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Untracked Tourist Spot In Uttarakhand - अविदित पर्यटक स्थल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 10, 2007, 09:49:45 AM

हलिया

असली कद्रदान एसे होने वाले ठैरे, हमारे संजू भाई जैसे।  अरे महाराज हर अच्छी बात की खुल कर तारीफ़ करने वाले जो ठैरे। 

Quote from: sanjupahari on May 06, 2008, 08:13:11 PM
wonderful information by Mehta Ji, Maharj ji, raji bhai....etc
its really awesome....cheers for all of you
HIP HIP HURRREY
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हेम पन्त

Full News here: http://www.garhwalpost.com/centrenewsdetail.aspx?id=2878;&nt=Uttarakhand

By Indra Mohan Singh

Ramnagar, 10 May: Ramnagar is well known for the world famous Corbett National Park but there are also other places that are an attraction for nature lovers. Corbett Fall is also one of them. Corbett Fall is situated 25 kilometres from Ramnagar.

It is situated in the jungle of Ramnagar forest division and one kilometre from the roadside. It is like heaven for the nature loving tourists in the summer season. It attracts tourists due to its natural environment. It is a natural water fall and many tourists come there for peaceful moments. Corbett Fall is not only a favourite place for local people and those from nearby areas but also many tourists from the metro cities as well as from foreign lands.

Corbett Fall was established as a tourist spot in 1999 and has attracted a total of 3,33,801 tourists, collecting Rs 41,53,710 as revenue till March 2008. This is proved from the following figures:

It is clear from the above data that the number of tourists is increasing by the year. Tourists have enjoyed unforgettable moments in the peaceful environment of Corbett Fall. This is a very enjoyable and memorable place in the jungle but, unfortunately, there are only four-five employees available to manage this beautiful place. There is no system for security of tourists and upkeep of the Fall. Many tourists have expressed their feelings about the mismanagement of the place.


पंकज सिंह महर



कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर।

कण्वाश्रम मलिन नदी के किनारे के निकट पुरानी हरिद्वार सड़क पर स्थित है। इसका बड़ा पौराणिक महत्व है। माना जाता है कि विश्वामित्र ऋषि ने यहां तप किया था। लगता है कि भगवान इन्द्र इनकी तपस्या की गहनता से परेशान होकर उनका तप भंग करने स्वर्ग की अप्सरा मेनका को यहां भेजा। मेनका ने कार्य सिद्ध कर लिया और शकुंतला नामक कन्या को जन्म दिया, जिसे आश्रम में ही छोड़कर वह स्वर्ग वापस लौट गयी। शकुंतला का पालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया तथा उसका विवाह हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत से हुआ। उनका पुत्र भरत, जिसके नाम पर भारत नाम पड़ा, आर्याव्रत का महान राजा हुआ जो अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध था।
       समय बीतने के साथ मूल आश्रम का ढांचा दब गया। लगभग 40 वर्ष पहले एक नये मंदिर का निर्माण किया गया तथा यहां कण्व, भरत, शकुंतला, दुष्यंत एवं सिंह के बच्चों की मूर्तियां हैं।




     




हेम पन्त

वाह! वाह! एतिहासिक महत्व की यह जगह वास्तव में एक धरोहर है. अफसोस की इतनी महत्वपूर्ण स्थान को पूर्ण रूप से प्रचारित नहीं किया गया है.

Quote from: पंकज सिंह महर on May 14, 2008, 04:17:15 PM


कोटद्वार से 12 किलोमीटर दूर।

कण्वाश्रम मलिन नदी के किनारे के निकट पुरानी हरिद्वार सड़क पर स्थित है। इसका बड़ा पौराणिक महत्व है। माना जाता है कि विश्वामित्र ऋषि ने यहां तप किया था। लगता है कि भगवान इन्द्र इनकी तपस्या की गहनता से परेशान होकर उनका तप भंग करने स्वर्ग की अप्सरा मेनका को यहां भेजा। मेनका ने कार्य सिद्ध कर लिया और शकुंतला नामक कन्या को जन्म दिया, जिसे आश्रम में ही छोड़कर वह स्वर्ग वापस लौट गयी। शकुंतला का पालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया तथा उसका विवाह हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत से हुआ। उनका पुत्र भरत, जिसके नाम पर भारत नाम पड़ा, आर्याव्रत का महान राजा हुआ जो अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध था।
       समय बीतने के साथ मूल आश्रम का ढांचा दब गया। लगभग 40 वर्ष पहले एक नये मंदिर का निर्माण किया गया तथा यहां कण्व, भरत, शकुंतला, दुष्यंत एवं सिंह के बच्चों की मूर्तियां हैं।




    





Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Abhi apne Lansdowne tour pai main jaa nahi paaya yahan pai lekin agli baar jaroor jaaunga.

पंकज सिंह महर

Quote from: पंकज सिंह महर on April 11, 2008, 03:04:49 PM
लखुडियार-अल्मोड़ा

चितई मन्दिर से आगे बाड़ेछीना के पास एक संरक्षित जगह है लखुडियार। यहां पर पुरानी मानव सभ्यता के अवशेष हैं (सिन्धु घाटी के समकालीन) यहां पर उनके द्वारा पेंटिग्स बनायी गयी हैं, जो आज भी दिखाई देती हैं। यह स्थान ASI के सरक्षण में है, लेकिन इसे सरकारी स्तर पर विकसित करने का कोई प्रयास अभी तक नहीं हुआ है और ना ही यह अभी तक पर्यटन मानचित्र में अपना स्थान बना पाया है।
       जब कि यह बहुत ही ऎतिहासिक स्थान है, यह इस बात का भी प्रतीक है कि उस जमाने में भी हमारे यहां मानव सभ्यता विद्यमान थी। संभवतः पूरे उत्तराखण्ड में अकेला ऎसा स्थान है, जो मानव सभ्यता के प्रमाण देते हैं।


वहां पर पेंटिग्स के चित्र





वास्तव में लखुडियार एक ऎसी धरोहर है, जिसे बहुत संभाल के रखने की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि हमारे उत्तराखण्ड मे मानव सभ्यता न जाने कितने वर्षों से निवास करती आ रही है। राज्य सरकार और ASI  को चाहिये कि आपसी समन्वय स्थापित कर इस स्थान को संरक्षित करने का प्रयत्न किया जाय, ताकि आने वाली पीढ़ी यह जान सके कि हमारी विरासत कितनी समृद्ध है और हमारे पूर्वज न जाने कितने साल पहले से यहां पर निवास कर रहें हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सबसे प्राचीन राम मंदिरों में एक है रामपादुका मंदिरJun 10, 12:48 am

रानीखेत (अल्मोड़ा)। जनपद के मासी कस्बे के समीप पन्याली नामक स्थान पर स्थित रामपादुका मन्दिर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सामने आई है। शोधकर्ताओं के अनुसार मंदिर में स्थित भगवान राम की द्विभुजाकार मूर्ति को भारतवर्ष की सबसे प्राचीनतम मूर्ति मानते है। उनका मानना है कि यह मंदिर भारत के मध्यप्रदेश में स्थित सबसे प्राचीन राम मंदिर नचना से भी पुराना है।

अष्टचक्रा अयोध्या: इतिहास और परम्परा नामक शोधपूर्ण ग्रंथ के लेखक व रामजस कालेज दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के रीडर डा. मोहन चन्द्र तिवारी वर्तमान में उत्तराखंड में राम संस्कृति के अवशेषों के सर्वेक्षण को कार्य कर रहे है। उनके अनुसार मासी के पन्याली क्षेत्र में स्थित रामपदुका मन्दिर पाषाणकालीन गुफा भित्तियों के भीतर निर्मित यह मन्दिर भारतवर्ष का सबसे प्राचीन राम मन्दिर है। जिसमें आभूषणों से अलंकृत दो भुजाओं वाली राम की मूर्ति सुशोभित है। जिस के दायीं ओर वन्दना की मुद्रा में सीता देवी व बाई ओर चरण वन्दा की मुद्रा में हनुमान भी विद्यमान है। उन्होंने इसे पुरातत्विक महत्व के प्राचीन चित्र बताते हुए कहा कि प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से उक्त राममूर्ति पांचवीं शदी अथवा इससे कुछ वर्ष पूर्व की भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि पांचवीं शदी में रचित वराहमिहिर की वृहतसंहिता में श्रीराम की दो भुजाओं वाली मूर्ति का जिक्र आया है। उसके बाद ही प्रतिमा विज्ञान के ग्रंथों में चार भुजाओं वाली राम की मूर्तियों के लक्षण मिलते है। डा. तिवारी के अनुसार ही 11वीं से 13वीं शताब्दी से संबंधित झांसी, ओसिया तथा दक्षिण भारत के संग्रहालयों में अब तक श्रीराम की जितनी भी मूर्तियां संग्रहित है, वह सब चार भुजाओं वाली है। यहां तक कि रामजन्म भूमि अयोध्या में काले पत्थर की जो प्राचीन मूर्ति मिलती है वह श्रीराम के राज्याभिषेक के समय की पंचायतन मूर्ति है। डा. तिवारी के अनुसार जिस आकृति को लोग वर्तमान में रामपादुका के रूप में पूजते है, वह आदि मानव का है। यह आकृति मानव पैर की आकृति से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती। वैसे भी पाषाण युग तथा आदि मानव की उत्तराखंड में उपस्थिति का जिक्र विद्यावाचस्पति पुरातत्व ललित कलाचार्य डा. यशोधर मठपाल द्वारा भी अनेकों बार किया है।

स्कन्दपुराण के अनुसार राजा भगीरथ जिस रथवाहिनी गंगा को उत्तराखंड की धरती पर लाए थे। वहीं रहव नदी रामपादुका के स्थान से रामगंगा कहलाने लगी और जिस स्थान पर श्रीराम ने कोटियज्ञ किया वही स्थान वर्तमान में कोटयूणा कहा जाता है। डा. तिवारी चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड सरकार व पुरातत्व विभाग ने देश की इस सांस्कृतिक धरोहर को उपेक्षित किया है। साथ ही उन्होंने रामपादुका परिसर को रामतीर्थ के रूप में संरक्षित करने को आवश्यकता बताते हुए कहा कि इससे राष्ट्र की इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को धार्मिक तथा आध्यात्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Hem bhai kuch aur bataiye is mandir ke baare main.

Quote from: H. Pant on June 11, 2008, 06:51:36 PM
पिथौरागढ़ शहर से ६ किमी. दूर सुरम्य घाटी में.. नदी किनारे स्थित है सेरादेवल मन्दिर...



हेम पन्त

अनुभव दा सेरादेवल मन्दिर मेरे गाँव के पास ही है. इसके निर्माण का अधिकतर काम आर्मी द्वारा किया गया है... बहुत शांत वातावरण में स्थित इस मन्दिर में मुख्यत शिव जी विद्यमान है... अभी इसी साल आर्मी द्वारा काली माँ का मन्दिर भी बनाया गया है...

हेम पन्त

गोपेश्वर (चमोली)। साहसिक खेलों के जरिये सीमांत जनपद चमोली के पर्यटन क्षेत्रों को विकसित करने की कवायद गति पकड़ रही है। गौचर, जोशीमठ, औली, चोपता सहित अन्य पर्यटक स्थलों में साहसिक गतिविधियां बढ़ने से पर्यटकों की तादात भी कम नहीं दिख रही है। पर्यटन विभाग के अधीन संचालित इस महत्वाकांक्षी योजना को मूर्त स्वरूप देने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं।

चमोली जिला वैसे भी साहसिक पर्यटन के लिए विख्यात है। यहां के पर्यटक स्थलों में साहसिक गतिविधियां पूर्व से ही संचालित की जाती रही हैं। लेकिन कई अनछुए क्षेत्र आज भी ऐसे हैं जो अपनी नैसर्गिक सुंदरता के रूप में तो पहचाने जाते हैं, लेकिन पर्यटकों का दीदार तक वह नहीं कर पाए हैं। ऐसे क्षेत्रों को चिहि़्नत कर पर्यटन विभाग साहसिक गतिविधियां संचालित कर रहा है, जिससे पर्यटक अधिक संख्या में यहां पहुंचे और स्थानीय लोगों की आर्थिकी मजबूत हो सके। जिले के पर्यटक स्थलों में विभाग द्वारा राक क्लाइंबिंग, स्कीइंग, एडवेंज फाउंडेशन कोर्स, रिवर राफ्टिंग, क्यार्किंग व केनोइंग आदि का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। जबकि इस वर्ष भी पर्यटक स्थलों पर इस प्रकार के प्रशिक्षण संचालित किए जाएंगे।