर्ति के साथ-साथ अन्य देवताओं की मूर्तियाँ भी हैं।  अब तो यहाँ पर बाबा नीम करौली की भी एक भव्य मूर्ति स्थापित कर दी गयी है।
कैंची मन्दिर में प्रतिवर्ष १५ जून को वार्षिक समारोह मानाया जाता है।  उस दिन यहाँ बाबा के भक्तों की विशाल भीड़ लगी रहती है।  नवरात्रों में यहाँ विशेष पूजन होता है।  नीम करौली बाबा सिद्ध पुरुष थे।  उनकी सिद्धियों के विषय में अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं।  कहते हैं कि बाबा पर हनुमान की विशेष कृपा थी।  हनुमान के कारण ही उनकी ख्याति प्राप्त हुई थी।  वे जहाँ जाते थे वहीं हनुमान मन्दिर बनवाते थे।  लखनऊ का हनुमान मन्दिर भी उन्होंने ही बनवाया था।  ऐसा कहा जाता है कि बाबा को 'हनुमान सिद्ध' था।
      उनका नाम नीम करौली पड़ने के सम्बन्ध में एक कथा कही जाती है।  बहुत पहले बाबा एक साधारण व्यक्ति थे।  नीम करौली गाँव में रहकर हनुमान की साधना करते थे, एक बार उन्हें रेलगाड़ी में बैठने की इच्छा हुई।  नीम करौली के स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकी, बाबाजी रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में जाकर बैठ गए।  कंडक्टर गार्ड को जैसे ही ज्ञात हुआ कि बाबाजी बिना टिकट के बैठे हैं तो उन्होंने कहा कि बाबाजी, आप गाड़ी से उतर जाएँ।  बाबाजी मुस्कुराते हुए गाड़ी के डिब्बे से उतरकर स्टेशन के सामने ही आसन जमाकर बैठ गए।  उधर गार्ड ने सीटी बजाई, झंडी दिखाई और ड्राइवर ने गाड़ी चलाने का सारा उपक्रम किया, किन्तु गा#ी एक इंच भी आगे न बढ़ सकी।  लोगों ने गार्ड से कहा कि कंडक्टर गार्ड ने बाबाजी से अभद्रता की है।  इसीलिए उनके प्रभाव के कारण गाड़ी आगे नहीं सरक पा रही है।  परन्तु रेल कर्मचारियों ने बाबा को ढोंगी समझा।   गाड़ी को चलाने के लिए कई कोशिशें की गयीं।  कई इंजन और लगाए गए परन्तु गाड़ी टस से मस तक न हुई।  अन्त में बाबा की शरण में जाकर कंडक्टर, गार्ड और ड्राइवर ने क्षमा माँगी।  उन्हें आदर से प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बिठाया।  जैसे ही बाबा डिब्बे में बैठे, वैसे ही गाड़ी चल पड़ी।  तब से बाबा 'नीम करौली बाबा' पड़ा।  तब से अपने चमत्कारों के कारण वे सब जगह विख्यात हो गये थे।   अपनी मृत्यु की अन्तिम तिथि तक भी वे हनुमान के मन्दिरों को बनवाने का कार्य करते रहे और दु:खी व्यक्तियों की सेवा करते रहे।
       कैंची में भी कई दुखियों की उन्होंने सेवा की थी।  उनके पास कोई व्यक्ति क्यों आया है?  यह बात वे पहले ही कहकर आगंतुक को आश्चर्य में डाल देते थे।  आज भी बाबा के नाम पर कैंची में भोज का आयोजन होता है।