• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Untracked Tourist Spot In Uttarakhand - अविदित पर्यटक स्थल

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 10, 2007, 09:49:45 AM

पंकज सिंह महर

रहस्यमयी कहानियों को समेटे राजपाल मंदिर

हिमालय की गोद में बसे देवभूमि उत्तराखंड के चप्पे चप्पेमें पुरातात्विक व श्रद्धा स्थलों की भरमार है। ऐसे कई स्थल हैं जो अतीत की अनेक रहस्यमयी कहानियां समेटे हुए हैं लेकिन सरकार की उपेक्षा से यह स्थल महत्वहीन होते जा रहे हैं। बीस वर्ष पूर्व खुदाई में निकलीं पुरातात्विक व पौराणिक मूर्तियों की भी सुध लेने वाला कोई नहीं है। इन्हीं स्थलों में राजपाल मंदिर भी शामिल है। बौड़खत्ता के समीप घनघोर जंगल में स्थित राजपाल मंदिर बिन्दुखत्ता से लगभग बारह किलोमीटर पूरब की ओर बियावान जंगल के मध्य डौली रेंज में है। इस मंदिर के आसपास रहस्यमयी वातावरण व टीले मौजूद है। इन टीलों का क्या रहस्य है यह पुरातत्व विभाग के लिए खोज का विषय है। मंदिर से सटा हुआ एक तालाब है जो अनेक पत्तों व कीचड़ से भरने लगा है। लगभग 1883 में अस्तित्व में आये इस मंदिर के बारे में ग्रामीणजनों का कहना है कि हमारे पूर्वजों के मध्य प्रचलित मान्यता के अनुसार कालांतर में इस घनघोर जंगलों के मध्य एक गांव है जिसे अब बौडखत्ता के नम से जाना जाता है। बोडखत्ता के सटे जंगली ग्वालों क एक समूह जानवर चुगाते चुगाते थक हाकर पेड़ की छाव में सो गया तभी उन्हें अपने राजपाल देवता ने निर्देश दिये कि तुम्हारे जानवरों को डकैत चुरा कर ले रहे हैं उन्हें बचा लो आवाज सुनते ही ग्वाले जाग उठे और लुटेरों का पीछा कर अपने अपने जानवरों को बचा लिया तभी से इन गांव वालों ने इस स्थान पर राजपाल देवता की मूर्ति की स्थापना कर पूजा कर दी। और उस स्थान का नाम राजपाल मंदिर पड़ गया। 1883 ई के आसपास यहां के लोगों ने इस स्थान की जानकारी मिली, और यह पूजा अर्चना होने लगी जो आज तक होते चली आ रही है। कालान्तर में एक बाबा इस टीले पर आकर रहने लगे जिन्हें सपने मे इस टीले में मूर्तियों होने की जानकारी हुई बाबा ने इस सपने का रहस्य ग्रामीणों को बताया ग्रामीणों की मदद से टीले की खुदाई की गयी जहां से अनेक पौराणिक मूर्तियों तथा सिक्के मिले। जिनमें से कुछ मुतियों खंडित थी। जिनकी पूजा आज भी इस मंदिर में विधिवत की जाती है। मूर्तियां पौराणिक मंदिरों की मूतियों से मेले खाती है। मंदिर के 20 मीटर की दूरी पर एक तालाब है। क्षेत्रीय ग्रामीणों महेश चन्द्र मलकानी चन्दन सिंह, गोपाल सिंह के अनुसार पहले इस तालाब में स्वच्छ जल रहता था। भरपूर मात्रा में कमल खिले रहते थे। जानवर जलक्रीड़ा व अपनी प्यास बुझाते थे। तालाब की सफाई की व्यवस्था न होने से वर्तमान में यहां दलदल बन गया है।


पंकज सिंह महर

साथियों,  आप सभी जानते हैं कि उत्तराखण्ड में प्राचीन काल (कत्यूरी) में सूर्य की पूजा की जाती थी और अनेक जगहों पर इनके मन्दिर बनाये गये। मेरे क्षेत्र देवलथल में एक गांव है-चौपाता, जहां पर एक प्राचीन मन्दिर है, लेकिन ग्रामवासी उसके इतिहास से वंचित हैं और उसे भूत का मन्दिर मानते हैं, वहां पर आज भी पूजा नहीं की जाती। लेकिन आज डा० यशवन्त सिंह कटौच जी की लिखी पुस्तक "मध्य हिमालय की कला" को पढ़ा तो उस पुस्तक में इसका निम्नवत उल्लेख मिला, जो आप लोगों के सामने प्रस्तुत है।



यह तृतीय चरण की सूर्य मूर्तियां (मध्यकालीन ८ वीं सदी से १३ वी सदी) है। चौपाता के सूर्यदेव पत्र तोरण एवं पद्मप्रभामंडल से प्रदीप्त, पद्म पीठिका पर पद्महस्त शोभित है, कुहनी से आगे उभय भुजायें खण्डित हो चुकी हैं। वर्म, हस्तत्राण, ऊंचे उपानत एवं वाम पार्श्व में लटका खड्ग सभी अब वास्तविक उदीच्यवेग में नहीं, मात्र आकारवादी रीति से प्रदर्शित है, शेष उत्तरीय, अधोवस्त्र और अंगभूषण पूर्ण भारतीय है। परिकर में तेरह सह आकृतियों का समायोजन सुअनुपातिक एवं मध्यकालीन अधिक भराव प्रवृत्ति के अनुकूल हुआ है। निम्नतम स्तर पर दो चौरीधारिणी तथा दो नमस्कार मुद्रा सहित चार आसन स्त्री आकृतियों के साथ, देवता के पाद मध्य में महाश्वेता स्थानक प्रदर्शित है। सूर्य के अग्रभाग में महाश्वेता का निर्द्वेश भविष्यपुराण में मिलता है। इसके ऊपरी स्तर पर दक्षिण वाम पार्श्वों में लेखनी और पत्रधारी लम्बकूर्च पिंगल, खड्गीदण्ड तथा उनके दोनों ओर चामधारिणी निक्षुभा तथा जाग्यी, चारों अधिक प्रमुखता के साथ चित्रित हैं। इसके ऊपरी दो स्तरों पर देव के स्कन्ध पार्श्वों में प्रत्यंचा चढ़ाये अंधकार पर आक्रमण करतीं प्रत्यूषा उषा तथा तोरण के दोनों ओर उल्लासपूर्ण मुद्रा में दो माला विद्याधर अंकित हैं।

इतने ऎतिहासिक महत्व के मन्दिर की स्थिति आज बहुत खराब है, इसके रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं है। स्थानीय ग्राम वासियॊं में भी इसके लिये जानकारी का अभाव है। सरकार को चाहिये कि इसके रखरखाव की व्यवस्था करते हुये इसे पर्यटन मानचित्र में सम्मिलित किया जाय।

पंकज सिंह महर

पुरोला जागरण कार्यालय : क्षेत्र का ठढुंग गांव इन दिनों स्थानीय ग्रामीणों समेत पुरातत्वविदों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। दरअसल, यहां सिंगाई डांडा के जंगल में विचरण कर रहे एक साधू और बकरियां चरा रहे कुछ चरवाहों ने एक प्राचीन गुफा को खोज निकाला है। खास बात यह है कि गुफा तीन मंजिला है और इसकी दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं और मानवों की आकृतियां उकेरी हुई हैं। इसके अलावा गुफा के भीतर शिवलिंग जैसी आकृति भी मौजूद है। गुफा का जायजा लेने पहुंचे पुरातत्वविदों ने भी इसे प्राचीन माना है और इसका इतिहास महाभारत काल से जोड़कर देखा जा रहा है। फिलवक्त गुफा की दो मंजिलों व भित्तिचित्रों का अध्ययन शुरू कर दिया गया है और तीसरी मंजिल पर जाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, गुफा मिलने की सूचना पर सैकड़ों लोग यहां पहुंचने लगे हैं। जनपद उत्तरकाशी के अन्तर्गत तहसील मुख्यालय पुरोला से 15 किलो मीटर दूर ठढुंग गांव के कुछ चरवाहों और एक साधू नीलकंठ गिरी महाराज को बांज- बुरंाश के घने जंगल में विचरण के दौरान एक गुफा दिखाई दी। साधू ने ग्राम प्रधान जनक सिंह राणा को इसकी जानकारी दी। इस पर प्रधान ने गुफा के संबंध में क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं व पुरातत्व विभाग को सूचना दी। सोमवार को केंद्रीय विवि श्रीनगर के पुरातत्व विभाग से डा. बीएस पंवार यहां पहुंचे और नीलकंठ गिरी महाराज और साहित्यकार चंद्रभूषण बिजल्वाण के साथ मौके पर जाकर गुफा का निरीक्षण किया। गुफा से लौटने के बाद डा. पंवार ने बताया कि करीब तीन किलो मीटर लंबी गुफा का व्यास पांच मीटर है व यह तीन मंजिला है। पहली मंजिल में प्रवेश के लिए दो फुट ऊंची व 20 फुट लंबी सुरंग से गुजरना पड़ता है। अंदर तीन बड़े हालनुमा कमरे हैं, जिनकी दीवारें सफेद मारबल जैसे पत्थरों की बनी हैं। इनकी दीवारों पर देवी देवताओं व मनुष्य की आकृतियां बनी हैं। दूसरी मंजिल में दीवारों पर कुछ वृत्त चित्र, खड़ाऊं व मूर्तियां बनी हैं। गुफा के भीतर एक छोटा तालाब भी है, जिसके बीचों-बीच सफेद पत्थरों से बने दो छोटे व एक बड़ा शिवलिंग है। तीसरी मंजिल के आगे काफी संकरी है, इसलिए अब तक यहां कोई प्रवेश नहीं कर सका है। गुफा के बारे में ठढुंग गांव के बुजुर्ग मेयराम, सब्बल सिंह रावत, गुलाब सिंह बताते हैं कि प्रचलित स्थानीय कथाओं के अनुसार पांडवों ने वन प्रवास के समय लाखामंडल में यज्ञ करने (सिरगा मोरी श्रृंगी गुफा) के लिए श्रृंग ऋषि को बुलाया था। लाखामंडल जाते हुए श्रंृग ऋषि ने इसी गुफा में कुछ समय विश्राम किया था। उधर डा. पंवार ने भी माना कि पुरोला व आसपास का इलाके में महाभारत काल के अवशेष मिलते रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह गुफा भी महाभारत काल की हो सकती है।

हेम पन्त

भवाली और घोड़ाखाल के पास स्थित श्यामखेत चाय बागान एक बहुत सुरम्य जगह है. नैनीताल और आस-पास घूमने वाले पर्यटक इस जगह पर आसानी से पहुंच सकते हैं. देवदार के पेड़ों के बीच दूर-दूर तक फैले चाय बागान बहुत सुन्दर लगते हैं. यह बागान "उत्तराखण्ड चाय विकास बोर्ड" के अधीन है. इसी जगह पर चाय फैक्टरी भी है, जहां से आप इस बागान की Leaf Tea भी खरीद सकते हैं.

मैं इसी रविवार को यहां घूमने गया था, उसी समय यह फोटॊ लिया था.


हेम पन्त

Shyamkhet, Ghorakhal Tea Garden


पंकज सिंह महर


देहरादून में एक और है गंधक का चश्मा

केदार दत्त/राजेश बड़थ्वाल, देहरादून राजधानी में गंधकयुक्त पानी का चश्मा कहां है? इसका जवाब मिलेगा सहस्रधारा। यह सही भी है और इसी कारण यह स्थल आज दून के प्रमुख पर्यटक स्थलों के रूप में उभरा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि देहरादून के नजदीक सहस्रधारा से ज्यादा गंधक की मात्रा वाले पानी का दूसरा चश्मा कहां है? चलिए हम बता देते हैं। अब तक उपेक्षित पड़ा यह चश्मा है देहरादून से 26 किमी दूर ग्राम पंचायत हल्द्वाड़ी की सरहद में, लेकिन यह पर्यटकों की नजरों से आज भी दूर है। विडंबना ही है कि पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है, जबकि इसके विकसित होने से क्षेत्र की तरक्की के दरवाजे भी खुद ही खुल जाएंगे। भले ही पर्यटन को आर्थिकी से जोड़ने के लिए तमाम दावे किए जा रहे हों, लेकिन धरातल में कुछ खास नहीं हो रहा है। सिर्फ पहले से विकसित स्थानों पर ही ध्यान दिया जा रहा है, नए स्थलों को विकसित करने की दिशा में कोई पहल होती नजर नहीं आ रही। स्थिति यह है कि राजधानी के करीब होने के बावजूद आज ऐसे तमाम रमणीक स्थल लोगों की नजरों से ओझल हैं। इसका एक उदाहरण है देहरादून जिले की सीमांत ग्राम पंचायत हल्द्वाड़ी की सरहद में स्थित गंधक के पानी का चश्मा। हल्द्वाड़ी, रंगड़गांव समेत क्षेत्र के तमाम गांवों के लोग त्वचा संबंधी बीमारियां होने पर इसी स्रोत की शरण में जाते हैं। इस चश्मे से गंधकयुक्त पानी निकलने के कारण क्षेत्रवासियों ने इस जगह का नाम गंधक पानी ही रख दिया है। सौंग नदी से लगी पहाड़ी से निकलने वाले इस चश्मे का गंधक युक्त ठंडा जल और उसके आसपास की नैसर्गिक छटा मन को आनंदित कर देती है। मालदेवता से सौंग नदी के किनारे-किनारे 15 किमी की दूरी तय कर इस स्थल तक पहंुचा जा सकता है। यह एक बेहतर ट्रैकिंग रूट भी बन सकता है। प्राकृतिक नजारों से भरा यह स्थल अभी तक पर्यटकों की निगाह से दूर है। शासन -प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई प्रयास भी होते नजर नहीं आ रहे, जबकि यह पर्यटन की अपार संभावनाएं समेटे है। रंगड़गांव के प्रधान भरत सिंह बताते हैं कि गंधक पानी के पानी में गंधक की मात्रा सहस्रधारा से ज्यादा है। उन्होंने बताया कि दो दशक पूर्व पर्यटन विभाग के तत्कालीन महानिदेशक एसएस पांगती ने इस स्थल पर पहंुचकर इसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की बात कही थी, लेकिन यह कोरी साबित हुई। इसके अलावा उत्तराखंड बनने के बाद दो मंत्रियों नवप्रभात और मातबर सिंह कंडारी ने क्षेत्र के लोगों को ऐसा ही भरोसा दिया था, लेकिन अब तक कुछ होता नजर नहीं आ रहा।

हेम पन्त

Source : Dainik Jagran

पुरोला (उत्तरकाशी)। उच्च हिमालय में स्थित ताल, बुग्याल अपने में कई रहस्य समेटे है। यही कारण है कि यहां देश-विदेश के पर्यटकों, घुम्मकड़ों का यहां जमावड़ा लगा रहता है। सूबे की यमुनाघाटी में स्थित सरूताल शिवपुराण का श्रीताल है, जो आज भी पर्यटकों की नजर से ओझल है।

उत्तराखंड राज्य में कई खूबसूरत पर्यटक स्थल हैं। सूबे की यमुनाघाटी और टौंसघाटी में अनेकों नयनाभिराम कर देने वाले पर्यटक स्थल आज भी विद्यमान है। पुरोला से 72 किमी दूर सरबड़ियाड़ में स्थित सरूताल समुद्रतल से 5257 मीटर की ऊचाई पर स्थित है। 92 मीटर लंबे और 72 मीटर चोड़ा ताल अपनी खुबसूरती के लिए क्षेत्र में विख्यात है। ताल के समीप पांच वर्षो से डेरा डाले बाबा गिरी महाराज व महन्त जमना गिरी बताते है कि शिवपुराण में यह श्रीताल था, जो बाद में समीप के गांव सर के नाम से सरूताल हो गया। मान्यता है कि इस ताल की परिक्रमा करने और इसकी पूजा पुष्पों से करने से मनोकामना पूर्ण होती है। इसके लिए प्रतिवर्ष यहां क्षेत्र के ग्रामीण इस ताल में पूजा के लिए जाते है। मान्यता यह भी है कि चौथे पहर में यहां प्रतिदिन अप्सराएं खुद ताल की पूजा करने के लिए आती है। इसके अतिरिक्त टौंसघाटी में केदारकांठा, पुष्टारा, बुग्याल सहित कई ऐसे स्थल है, जहां जाने के बाद कोई भी पर्यटक यहां से वापस आना नहीं चाहता है। वैसे तो पूरे हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे स्थल है जो पर्यटकों के लिए तिलिस्म के समान है। यही कारण है कि यहां वर्ष भर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। इसी क्षेत्र में विश्व प्रसिद्घ पर्यटक स्थल हरकिदून, भ्रराड़सरताल, देवक्यारा भी स्थित है। प. महिमानन्द तिवारी, शिशपाल सिंह, जयवीर सिंह, विरेन्द्र, प्रताप सिंह, देवेन्द्र सिंह का कहना है कि पर्यटन विभाग की ओर से इसके विकास के लिए पहल नहीं की गई। इस कारण यह ताल पर्यटकों की दृष्टि से ओझल है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

यहां भी है एक त्रिवेणी 
==========

गोपेश्वर(चमोली)। गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम इलाहाबाद में है और इसे त्रिवेणी कहा जाता है। देवभूमि उत्तराखंड में भी ऐसी ही एक त्रिवेणी है जो प्रचार के अभाव में आज तक आम लोगों की नजर से ओझल है। सीमांत जनपद चमोली में हेलंग के पास स्थित कर्मनाशा, कल्पगंगा और अलकनंदा का संगम है। कर्मनाशा नदी गौरसों से और कल्पगंगा पंचकेदार कल्पेश्वर से निकलकर अलकनंदा नदी में मिलती है। एक जमाने में यहां पर बदरीनाथ जाने वाले तीर्थयात्री स्नान कर आगे की ओर निकलते थे, लेकिन अब जानकारी के अभाव व प्रचार न होने के कारण यह त्रिवेणी पूरी तरह से उपेक्षित है। हालांकि स्थानीय लोग आज भी गंगा स्नान समेत अन्य पर्वो पर यहां पहुंचकर स्नान कर पूजा अर्चना करते हैं।

बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर जोशीमठ से 15 किलोमीटर पहले स्थित इस धार्मिक स्थल का पैदल यात्रा के दौरान यात्रियों के लिए जहां विशेष महत्व था, वहीं आज राजमार्गों के निर्माण के पश्चात इसका महत्व समाप्त होता नजर आ रहा है। तीन नदियों का संगम बनाने वाली तीनों पहाड़ियों की विशेषता यह है कि तीनों पहाड़ियां आपस में कहीं भी नहीं मिलती। पुराने समय में बेहद महत्वपूर्ण इस त्रिवेणी का बढ़ते भौतिकवाद ने अस्तित्व खो सा दिया है। जानकारी के अभाव में अब यात्री इस स्थान पर रुक नहीं पाते है। स्थानीय लोगों की मानें तो जब संचार सुविधाओं का इतना विकास नहीं हुआ था तब इस त्रिवेणी की जानकारी देश के कोने-कोने से बदरीनाथ आने वाले यात्रियों को थी। आज जहां बेहतर संचार सुविधाएं उपलब्ध है, वहीं सरकार धार्मिक स्थलों के संरक्षण व प्रचार-प्रसार की मात्र डुगडुगी पीट रही है। इसके चलते अति महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल निरंतर अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। देवभूमि में पुण्यलाभ अर्जित करने के लिए आने वाले तीर्थयात्रियों को वह समुचित उपलब्ध लाभ नहीं मिल पा रहा है।

78 वर्षीय हेलंग निवासी भगवान सिंह का कहना है कि स्थानीय लोग संक्रांति व त्योहारों पर यहीं स्नान कर पुण्यलाभ अर्जित करते थे तथा पिंडदान कर इसी त्रिवेणी से पित्रों का उद्धार भी किया करते थे। बढ़ती पाश्चात्य संस्कृति व नई पीढ़ी का घटता धार्मिक रुझान भी इस तीर्थ स्थल की पहचान को कम करने में सहायक रहा है। उनका कहना है कि यह धार्मिक स्थल यदि विकसित किया जाता तो दर्जन भर गांवों का केंद्र हेलंग आज पर्यटक स्थल के रूप में अपनी अलग पहचान बनाता। उर्गम निवासी पंडित परमानन्द सेमवाल के अनुसार इस तीर्थ स्थल का जिक्र केदारखंड में भी मिलता है। केदारखंड में स्पष्ट वर्णित न होने के चलते ठीक से इस तीर्थस्थल के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। इतना जरूर है कि यह तीर्थस्थल उनके बाल्यकाल में अति महत्वपूर्ण हुआ करता था। उन्होंने भी इस तीर्थ पर स्नान किया है तथा बदरीनाथ जाने वाले देश-विदेश से आये पर्यटकों को स्नान करते देखा है। वर्तमान में हर वर्ष लाखों तीर्थयात्री यहां से होकर गुजरते हैं, लेकिन प्रचार प्रसार के अभाव में यहां पर कोई नहीं रुकता। क्षेत्र के कुछ पुराने लोग ही इस बारे में जानकारी दे पाते हैं। समय रहते यदि सरकार ने ऐसे स्थलों की ओर ध्यान न दिया तो आने वाले समय में वह दिन दूर नहीं जब ऐसे स्थल गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो जाएंगे।


http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_5861785.html