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Exclusive Poems of many Poets-उत्तराखंड के कई कवियों ये विशिष्ट कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 11, 2010, 10:20:44 PM

Bhishma Kukreti

Dunya Bachan: Garhwali poem Calling 'Save the Earth '

दुन्या बचाण त...

कवि- मदन डुकलाण

दुन्या बचाण त
बचै का राखा
लासौं मा खून
पांसौं मा दूध
अगास मा सूरज
बादळु मा जून
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
गौं - गुठ्यार
बार त्यौहार
अपनों ऐना
अपनों अन्द्वार (अन्वार )
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
मन मा माया
पित्रु की छाया
रौल्युं मा छ्वाया
चुल्लों मा आग
बणु मा बाग़
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
हिमालय मा ह्यूं
मंदिरों मा द्यूं
माणि मा घ्यू
जिकुड़ी मा ज्यू
दुन्या बचाण त
बचै कि राखा
आंख्युं मा आंसू
मन मा सान्सू
कोखी कि बेटी
ब्व़े कि बोली
सर्वाधिकार , मदन डुकलाण
The earth would be saved
When in body the blood is saved
When in nipple milk is saved
When in sky the sun is saved
When in cloud the moon is saved
The earth would be saved
When in village, courtyard is saved
When in country the festivals are saved
When our own mirror is saved
When our own face is saved
The earth would be saved
When in mind, the love is saved
When in small valleys, the springs are saved
When the fire is saved
When in jungle, tiger is saved
The earth would be saved
When in Himalaya, the snow is saved
When in temples, earthen lamp is saved
When in pot, ghee is saved
When in eyes, tear is saved
When in uterus, girl child is saved
When in society, mother tongue is saved

Copyright@ Madan Duklan  13/7/2012

Bhishma Kukreti

बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब****** गढ़वाली कविता



                 कवि नरेंद्र गौनियाल

बिन कांडों का नि खिल्दा गुलाब,मि जणदु छौं.
पण अपणा नसीब मा फूल ना,सिर्फ कांडा छन.

सुपिना त सुपिना ही च,असलियत से दूर.
ऊ नि आंदा असल मा त,स्वीणों मा सही.

वक्त की रफ़्तार तै,समझणु च जरूरी.
यु कमवख्त वक्त,कैका बाना रुक्दू नी.

कब तक रैलि इनि दूर,अन्ध्यरा का सहारा.
उज्यल़ा मा त मि दगड़ी रौंलू,छैल बणिकी.

कुछ बुना कि सजा,इन ना दे तू चुप रैकि.
सजा जु बि दीणे तिन,दे दे तू चट बोलिकि.

चुप रैकि बि सब कुछ,बोलि जन्दिन आंखि.
दिल कि बात दिल मा,दिखै जन्दिन आंखि.

आंखि चिट गुलाब सि,जनि कि धूल जईं होलि.
सच किलै नि बुन अपणी त, निंद ही हर्चि गे.

उंकी याद कबि दिल मा चुभदी,कबि कुतग्यळी लगान्द.
वक्त-बे वक्त इनि कबि रुवांदी च,त कबि ख़ित्त हसांद.

डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित.
Modern Garhwali Literature Series

Bhishma Kukreti

प्रसिद्ध गढवाली कवि नेत्र सिंह असवाल कि कुछ गढवाली गजल

मुखै  ऐथर सौ चरेतर करदीं लोग   

पीठ पीछ सर्र , भूलि जैन्दि  लोग I

**

गाळि  दियांला , नुँना कि म्वरदा 

फिर भी रोज नई, गाळि दिंदि लोग I

***

ऊंस चट्याँन , तीस नि जांदी

तीस बढ़ाणौ   , ऊंस पिंदी लोग

**

म्वरणु भजुणु  अब आम बात छ

बस गीत मुंड हलैअ , मिसांड रंदी लोग I

**

उज्याड़ बाड़ खांद , चुप द्यखदा रंदी लोग   

निगुसें का ढांगा थैं , क्च्यांड रंदी  लोग

**

सर्वाधिकार नेत्र सिंह असवाल, नई दिल्ली

Bhishma Kukreti

*******वींका गलोड़ी मा तिल*******गढवाली कविता



कवि- डा. नरेंद्र गौनियाल

वींका गलोड़ी मा तिल,जब देखि मिल.
झिल-मिल,तिल-तिल,ह्वैगे मेरो दिल.

पैली छै बिगरैली लटुली,लंबी-सुनहरी.
मेहँदी लगण से अब,बदलीगे रंग-ढंग ही.

आंखि कळसिणि,बड़ी-बड़ी,जंगी बटन जनि.
अपणि त हर्चिन्द होश,वा द्यखदी च जनि.

ककड़ी का सि पिपरा,सुरसुरा कंदूड़ वींका.
ज्वानि को रंग बि,झल तौं मा दिखेंदा.

नकब्वड़ी पतळी, खड़ी,तोता का चूंच जनि.
ब्वलिंद कै तै कच्याणो, तैयार होलि जनि.

मुंगरी कि सि बीं,चमकीली दांत-पाटी.
रैंद डौर कि कबि, न दे कट काटी.

होंठड़ी वींकी लाल,नारंगी सि फ़ोळी.
रसीली,नशीली,डसीली,जिकुड़ी मा गोळी

अंगूल़ा वींका, सींक सि बरीक.
रंग चढकि लगदीं,तीर सरीक.

खुट्यू मा वींका, लगदीं पराज.
गौळी मा भडुळी,लगणि च आज.

खुद मा कैका ,वा होलि आज.
क्वी नि जणदू,वींकु यु राज.

डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित...



Bhishma Kukreti

*********पैलि अपणु मुख ऐना मा त देख -गढ़वाली कविता



कवि -डॉ नरेन्द्र गौनियाल

[गढ़वाली गीत , गढ़वाली कविताएँ, गढ़वाली पद्य साहित्य]


हैंका मुख पर झुवाल देखि, तू ख़ित्त ना हैंस.
अरे लाटा ! पैलि अपणु मुख,ऐना मा त देख.

इन ना चुटावा सिक्कों तै, सुद्दी जख-तख.
तुमारा ये शौक से त ,ग़दर-गै मची जाली.

अब त कटेणी च जिंदगी,बस उदास सी.
हंसण-ख्यलणा का दिन, अब त चलिगीं

तू वख मि यख त बोल, मिलि सकला कख.
एक लपाग बि भैर आणु ,कैका बस मा नीं.

कुछ मन मा च त्यारो त ,बोलि दे तू चट.
ये लाटा ! फिर कबि ,मौका मिल ना मिल

आंदा-जान्दों तै पुछ्दां,ऊंतई बि देखि कखि.
नि बि दिखेंदा त गाणि त, हम कैरि सकदां.

मिटे सक दुन्या कु अन्ध्यरू,इनु त क्वी नि करदू.
बस सुद्दी सब अपणि-अपणि,दुकान चलाणा छन.

उंकी फितरत च कि ऊ, सिर्फ अपणा मन कि कर्दिन.
अपणा मन कि बात च कि मि, कुछ बोलि नि सकदु..

डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित   


गढ़वाली गीत , गढ़वाली कविताएँ, गढ़वाली पद्य साहित्य

Bhishma Kukreti

दर्शन सिंह बिष्ट की (जन्म १९६०-)  गढवाली  कविताएँ

[भीष्म कुकरेती की गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला से ]



शक्ति

शब्दों कि शक्ति

दिल से भक्ति

राजनीति कि तख्ति

'बम से भी खतरनाक होंदी

****

स्याणि

मी ब्व्न्नू छौं बुड्या जि कि

तुम साक्युं तक ज्यून्दा रयाँ

पर ह्यां

तुमारि आंखि बुजी जयां

अर तुम

खटुलिम बटि भयां नि अयाँ

मि थैं

छक्वै पिन्सन खलाणा रयां

पर भारे

मि जै ख्वाळा जौंलू

मीखुण कुछ नि ब्वल्यां

***

सन्दर्भ- केर, दर्शन सिंग बिष्ट का  गढवाली कविता संग्रह धाद प्रकाशन , देहरादून

सर्वाधिकार - दर्शन सिंह बिष्ट , अगरोड़ा , पौड़ी गढ़वाल

गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला जारी....

Bhishma Kukreti

*******जिकुड़ी मा लग्यूं तीर ******
         कवि--डॉ नरेन्द्र गौनियाल
जिकुड़ी मा लग्यूं तीर अब त,प्राण लेकि ही रालो.
जब तलक चुभ्यूं च रैणि दे,इनि बूज सि छेद पर.

वींकी याद धरीं,जिकुड़ी का एक कूणा मा कुटरी सि.
अब  क्वी घचोर्याँ ना,फूटि जालि नासूर बणिकि.

मि बुनूं छौं त बुन दे,यु मेरो दिल कु गुबार च.
त्वे तै पीड़ च त सैले ज़रा,यु तेरो इम्तहान च.

इनु ना रुसै तू हमसे,कबि गलती से बि.
याद आलि जब त्वे,त तू सुरुक ऐ जै.

द्याखा छा जु सुपिना,ऊ सुपिना ही रैगीं.
जौंका बाना छौ खटेणू,ऊ आग बणिगीं.

य दुन्य बि कनि च,अपणोंन ही मारि लूट.
आंखि खुली पता चलि,माया जाळ यु झूठ.
          डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित 

Bhishma Kukreti

********याद जब तू करणी रैलि********


               कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल



[कविताएँ व  गीत, गढ़वाली कविताएँ  व गीत; उत्तराखंडी कविताएँ व गीत; मध्य हिमालयी कविताएँ व गीत; हिमालयी कविताएँ व गीत; उत्तर भारतीय कविताएँ व गीत;  भारतीय कविताएँ व गीत; दक्षिण एशियाई कविताएँ व गीत; एशियाई कविताएँ व गीत लेखमाला ]
जिकुड़ी य धक-धक, धड़कणी रैलि,
तेरो नौं य जब तक,इनि लीणी रैलि.
त्वे बिसरणु च अब, भौत मुश्किल,
जिंदगी य बस इनि,कटिणी रैलि.

उनु त कतगे होला,फिरबी तू होलि यखुली,
मि सदनि दगड़ मा,जब तू याद करणी रैलि.
तेरि याद का सहारा,इनि कटि जाला यु दिन,
मन की पीड़ मन मा,जिंदगी ख़ुशी से कटेली.

सुख कि जूनी इनि चमकणी रैलि,
दुःख कि बदळी इनि हटणी रैलि.
जिंदगी कु बाग़ इनि महकणू रालो,
प्रेम कि खुशबू इनि आणी रैलि.

मन का फूल इनि खिलणा राला,
धीत कि प्वतळी इनि उड़णी रैलि.
दुःख का दिन मि इनि बिसरि जौंलु.
याद जब तू इनि  करणी रैलि.

    डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित   
कविताएँ व गीत, गढ़वाली कविताएँ व गीत; उत्तराखंडी कविताएँ व गीत; मध्य हिमालयी कविताएँ व गीत; हिमालयी कविताएँ व गीत; उत्तर भारतीय कविताएँ व गीत; भारतीय कविताएँ व गीत; दक्षिण एशियाई कविताएँ व गीत; एशियाई कविताएँ व गीत लेखमाला  जारी ...


Bhishma Kukreti

*********अजुकि बात हुईं च आज लोग क्य बुना छन********

                           कवि -डॉ नरेन्द्र गौनियाल

अजुकि बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
ठुला मास्टर जि दारू पेकि,नाळी मा पड्यां छन.

खेती-पाती चौपट,पुंगड़ी-पटळी बांजि पडीं छन.
खुटों मा खुटा धरी,दिनरात सीरियल दिखेणा छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
ब्याल़कि घसकटा ब्वारि,आज नेता बण्या छन.

यूंकि देखो क्य मत मरीं,बेशरम बण्या छन.
नौकरी-ठाठ-बाट वल़ा,बीपीएल बण्या छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
अमीरों तै राहत,गरीबा कागज वखी फस्यां छन.

महंगाई कि मार,जनता लगीं सार,नेता सियाँ छन.
कतगै दा घचोरिकी बि निरभै,कूण सियाँ छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
टिटपुन्ज्य बि अब त सबि,लाटसाब बण्या छन.

कूड़ी-पुंगड़ी बांजी,मन्खी लापता हुयां छन.
घर गौं मा सुंगर-बांदर,चौकिदरी कना छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
बांजा खत्तों मा बल,अब त रिसौर्ट बणणा छन.

घिनुड़ी-घुघूती हर्चिगीं,अबाबील उड़णा छन.
घर-घर मा भितर जैकि,घोसला बणाणा छन.

अजुकी बात हुईं च आज,लोग क्य बुना छन.
सीधों कि कुगत अर, बदमाश आनंद कना छन.

          डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

दर्शन सिंह बिष्ट (जन्म १९६०)की कविता



[भीष्म कुकरेती की गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला से ]



विकास

आंगनवाडी म् ज्यादतर

वूं कि घरवळि मौज म्

बी.पी.एल कार्ड वेकू

जैका चार नौना फ़ौज म्

विकलांग पेंसन वेकी

जु रात कर्दा चोरी

पार्टी इमानदार लुंड

जु दिन- रात गप्पी म्र्दु कोरी

खच्चर बतिया सचिव -साब की कौफिम

ग्राम सभा की सुख - सुविधा प्रधान जीक चौकी म

सर्वाधिकार @ दर्शन सिंह बिष्ट


गढवाली पद्य , गढवाली कविताएँ, गढ़वाली गीत. उत्तराखंडी पद्य, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी पद्य लेखमाला जारी ...