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Exclusive Poems of many Poets-उत्तराखंड के कई कवियों ये विशिष्ट कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 11, 2010, 10:20:44 PM

Bhishma Kukreti

********मेरि मांजी********(पलायन कि पीड़ --एक गढ़वाली गीत-कविता)


           कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

[गढवाली गीत, गढ़वाली कविता, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी कविता, हिमालयी गीत , हिमालयी कविता ]

तेरा हाल देखि मांजी, मेरि गैळी उबाई.
टप-टप मेरि आंख्यों,पाणि ऐ ग्याई.

कनि छै ब्वे तू यखुली,यखुली-यखुली.
ससुराल चलि गैनी,सबि दीदी-भुली

चलि गैना परदेश,मेरा भाई-भौज.
तू छै ब्वे अफु रूणी,बैठ्याँ हम मौज.

पुंगड़ी-पटळी सबि,फुंड राख बांजी.
यकुलो जीवन कसिकै ,रैलि तू मांजी.

लाचार छौं मेरि मांजी,मि जि क्य करदु.
यख-वख कख-कख,मन मि धरदु.

मन त करद मांजी, मि बैठूं तेरो पास.
मेरि बाटी ह्वैगे न्यारी,कनि पड़ी फांस.

फागुणा का मैना मांजी,पुंगड़ी मा रैली.
डाल़ा फ्वड़दा तेरा हाथों,पड़ी जालि छैळी.

मौल्यारा का बगत बि,निंद त्वे नि आली.
हाथ-खुटी दुखाली तेरि, पिंडळी पिड़ाली.

हाथ-खुटी तिड़ी होलि,कसी कै हिटाली.
तेरि नांगी खुट्यूं मांजी,गारी बिनाली.

गौं-गल्यो कि दीदी-भूल्यो,मेरि ब्वे बि देख्यां.
लखडु-पाणि कि बि कुछ, तुम मदद करि दियां.

गाँव का दीबा-भूम्यां,तुम दैणा हुयाँ.
मेरो घर-गौं मा सबि,राजी-ख़ुशी रैंया

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित (narendragauniyal@gmail.com )

गढवाली गीत, गढ़वाली कविता, उत्तराखंडी गीत, उत्तराखंडी कविता, हिमालयी गीत , हिमालयी कविता जारी ....

Bhishma Kukreti

Samaun : Story about rural and Urban Cultural Differences

(Review of Garhwali Story collection 'Bwari' (1987) by Durga Prasad Ghildiyal)

                            Bhishma Kukreti

           [Let Us Celebrate Hundredth Year of Modern Garhwali Fiction]
                      The story is about mother dividing the ancestral properties among sons for helping a son living in city that he gets his flat free from debt.
              Ghildiyal takes the readers showing the differences emerging between rural and urban culture.
The story is mirror of sixties and seventies of life of Garhwalis living in Garhwal and cities.
Reference-
1-Abodh Bandhu Bahuguna, Gad Myateki Ganga
2-Dr Anil Dabral, 2007 Garhwali Gady Parampara
3-Bhagwati Prasad Nautiyal, articles on Durga Prasad Ghildiyal l in Chitthi Patri
4-Dr. Nand Kishor Dhoundiyal, Garhwal Ki Divangat Vibhutiyan
5- Notes by Prem Lal Bhatt on Ghildiyal
Copyright@ Bhishma Kukreti, 21/7/2012

[Let Us Celebrate Hundredth Year of Modern Garhwali Fiction]

Bhishma Kukreti

*******तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन********
                   कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

मि चांदु कि तू खुश रहे सदनि इनी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

हवामहल बि त्वे नि दिखै कबी.
भूखो-प्यासो बि त्वे नि रखो कबी.
मि चांदु तेरि हर हसरत हो पूरी इनी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

गिच गफा अर मुंड ढकणो एक कूड़ी बि हो.
बदन पर लैरी-लती बि हो इनि भलि-भली.
मि त चांदु कि तू नूर,सदनि इनि नूर ही रहे.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

कबी दुःख नि दे,न कबी सताई त्वे.
न कबी कर्म से न मर्म से, दुखाई त्वे.
हर दिन हर घड़ी तेरो ख्याल करे.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

मितै रैंद सदनि तेरि अंसधरी कि फिकर.
मितै रैंद सदनि तेरि भावना कि कदर.
इनि चांदु सदनि मि मेरि सरि जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

मेरो सुख बि घटद,त्वे दुखी देखिकी.
मेरो दुःख बि घटद,त्वे सुखी देखिकी.
इनि चांदु मि मेरि कटे भली जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

तन कि रीत य सदनि रहे इनी.
मन कि प्रीत य सदनि रहे इनी.
इनी चांदु मि मेरि सुखी जिंदगी.
पण तेरि तकदीरकु मिन बि क्य कन.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित   

Bhishma Kukreti

ऊखै  फिकर... २ एक गढवाली कविता



कवि -डी डी सुंदरियाल "शैलज

फिकर त कवि-गीतारू भि छ
सब बुनान गढ़वालि लिखा
गढ़वालि सीखा, गढ़वालि बोला
(निथर हमरु लिख्युं कैन बिंगण)
पर वूंका नोन्याल गढ़वालि नि जणदा
अपणई दादि-दादा नि पछेणदा।

गढ़वालि सभा सोसेटि जगा-जगा
बस्ग्यली च्यूँ सि जमी छन
गढ़वाली गीत, कविता, ड्रामा त क्या
लोग फिल्म तक बणाना छन
पर दगड़ी-2 बांबे-दिल्ली कूड़ा
भि चिणआणi छन
गढ़वाल रीतु करि सर्या दून्याम फैलाण
य क्वी कम बात त नी च

इन त नी च कि

वूं तै ऊखै फिक्रर नी च।



डी डी सुंदरियाल "शैलज" , 49 शिवालिक विहार, जीरकपुर (पीबी)
9501150981


Bhishma Kukreti

**********जनता अर नेता**********
               कवि-डॉ नरेन्द्र गौनियाल

जनता
हर चुनौ मा
आंखि देखिकी
वोट करद
जितणा बाद
नेता अर सरकार
आंखि बूजिकी
जनता का कपाळ मा
चोट करद

जनता
हर चुनौ मा
दाता बणिकि
वोट दींद
नेता चुनद
चुनौ का बाद
जनता
मंगता ह्वै जांद
नेता
दाता बणि जांद

जनता
हर चुनौ मा
प्यार-प्रेम कि
मिशाल धरद
नेता
जु चुनौ से पैलि
भाई-चारा कि बात करद
जीत का बाद
अपणि
औकात पर ऐ जांद
जै कै तै सुद्दी
आंखि दिखांद

जनता
हर चुनौ मा
नेता का ऐथर
कतगे
मुद्दा धरद
नेता
जु चुनौ से पैलि
मुल्क का
विकास कि बात करद
जीत का बाद
एक चुटी
अपणो विकास करद

जनता
हर चुनौ मा
नेता तै
अपणि बात
बिंगांद
नेता
चुनौ से पैलि
वोट मंगद
हथ ज्वड़द
खुटा पडद
कूणों-कूणों जांद
जीत का बाद
झणि कै
कूण लुकि जांद

जनता
हर चुनौ मा
राशन-तेल
बिजली-पाणि
सड़क-यातायात
शिक्षा-रोजगार
संचार साधन कि बात करद
नेता
जु चुनौ से पैलि
जनता तै
दिन दुपहरी
कतगै
स्वीणा दिखांद
जीत का बाद
बौगु ह्वै जांद
बौंहड़ से जांद.

    डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित       

Bhishma Kukreti

म्यरों भै

[वृक्षारोपण पर गढ़वाली कविता]



कवि - डी डी सुंदरियाल "शैलज

जै दिन  पर मी हूंउ
म्यार बूबाजीन
अप्णा बूबजिकि खणी सग्वड़ी म
एक आरू की ड़ालि लगाइ
ब्वै न मी दुदी पिलाए
त बूबाजीन वीं ड़ालि पाणि द्याइ ।
जनि-2 मि जवान हूं
त व ड़ालि बि बड़ी हवाईं
मिन घौर-बोण सम्हाल,
ब्वै-बाबु स्यवा काय
त वीं डालिन हमू मिठा-मिठा आरू दीनि
म्यरा बुबाजी बोलदा छा
(अर म्वर्द-म्वर्द भि बोल्णा रेनी )कि
म्यारा द्वी कमोत नोना छन, अर
एक दिन त मजा ही ऐग्या,
म्यारा ब्यो का सालो बसग्याल
मेरी "व" आरू तोडनों चलिग्या
बल "हे ये डाला पर बिलकी मेरी चदरी फटिगे,
मीन बोली  " डालु नि, त्यारू द्यूर छ वो
क्या ह्वै जो वैन जरा  मज़ाक करी दे॰।"
अर वो दिन भि ऐनी,
जब म्यारा द्वी नौना
रात दिन काकाकि
धोणइम चढ़ीआन रेनी

अर आज तिन या डालि काटि द्याइ,
डालि नि काटि दिदा
तिन म्यरू भै मारि द्याइ।


सर्वाधिकार - डी डी सुंदरियाल "शैलज

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


पानी नदिया प्यास

हुई प्यास से अधमरी, काला पड़ा शरीर।
दिल्ली के दरबार में, नदिया माँगे नीर॥

लिये होंठ सूखे, समय पूछे यही सवाल।
किधर गया, कल था यहाँ पानी वाला ताल॥

ना जाने किस मोड़ पर चेतेगा इंसान।
पानी-पानी हो रही, पानी की पहचान॥

सार्वजनिक नल बंद हैं, प्याऊ हैं लाचार।
लगे हुए हैं हर तरफ, पानी के बाज़ार॥

नदिया अमृत बाँटकर, खुद करती विषपान।
पता नहीं किस मोड़ पर दे दे अपनी जान॥

किस विकास के खुल गए, यारों आज किवाड़।
डरे-डरे हतप्रभ खड़े, जंगल, नदी, पहाड़॥

किस विकास की दौड़ में, रहा न कुछ भी याद।
जीव-जन्तु, जंगल सभी, पानी के अनुवाद॥

जीवन एक निबंध-सा, यों पाये विस्तार।
पानी ही प्रस्तावना, पानी उपसंहार॥

हरी-भरी रचना सभी, ठहर, समझ, पढ़, देख।
कितने पानीदार हैं, पानी के आलेख॥

नित पानी का दायरा, हुआ अगर यूँ तंग।
पानी की खातिर न हो, यारो अगली जंग॥

राजन पर उत्तर नहीं, हतप्रभ है बेताल।
कहाँ शहर से गुम हुए, सारे पोखर-ताल ॥

नदिया कहे कराह के, दे ले अब तो घाव।
कभी नाव में है नदी, कभी नदी में नाव॥

नदिया चली पहाड़ से, मन में ले उल्लास।
जब आई मैदान में, पग-पग पसरी प्यास॥

जल ये जल-जलकर कहे, चेत अरे इंसान।
तरसाऊँगा कल तुझे ले मत मेरी जान॥

खोदे गए मकान जब, कुछ नगरों के पास।
हर मकान की नींव में थी पोखर की लाश॥

जल ने मल में डूबकर, दिया मनुज को शाप।
'दुख झेलेंगी पीढ़ियाँ, जल-जल करते जाप॥'

सागर बोला-री नदी ! कैसी थी वो राह ?
नदी सुबकने लग गई, मुँह से निकली आह॥

जल जहरीला हो गया, पी-पीकर तेज़ाब।
ऐ विकास! तू धन्य है, माँगे कौन जवाब॥

जल पहुँचा पाताल में, नभ पर पहुँचे लोग।
काली नदिया बह रही, लेकर अनगिन रोग॥

हम नदिया के तट खड़े, ले आँखों में नीर।
प्यासी नदिया की विवश बाँट रहे तकदीर॥

खेल अनोखे खेलता, दिल्ली का दरबार।
आँखों में पानी नहीं, किससे करें गुहार॥

(आभार : अशोक अंजुम)

Bhishma Kukreti

*******ये देश का सपूतो ********




          कवि- डॉ नरेन्द्र गौनियाल

ये देश का सपूतो,तुम तै प्रणाम करदु.
तुम्हरा खुट्यूं मा बीरो,अपणु मुंड मि धरदु.

देश का खातिर ही,तुमन गवैंयी प्राण.
तुम्हरा त्याग से ही,आजादी हमन जाण.

सूळी पर लट्गी ग्यो,हंशी-ख़ुशी से तुम.
तुम्हरा बलिदान से,आजाद छौ हुयाँ हम.

धन हे लक्ष्मीबाई,धन रे भगत सिंह.
दत्त,शेखर,गुरु तुम,धन रे तू बिस्मिल.

धन-धन हे बोस त्वैकू,धन-धन महात्मा जी.
धन-धन पटेल-नेरु,धन-धन सभी सपूतो.

धन-धन हे देव सुमन,धन-धन भंडारी माधो.
धन-धन तीलू रौतेली,धन चन्द्र सिंह गढ़वाली.

धन-धन पुखर्याळ गीता,धन-धन हे शीशराम.
धन-धन हे थानी नेता,धन गुजडू का सपूतो.

कतगौंन खाई मार,हथ-खुटा भली कै तोडा.
कतगौं कि ह्वैयी कुर्की,घर-बार तौन छोड़ा.

कतगौं कि खुचिली रीती,कतगों कि मांग सूनी.
कतगों तै लगी फांसी,गोल्योंन कतगे भूनी.

चालाक फिरंगियों तै,तुमन खदेड़ी द्याई.
तन-मन अर धन लगैकी,आजादी तुमन द्याई.

आजादी कु इतिहास,ल्वे से तुमन लिख्योंऊ.
अजर-अमर ही रालो,तुम्हरो यु त्याग बीरो.

        डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित.. narendragauniyal@gmail.com



Bhishma Kukreti

गढ़वाली कविता--सरकरि पैसा भुस्स
        कवि - डॉ नरेन्द्र गौनियाल

इलाका मा
विकास योजना
हर मद मा
लाखों-करोड़ों रूप्या
बाटों मा
माटु छलकाओ
सीमेंट-गारा लपोड़ो 
कखिम
यात्री शेड
कखिम
टंकी
कखिम
पंचैतघर
कखिम
मूत्रालय
कखिम 
कुछ
कखिम
कुछ बि ना
कागजों मा
सब कुछ
काम-काज
कुछ हो नि हो
नेताजी कि
गाड़ी ऐ जांद
तिमंजिला कूड़ी
बणी जांद
गौं का लोग
दारू पेकि खुश
सरकारी पैसा भुस्स.

       डॉ नरेन्द्र गौनियाल..सर्वाधिकार सुरक्षित . narendragauniyal@gmail.com

Bhishma Kukreti

ढ़वाली कविता--सरकरि रूप्या बुसे जन्दिन
        कवि- डॉ नरेन्द्र गौनियाल

सरकरि योजना
हर गौं मा
सड़क पौंछाण
बड़ी इस्कीम
बड़ो विभाग
बड़ो बजट

इन्जीनेर का बदल
चपड़सि
सर्वे कैरि दींद
सड़क तै
उकाळ -उन्दार
भ्यटा-पाखों
जख मर्जी
धैरि दींद

सियूँ विभाग
कंट्री ठेकेदार
सुद्दी माटु छल्कैकि
स्याल़ा कि सि कूडि
बणे दींद
मकड़ा कि सि मुतीं
हळकि बरखा बि
सड़क तै
बोगाई दींद
योजना फेल
गौं का लोग
खिसये जन्दिन
सरकरि रूप्या
बुसे जन्दिन. 

     डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित.