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पूर्णागिरी मंदिर उत्तराखंड ,Purnagiri Temple Uttarakhand

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, July 11, 2010, 06:19:53 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand


Devbhoomi,Uttarakhand

यह मेला चम्पावत जनपद के पूर्णागिरी पर्वत पर लगता है। पूर्णागिरी पर्वत  लगभग 10,055 फीट ऊंचा है। यहां की देवी को अन्नपूर्णा पूर्णागिरी माता कहा  जाता है। यहां प्रतिवर्ष चैत्र की नवरात्रि में मेला लगता है

जिसमें  दूर-दूर से भक्तजन आते है। पूर्णागिरी जाने के लिये टनकपुर रेलवे स्टेशन  जाना पड़ता है। टनकपुर से लगभग 20 कि0मी0 दूरी पर पूर्णागिरी मन्दिर है।  मन्दिर के लिये पहाड़ से रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है




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देवी व उनके  भक्तों के बीच एक अलिखित अनुबंध की साक्षी ये रंगबिरंगी लाल-पीली चीरें  आस्था की महिमा का बखान करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर फिर मंदिर के  दर्शन व आभार प्रकट करने और चीर की गांठ खोलने आने की मान्यता भी है। 

टनकपुर से टुण्यास व मंदिर तक रास्ते भर सौर ऊर्जा से जगमगाती टयूबलाइटें,  सजी-धजी दुकानें, स्टीरियो पर गूंजते भक्तिगीत, मार्ग में देवी-देवताओं की  प्रतिमाएं, देवी के छंद गाती गुजरती स्त्रियों के समूह सभी कुछ जंगल में  मंगल सा अनोखा दृश्य उपस्थित करते हैं।

रात हो या दिन चौबीस घंटे मंदिर  में लंबी कतारें लगी रहती हैं। मस्तक पर लाल चूनर बांध या कलाई में लपेटे  भूख-प्यास की चिंता किए बिना जोर-जोर से जयकारे लगाते लोगों की श्रध्दा व  आध्यात्मिक अनुशासन की अद्भुत मिसाल यहां बस देखते ही बनती है।






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चारों ओर बिखरा  प्राकृतिक सौंदर्य ऊंची चोटी पर अनादि काल से स्थित माता पूर्णागिरि का  मंदिर व वहां के रमणीक दृश्य तो स्वर्ग की मधुर कल्पना को ही साकार कर  देते हैं।

नीले आकाश को छूती शिवालिक पर्वत मालाएं, धरती में धंसी गहरी  घाटियां, शारदा घाटी में मां के चरणों का प्रक्षालन करती कल-कल निनाद करती  पतित पावनी सरयू, मंद गति से बहता समीर, धवल आसमान, वृक्षों की लंबी  कतारें, पक्षियों का कलरव-सभी कुछ अपनी ओर आकर्षित किए बिना नहीं रहते। 

चैत्र व शारदीय नवरात्र प्रारंभ होते ही लंबे-लंबे बांसों पर लगी लाल  पताकाएं हाथों में लिए सजे-धजे देवी के डोले व चिमटा, खड़ताल मजीरा, ढोलक  बजाते लोगों की भीड़ से भरी मिनी रथ-यात्राएं देखते ही बनती हैं।



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प्रचुरता  पर्यटन-स्थलों की पर्यटन में दृष्टिकोण से टनकपुर व पूर्णागिरि का संपूर्ण  क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्राचीन ब्रह्मदेव मंडी, परशुराम घाट,  ब्रह्मकुंड, सिध्दनाथ समाधि, बनखंडी महादेव, ब्यान, धुरा, श्यामलाताल,  भारामल, भुमियागाड, खिलपत्ति, शारदा व्यू आदि अनेक प्राचीन ऐतिहासिक व  धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं।

मंदिर आने वालों की  संख्या में वृध्दि को देखते हुए इस तीर्थ के कायाकल्प का प्रयास किया जा  रहा है। ककराली-भैरोमंदिर हाट मिक्स रोड, स्नान-घाट, सुलभ शौचालय,  रैन-बसेरा आदि पर कार्य जारी है। ठूलीगाड से देवी दरबार तक रोप वे ट्राली  लगाने की भी स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।



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पूर्णागिरी मंदिर में प्रवेश के लिए कुछ सावधानियां ध्यान में रखनी पड़ती है !


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पूर्णागिरी जहाँ सती की नाभि गिरी थी

शिवजी-सती-दक्ष वाला। सती ने जब आत्महत्या कर ली, तो शिवजी ने उनकी  अन्त्येष्टि तो की नहीं, बल्कि भारत भ्रमण पर ले गये। फिर क्या हुआ, कि  विष्णु ने चक्र से सती की 'अन्त्येष्टी' कर दी। कोई कहता है कि 51 टुकडे  किये, कोई कहता है 52 टुकडे किये।


हे भगवान! मरने के बाद सती की इतनी  दुर्गति!!! जहाँ जहाँ भी ये टुकडे गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गयी। एक जगह पर  नाभि भाग गिरा, वो पर्वत की चोटी पर गिरा और पर्वत में छेद करके नीचे नदी  तक चला गया। यह नदी और कोई नहीं, भारत-नेपाल की सीमा निर्धारित्री शारदा  नदी है।अब पता नहीं कैसे तो लोगों ने उस छेद का पता लगाया और कैसे  इसे सती की नाभि सिद्ध करके शक्तिपीठ बना दिया। लेकिन इससे हम जैसी भटकती  आत्माओं की मौज बन गयी और भटकने का एक और बहाना मिल गया।

इस शक्तिपीठ को  कहते हैं पूर्णागिरी। यह उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊं अंचल में चम्पावत  जनपद की टनकपुर तहसील के अन्तर्गत आता है। जिस तरह से जम्मू व कटरा पर  वैष्णों देवी का रंग छाया है, उसी तरह टनकपुर पर पूर्णागिरी का। आओ, पहले  आपको टनकपुर पहुंचा देते हैं-




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