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Batuli From Dayal Pandey: दयाल पाण्डे जी की बाटुलि

Started by पंकज सिंह महर, July 09, 2010, 10:36:30 AM

dayal pandey/ दयाल पाण्डे

Karakoti ji Namaskaar,
I am not very fleunt in garwali but I use to write in Kumaoni, these days I am prcticing garwali also hopfuly after few day able to write in garwali also,


पंकज सिंह महर

पहाड़ पर बसन्त ॠतु का स्वागत करती उनकी एक कविता


फिर से गम हर लायी है ,
फिर से ख़ुशी भर लायी है ,
पीली -पीली धरती हो गई है,
                          देखो ये बसंत ऋतु आयी है ,
यौवन खिल उठा धरा का ,
हर ओर हरियाली छाये है ,
सरसों-सेमल-बुरांश खिला है ,
वो पिछोड़ा ओढ़े आये है ,
                         देखो ये बसंत ऋतु आयी है
देवभूमि की रंगत बढ़ी है ,
ठिठुरता अब शिथिल पढ़ी है,
प्रिय का प्रीतम से मिलन हुआ है ,
दुल्हन अब निखर पड़ी है ,
प्रफुल्लित तन और उर मैं स्नेह लायी है ,
                         देखो ये बसंत ऋतु आयी है
घुघूती अब आने लगी है ,
कोयल भी गाने लगी है ,
सनन-सन कराती शीतल हवा
ये संदेशा लाये है ,
                       देखो ये बसंत ऋतु आयी है।

पंकज सिंह महर

तुम ऋतुराज हो ,
तुम सरताज हो ,
वर्ष का शुभारम्भ
तुम बसंत बहार हो,
बृक्षों को हरा बनाया,
कलियों को खिलाना सिखाया
नरों का प्यार नारायण का बरदान हो,
संतों का मगल गीत हो,
परियों का संगीत हो,
कवियों की कल्पना,
निर्धनों के मीत हो,
तुम एक आश हो,
एक बिस्वास हो,
तुम बसंत बहार हो,


पंकज सिंह महर

नया सबेरा आयेगा
         तम के दम को तोड़ देगा
         आशा की किरण जोड़ देगा
          दीन जनों को राह दिखाने
नया सबेरा आयेगा
          न तप होगा न धाम बहेंगे
           शीत पतझड़ न रह पायेगा
            घर -घर में बहार खिलाने
नया सबेरा आयेगा
            सर्व शिक्षा सर्वत्र होगा
            मेहनत सबका मंत्र होगा
            ज्ञान दीप का पुनः जलाने
नया सबेरा आयेगा
             सब रहें दुरुस्त रहेंगे
              ठग-ठेके लुप्त रहेंगे
              सज्जनों का मान बढ़ने
नया सबेरा आयेगा
              बंदूकें खामोश रहेंगी
              सर्वत्र प्रेम गंगा बहेगी
             विश्व शान्ति का पाठ पढ़ाने
नया सबेरा आयेगा 

पंकज सिंह महर

      पलायन पर

शायद हम पत्थर हो गए,
पहाड़ से लुढ़कना हमारी विवशता हो गयी,
यहाँ गुरुत्वाकर्षण नहीं आकर्षण है
हमने पहाड़ की जटिलता को नहीं
मैदान की सरलता को अपना लिया है
हमने परिश्रम नहीं उपदेश दिया है
गगनचुम्बी इरादों को कम्प्यूटर में कैद किया है
हमने वि्कास की बात कही है
अब विकास करना होगा
पहाड़ पर सीढ़ी लगाना होगा
हर सीढी पर पाँव जमाना होगा
गुजरना होगा झितालू की झाड़ी से
कूजे और घिंगारू   के  काटों से
लांघना होगा कंचन जंगा, काली गंगा को
पहुचना होगा पहाड़ की चोटी पर
अनुभव करना होगा पहाड़ के परिश्रम को
तभी विकास संभव होगा

पंकज सिंह महर

       उत्तराखण्ड

भारत की नानी चेली, सिराना मैं बैठी छू,
भली बाना भली वाणी देखिने की भली छू,
पुन्यु जैसी जुना जैसी सुकिली मुखडी छू,
सुकिली छू दांत पट्टी मुनई सुकिली छू,

द्वी खुटा( कूमाओं & गढ़वाल) मैं ठाड़ है रै दुनिया देखिने छू,
काफला किलीपी और बुरंशी धमेली छू
नैनी भीमताल आंख नंदादेवी नाख छू
हाथ फैलाई रयी अश्कोटा-आराकोटा छू

हरी -हरी आन्गाड़ी छू घाघरी हरिया छू
स्वर्ग की पारी जैसी धरती धरिया छू
तुप्कैली साडी और रंगाई पिछोड़ी छू,
देबभूमि देवता मैं जैसी देवी मैय्या छू,
xx        xx         xx          xx
रिशाई रै, दुखी है रै मन मैं झुरिया छू
१० साल हई हैगिन जस की तस छू
सब कुछ पाल मैं छू फिर लै विवश छू

ताकि -ताकि देखि रै छ मन मैं सोचन छू
बंज रै गिन गाड़ा - भीड़ा मकानों मैं टला छू
खाली-खाली भितेरा छिन, भकारों मैं मूसा छिन
बटा-ग्वेहट नि छ, न घोठा डंगर छि 
आपुन मुलुक आज आपुहों विराना  छू
कैक मुख चानों कुनै सब तो बिमुखी छिन
प्रजा लै विमुखी और रजा लै बिमुखी छिन

सुडा -सुडी धात लगें आओ मेरा ननों कुनै
घर आओ बबा मेरा मिकुनी समाओ कुनै
द्वारा-महवा खोलो घर कैन बसाओ कुनै
आपण हुनर ईजा आपुहैं दिखाओ कुनै

हरी-भाई देवभूमि जाड नि सुकाओ कुनै
वीर सुता पहाड़ों का पहाड़ों मई आओ कुनै
परदेश नि जाओ आपु देश कैन समाओ कुनै
हिमाला बचाओ और हिमाला बसाओ कुनै


पंकज सिंह महर

दो लाइन ग्लोबल वार्मिंग पर


गोला गरम हो रहा है,
हिमालय पिघल रहा है,
कही चक्रवात कही तूफान है,
कही ज्वालामुखी का उफान है,
कही कोहरा ढका  है,
कही बादल फटा है,
कही आग बरस रही है,
कही धरती दरक रही है,
कही नक्लिजेशन है,
कही रेडियेशन है,
पर्यावरण संतुलन खो रहा है,
क्या प्रलय हो रहा है?
क्यों हा-हा कार है,
कौन जम्मेदार है,
जिसकी गोद मैं बैठे है,
उसी प्रकृति को चुनोती दे रहे हैं,
xx        xx        xx         xx
हमें प्रदुषण रोकना होगा,
प्रकृति के सांथ चलाना होगा
तब हम शुखद जी पायंगे,
संसार को बचा पायंगे.

पंकज सिंह महर

आई के देखो , आई देखुला,
ढुंग बेच माट बेचीं , बेच खै पहाडा,
गंगा को पाणि बेच, आब  बिजली घोटाला
दुनिया सामानी उंला सरमा नि खूला,
आये के देखो इजा, आये के देखुला
नौवा सुखा, छौया सुखा, सुखाई है गधेरी,
खेती - पाति सुकै हालो, सुकै है धिनाई
किसम - किसम कोट पैरी नोट मै कमूला,
आये के देखो इजा, आये के देखुला
गैरसैण आवाज़ आली, चुप्पी शादी रुला
द्वी बार तो ठागे हाली आई लै ठगुला,
देहरादून बैठी बैठी ख़जान भारुला
आये के देखो इजा, आये के देखुला

पंकज सिंह महर

  " अपना गम"

गमो के दौर में जी रहा हूं मैं
जीवन की रह से विचलित हो रहा हूं मैं,
कहाँ जा रहा हूं, क्यों जा रहा हूं
जिया नहीं, फिर भी जिए जा रहा हूँ।
रात के भय से साया से ही डराने लगा हूं
सूरज से नहीं, चांदनी से जलने लगा हूं
सोचता हूं कही क़यामत न आ जाए
मन की मन्नत मन में नहीं रह जाए
उड़ा न ले ये आंधी मेरी आशाओं को
इसलिए सुनसान सहमा सा बैठा रहता हूं
पलको को बिना भिगाए रोते रहता हूं
सिसकियां बता न दे मेरी व्यथाओं को
अब तो चिरागों में भी गुम हो गया हूं मैं,
संसार भी बंद कमरे सा लगाने लगा है
दीवारें भी बेबस चीखने लगी हैं
अभागे कहाँ भागने लगा है
तेरे पथ का पतन हो गया है
उम्मीद भी दफ़न हो गए हैं
मैं तो लुटाने को भी तैयार था
नहीं खबर की लुटेरा ही यार था
नीरस लगाती है जीवन की ख़ुशी
गमो का ही सहारा है मुझे
कही ये भी न छीन जाए
इसलिए इन्हें ही पकडे रहता हूं
सीने में जकडे रहता हूं।।