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Batuli From Dayal Pandey: दयाल पाण्डे जी की बाटुलि

Started by पंकज सिंह महर, July 09, 2010, 10:36:30 AM

पंकज सिंह महर

साथियो,
हमारे वरिष्ठ सदस्य श्री दयाल पाण्डे जी एक उदीयमान कवि  भी हैं, इस टापिक के अन्तर्गत उनके द्वारा रचित कविताओं का संकलन किया जायेगा। दयाल जी अपनी भावनाओं को कितनी सुन्दरता से अक्षरों का रुप देते हैं, उससे आप भी परिचित हो सकेगें।

उत्तराखण्ड में जब कोई हमें याद करता है तो जो हिचकी लगती है, उसे बाटुलि कहा जाता है और हमें जब कोई नराई (पुरानी याद) लगती है, तो भी बाटुलि लगती है।

दयाल जी, एक कवि के रुप में बहुआयामी कवि हैं, वे तत्काल कवितायें लिखने में भी माहिर हैं, उत्तराखण्ड के हर पहलू पर वे कवितायें करते हैं। चाहे वह आन्दोलन हो, विकास की चाह हो, पलायन की पीड़ा हो उनकी लेखनी किसी भी समसामयिक मुद्दे से अछूती नहीं रहती। हां, वे श्रृंगार रस, वात्सल्य रस के साथ-साथ वीर रस के समागम वाले कवि भी हैं।

तो चलिये, उनकी कविताओं का रसास्वादन करें।

पंकज सिंह महर

प्रस्तुत कविता उनकी सबसे ताजी रचना है, जो उन्होंने अभी-अभी मुझे भेजी है-

सब हो गया ठप्प, हो गया क्याप्प,
क्यों हुआ, पता नहीं, कैसे हुआ, कसप....!
लिखें-पढे़ तो नौकरी ठप्प,
शाम हुई तो बिजली ठप्प,
ऑफिस चलें तो बाइक ठप्प,
मेल देखें तो साईट ठप्प,
सब हो गया ठप्प, हो गया क्याप्प,
क्यों हुआ, पता नहीं, कैसे हुआ, कसप....!


सरकार बनी तो विकास ठप्प,
बारिश हुई तो निकास ठप्प,
करार हुआ तो विश्वास ठप्प,
बीज बोया तो बरसात ठप्प,
सब हो गया ठप्प, हो गया क्याप्प,
क्यों हुआ, पता नहीं, कैसे हुआ, कसप....!


कब होगा भ्रष्ट्राचार ठप्प?
कब होगा पलायन ठप्प?
कब होगी महंगाई ठप्प?
कब होगा अत्याचार ठप्प?
ये किसे पता नहीं , हो गया क्याप्प,
क्यों हुआ, पता नहीं, कैसे हुआ, कसप....!

पंकज सिंह महर

गैरसैंण आन्दोलन पर उनकी एक कविता

अन्यारपट्ट रै नि सकूँ जल्दी ब्याली रात,
राजधानी जिक्र जब आलो, होलि गैरसैण की बात,

दीक्षित आयोग कुलै जाल, सरकार लै पलटि है जाल,
उत्तराखंडी मुनव उठाला - ह्वै जाला सब साथ,
राजधानी जिक्र जब आलो होलि गैरसैंण की बात,

गौं-गौं बै आवाज़ उठी गै, अन्यायी अब भौती है गे,
जनुल राजधानी नाम सुझाछी, उन लै बागियुं का सांथ,
राजधानी जिक्र....................

आंदोलनकारी उसीकी रैगिन, दमनकारी गद्दी में भैगिन,
अब ज्यादे दिन नि चलल, यो गोर्खियुं  जस राज,
राजधानी जिक्र..............

9 सालूं में 5 बदल गिन, बात ग्वै हैंत उसीकी राइ गिन,
उन लोग लै नि नजर उनै जेल पैर यो ताज,
राजधानी जिक्र जब.............

विकास हुन जरुरी छू, गैरसैण बनुनी छू,
वचन दयुछ म्योर पहाड़ और उठून हाथ,
राजधानी जिक्र जब आलो होलि गैरसैण की बात....

पंकज सिंह महर

बीते दिनों दिल्ली में आई बरसात और उससे लगे जाम पर एक त्वरित कविता


पंकज सिंह महर

ठेठ पहाड़ी भाषा में डूबा श्रृंगार रस

अपना तो ऐशा ही ठैरा यार,
ख़त उनको हजार दिए
डाकखाने उजाड़ दिए
पत्रौत्तर हुआ ना एक बार
                  अपना तो ऐशा ही ठैरा यार


पड़ने-लिखने मैं हम बोर ठैरे
शक्ल से हम चोर ठैरे
बस यूं ही हो गया प्यार
                   अपना तो ऐशा ही ठैरा यार


दोस्तों की है बात निराली
कभी भी नहीं रखते जेब को खाली
देते हैं उधार पे उधार
                     अपना तो ऐशा ही ठैरा यार

मेहनत हमने सीखी नहीं
रहमत हम पर होती नहीं
बस किस्मत का इन्तेजार
                      अपना तो ऐशा ही ठैरा यार

राजनीति अपना ऐम बचा है
उसके बाद फिर सजा है
बनते रहे धरती पर भार
                       अपना तो ऐशा ही ठैरा यार

पंकज सिंह महर

उक्त कविता को पढ़कर जब साथियों ने कुछ इफ-बट लगाये तो कविवर का उत्तर पढिये-

न पूछो ये सब कैसे हुआ है,
तुम्हारी ही तानो ने दिल को छुआ है
गैरो की चाहत, अपनों की दुआ है
इसी से मेरा परिवर्तन हुआ है
xx         xx            xx          xx
मिटा दो धरा से नफ़रत का साया
हटा दो मन से अहं की काया
थोड़े से संयम मैं क्या कुछ हुआ है
न पूछो ये सब कैसे हुआ है
xx          xx           xx          xx
परिवर्तन तो तुमको लाना ही होगा
जहाँ को जन्नत बनाना ही होगा
सोचोगे ये तो आश्चर्य हुआ है
न पूछो ये सब कैसे हुआ है

पंकज सिंह महर

क्यों होती हो हमसे खफा,
तम्हें हमारा ध्यान नहीं है,
लिखी जाती हो रेत पर कविता,
तुम्हें लहर का ज्ञान नहीं है

शब्द बोलने से अक्सर
विवाद खड़े हो जाते हैं
ना मैं समझूं, ना तो तुम समझो
बस यु ही बेरूख हो जाते हैं

जीवन के इन हसीं पलो को,
तन्हा में ना छोडो तुम
हाथ छुड़ा लो सपनों से
सच से नाता जोड़ो तुम

सत्यदेव सिंह नेगी

दयाल जी की इस बहु-आयामी प्रतिभा को मेरा सलाम है जी इश्वर इनको बरकत बक्शे