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Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 05, 2010, 11:24:22 PM

धनेश कोठारी

हाइकू

दूध्याळूं थैं दूद नि
अर गणेश-
गंडेळ होणान्


भग्यान
खै नि जाणनान्
अभागी ब्वन्नु
मैं बि भग्यान होंदू

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

हाइकू

1
बोगठ्या
काळू हो चा गोरु
दोष नि मिटण
त् क्य फैदू

2
पळ्नथरा
ढुंगौं पर बि पळ्येक
खुंडा होणान्
विचार

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

सांसू त् भ्वोर

बिसगणि बिसैकि सै
उकळी जैलि उकाळ
एक न एक दिन
सांसू त् भ्वोर

जाग मा च मयेड़
बैठीं देळी मा अब्बि तलक
बर्सूं बाद- सै
पछणे जैलि धार मा ई
सांसू त् भ्वोर

धारा मंगरा पगळी जाला
डांडा कांठा मौळी जाला
बौडी जाला भाग-
फेर, देर-सबेर
सांसू त् भ्वोर

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी
साभार- पवांण ब्लाग - http://pawaan.blogspot.in/

धनेश कोठारी

बेटियां

कई बार देखा
बेटियों को बेटा बनते हुए
मगर, बेटे
हर बार बेटे ही बने देखे

इसलिए
जोर देकर कहूंगा
बेटियां तो 'बेटियां' ही होती हैं
बेटा बन गए, तो
क्या  मालूम
फिर पीछे मुड़कर देखें न देखें....।

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

मैं, इंतजार में हूं

मैं, समझ गया हूं
तुम भी, समझ चुके हो शायद
मगर, एक तीसरा आदमी है
जो, चौथे और पांचवे के-
बहकावे में आ गया है
खुली आंखों से भी
नहीं देखना चाहता 'सच'

मैं और तुम विरोधी हैं उसके
कारण, हम नहीं सोचते उसकी तरह
न, वह हमारी तरह सोचता है
रिक्त  शब्दर भरो की तरह
हम खाली 'आकाश' भरें, भी तो कैसे
सवाल कैनवास को रंगना भर भी नहीं
पुराने चित्र पर जमीं धूल की परतें
खुरचेंगे, तो तस्वीर के भद्दा होने का डर है

मैं, इंतजार में हूं
एक दिन हिनहिनाएगा जरुर
और धूल उतर जाएगी उसकी
काश...
हमारा इंतजार जल्दी खत्मे हो जाए
रात गहराने से पहले ही......

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

मूर्ति बहने का राष्ट्रीय शोक
ऋषिकेश में एक मूर्ति बही तो देश का पूरा मीडिया ने आसमान सर पर उठा लिया। खासकर तब जब वह न तो ऐतिहासिक थी, न पौराणिक। 2010 में भी मूर्ति ऐसे ही बही थी। जबकि राज्यर के अन्य  हिस्सों में हजारों जिंदगियां दफन हो चुकी हैं। तब भी मीडिया के लिए मूर्ति का बहना बड़ी खबर बनी हुई है। मजेदार बात कि यह क्लिप मीडिया को बिना प्रयास के ही मिल गए। आखिर कैसे.. जबकि ऋषिकेश में राष्ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि कार्यरत नहीं है। एक स्थानीय मीडियाकर्मी की मानें तो यह सब मैनेजिंग मूर्ति के स्था‍पनाकारों की ओर से ही हुई।
अब सवाल यह कि एक कृत्रिम मूर्ति के बहने मात्र की घटना को राष्ट्रीय आपदा बनाने के पीछे की सोच क्या है। इसके लाभ क्या हो सकते हैं.. कौन और कब पहचाना जाएगा, या कब कोई सच को सामने लाने की हिकमत जुटाएगा। क्या  मीडिया की भांड परंपरा में यह संभव है।
किसी के पास यदि इसी स्थान की करीब डेढ़ दशक पुराना फोटोग्राफ्स हो तो काफी कुछ समझ आ जाएगा कि क्या गंगा इतनी रुष्ट हुई या उसे अतिक्रमण ने मजबूर कर दिया। अब एकबार फिर गंगा और मूर्ति के नाम पर आंसू बहेंगे, और कुछ समय बाद कोई राजनेता, सेलिब्रेटी तीसरी बार नई मूर्ति की स्थापना को पहुंचेगा। और आयोजित समारोह में निर्मल गंगा और पर्यावरण संरक्षण की लफ्फाजियां सामने आएंगी। जिसे स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया एक बड़ी कवायद और उपलब्धि के रूप में प्रचारित करेगा।
धन्यो हो ऐसे महानतम मीडिया का.....

धनेश कोठारी

पहाड़ों पर कौन बांधेगा 'पलायन' और 'विस्थासपन' को...
अब तक या कहें आगे भी पलायन पहाड़ की बड़ी चिंता में शामिल रहा, और रहेगा। मगर अब एक और चिंता 'विस्था पन' के रुप में सामने आ रही है। पहाड़ के जर्रा-जर्रा दरकने लगा है। गांवों की जिंदगी असुरक्षित हो गई है। सदियों से पहाड़ में भेळ्-पखाण, उंदार-उकाळ, घाम-पाणि, बसगाळ-ह्यूंद, सेरा-उखड़ से सामंजस्या बिठाकर चलने वाला पहाड़ी भी थर्र-थर्र कांप रहा है। नित नई त्रासदियों ने उसे इतना भयभीत कर दिया है कि अब तक रोजी-रोटी के बहाने से पलायन करने की उसकी मजबूरी के शब्दनकोश में 'विस्थायपन' नामक शब्दक भी जुड़ गया है।
मजेदार बात कि कथित विकास की सड़कें भी उसके काम नहीं आ रही हैं, बल्कि भूस्खकलन के रुप में मौत की खाई पैदा कर रही हैं। अब तक उसने कुछ अपने ही रुजगार के लिए बाहर भेजे थे। लेकिन अब वह खुद भी यहां से विस्थांपित हो जाना चाहता है। निश्चित ही उसकी चिंताओं को नकारना मुश्किल है। क्योंाकि जीवन को सुखद तरीके से जीने का उसका मौलिक हक है। जिसे अब तक किसी न किसी बहाने से छीना जाता रहा है। अब जब पहाड़ ही ढहने लगे हैं, और उसकी जान लेने पर आमादा हैं, तो हम भी कैसे कह सकते हैं कि नहीं 'तुम पहाड़ी हो, हिम्मकत वाले हो, साहस और वीरता तुम्‍हारी रगों में समाई है' मौत से मुकाबला करने के लिए यहीं रहो, मारबांदी रहो।
ऐसे में यदि विकास की सड़कें उसे दूर परदेस ले जाना चाहती हैं, तो ले जाने दो। किंतु, प्रश्नह यह भी कि यदि पहले 'पलायन' और अब उसकी चाह के अनुरुप 'विस्था पन' से आखिर पहाड़ तो खाली हो जाएंगे। एक सभ्येता, संस्कृति, परंपरा, पहचान, जीजिविषा पलती, फलती, बढ़ती थी, उसे कौन पोषित करेगा। क्योंचकि भूगोल में बदलाव कहीं न कहीं हमारे बीच एक अलग तरह का दूराव पैदा कर देता है।
.... और इससे भी बड़ी चिंता कि यदि पहाड़ खाली हो गए तो देश की इस सरहद पर दूसरी रक्षापंक्ति को कौन संभालेगा। सेना तो मोर्चे पर ही दुश्मशनों को पछाड़ सकती है। कोई उसके हौसले के लिए भी तो चाहिए। क्यात पलायन और विस्था पन के बाद हम देशभक्ति की अपनी 'प्रसिद्धि' को कायम रख सकेंगे।
मेरी चिंता पहाड़ को लगे ऐसे अभिशाप से ही जुड़ी है, जो फिलहाल समाधान तो नहीं तलाश पा रही, लेकिन 'डर' जरुर पैदा कर रही है। खासकर तब अधिक, जब बांधों के निर्माण के दौरान मजबूरी में विस्थानपित हुए लोगों की तरह अब हर तरफ विस्थाअपन की आवाजें उठने लगी हैं। जोकि जीवन की सुरक्षा के लिहाज से कतई गलत भी नहीं, मगर चिंताएं इससे आगे की भी तो हैं, उनका समाधान कौन निकालेगा।
इसलिए क्योंे न कोई ऐसा रास्‍ता बने, विकास के साथ पहाड़ों में जीवन को सुरक्षा की भी गारंटी दे, बाहर से आने वाले सैलानियों को नहीं तो कम से कम हम पहाडि़यों को।
धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

आखिर किस किसको होगा लाभ चटखारेदार खबरों से.....
उत्तराखंड त्रासदी के बाद केदारनाथ पूरी तरह से तबाह हुआ, जहां अगले कई वर्षों तक हालात शायद ही सुधरे। वहीं, जलप्रलय ने चारधाम यात्रा के तमाम रास्तों को भी क्षत विक्षत कर पहाड़ की रोजी रोटी को बरबाद कर डाला। यहां भी सरकारी नाकामियों के कारण कब तक हालात सामान्य हो सकेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन और बात जो पहाड़ के हितों को चोट पर चोट कर रही है, वह मीडिया की अनर्गल रिपोर्टें। जिसकी बदौलत देशभर से लोग पहाड़ का रुख करने से भी हिचक रहे हैं।
बुधवार 21 अगस्त को पहाड़ के अखबारों ने एक और 'छदम भय' फैलाने की कोशिश की है। जिसमें लिखा गया है कि बदरीनाथ मंदिर भी अब खतरे की जद में है। जिन तथ्यों को रिपोर्टों में दर्शाया गया है, उन्हेंर देश और प्रदेशभर के लोग तो शायद मान भी लें, मगर जो लोग वर्षों से बदरीनाथ में रहते आए हैं, जो वहां के भूगोल और प्रकृति से वाकिफ हैं। वह ऐसे मनगढ़ंत खबरों को कतई नहीं मानेंगे। कहा गया है कि मंदिर के दो छोरों पर सिंचाई विभाग द्वारा करीब दो ढाई दशक पहले बनाई गई सुरक्षा दीवारें जो कि मंदिर से लगभग दो से चार सौ मीटर दूर हैं, क्षतिग्रस्तक हो गई हैं, और दोनों छोरों के नालों का पानी रिसकर मंदिर की तरफ मलबे के साथ आ रहा है। दूसरा कि अलकनंदा से तप्तहकुंड के निचले हिस्सेर में भूकटाव से कुंड को खतरा उत्पन्न हो गया है।
इन्हीं बातों को जब आजकल भी वहां रह रहे लोगों से पुष्टि किया गया तो उनका कहना था कि यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। खबरनवीसों की मानें तो यह बात मंदिर समिति द्वारा बताई गई है। सो अब यह समझना होगा कि आखिर मंदिर समिति को ऐसी मनगढंत खबर फैलाकर क्या लाभ हो सकता है, और खुद को पहाड़ का प्रतिनिधि जतलाने वाला मीडिया क्यों इसमे नमक मिर्च लगाकर परोस रहा है। क्यों नहीं वह वहां के भूगोल का अध्ययन कर लेता, या वहां रहने वाले लोगों से तथ्यों की पुष्टि कर लेता है। क्या यह उसकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है।
इससे पहले भी कुछ दिनों पूर्व इसी मीडिया द्वारा एक सेटेलाइट चित्र की आड में बदरीनाथ के समीप अलकनंदा में झील बनने का दुष्प्रचार किया गया था। जिस पर खुद उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा।
बताते चलें कि जिस तरह मंदिर के करीब पानी और मलबा आने की बात कही जा रही है, यह कोई नई बात नहीं है। वर्षों से बरसात के दिनों में बदरीनाथ के परिक्षेत्र में हजारों जलस्रोत फूटते हैं। इंद्रधारा और नारायणी नाले में वेग से मलबा आता रहा है। मगर कभी इससे मंदिर या यहां बसी आबादी को खतरा नहीं हुआ। कारण, जहां सिंचाई विभाग की सुरक्षा दीवारें इन्हें डायवर्ट करती हैं, वहीं मंदिर के पृष्टभाग में बने एंटी एवलांच पिरामिड पानी और मलबे को चारों ओर परिवर्तित करने में मददगार साबित होते रहे हैं। यहां तक कि शीतकाल में पहाड़ से ग्लेशियर आने की स्थित में भी यह उसे बिखेर देने में सक्षम हैं।
दूसरा तप्तकुंड को भूकटाव से खतरे की बात भी निराधार है, कारण तप्तकुंड किन्हीं सीमेंट ब्लाकों पर नहीं बल्कि हार्ड रॉक पर टिका हुआ है। नदी के छोर पर वराहसिला अलकनंदा की धारा को दूसरी ओर मोड़ रही है। यहां तक कि कुंड के ठीक सामने करीब 25 फुट लंबा एक कमरा जो कि कपड़े बदलने के लिए बनाया गया है, वह भी सख्त  चट्टान पर मौजूद है। रही बात सीमेंट ब्लाक के ढहने की तो यह आज नहीं बल्कि एक दशक के पहले से ही नदी की तरफ लुढ़के नजर आते हैं, जो कुंड के नीचे नहीं बल्कि काफी दूरी पर हैं।
ऐसे में समझ नहीं आ रहा है कि आखिर इन चटखारे दार खबरों के जरिए मीडिया कौन सा उल्लू सीधा करना चाहता है। और जो सरकारी प्रतिष्ठान उन्हें ऐसा कच्चा रॉ मै‍टरियल उपलब्ध करा रहे हैं, उनका इसमें कौन सा हित छुपा हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि केंद्र से आए धन की बंदरबांट में हिस्सें के लिए ऐसी कोशिशें हो रही हैं, या कि सरकारों को उनकी नाकामियां दिखाकर दबाव में लेने के प्रयास किए जा रहे हैं।
खैर, जो भी हो। लेकिन यह सब पहाड़ के हितों के लिहाज से बिलकुल भी सही नहीं है। आने वाले दौर में इसके गंभीर परिणामों के लिए पहाड़ के उन लोगों का भी खामियाजा भुगतना तय है, जो आज किसी न किसी वजह से चुप्पी साधे बैठे हैं।

धनेश कोठारी

उत्तराखण्ड बणौंण हमुन्

अब कैकू नि रोण हमुन
उत्तराखण्ड बणौंण हमुन

उजाड़ कुड़ि पुंगड़्यों तैं
उदास अळ्सी मुखड़्यों तैं
फूल अरोंगि पंखड़्यों तैं
पित्तुन पकीं ज्युकड़्यों तैं
अब कै धै नि लगौण हमुन

रगदा बगदा पाणि तैं
सैंति समाळी जवानि तैं
खर्री खोटी चवानि तैं
बेकार बैठीं ज्वानि तैं
सुदि मुदी नि गवौंण हमुन

कागजुं मा भोर्यां विकास तैं
झूठी सौं अर आस तैं
खणकि जल्मदा विश्वास तैं
बथौं मा छोड़ीं श्वास तैं
धोरा धरम नि लौंण हमुन

पंच पर्याग बदरी केदार तैं
गंगा जमुना कि धार तैं
पंवड़ा जैंति जागर तैं
थौळ् कौथिग त्योहार तैं
द्यो द्यब्तौं जगौंण हमुन

माधो चंदर गबर तैं
सुमन सकलानी वीर तैं
दादा दौलत भरदारी तैं
तीलू रामी सी नारी तैं
अफ्वु मा इना ख्वज्यौण हमुन

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

धनेश कोठारी

कागजि विकास

घाम लग्युं च कागजि डांडों
काडों कि च फसल उगिं
आंकड़ों का बांगा आखरुं मा
उखड़ कि भूमि सेरा बणिं
घाम लग्युं च.............

ढांग मा ढुंग ढुंग मा ढांग
माटा भिड़ौन गाड़ रोक्युं
बार बग्त आंदा भ्वींचळों
पर च, अब बाघ लग्युं
आदत प्वड़िगे हम सौंणै
अर ऊं धन्नै कि डाम
औंसी रात बिचारी गाणिं
खणकि जोनी का सारा लगिं
घाम लग्युं च.............

धारा पंदेरा छोया सुख्यां
रौला-बौला बगणा छन
स्वर्ग दिदा हड़ताल परै च
खणकि रोपण लगणा छन
दिन गगड़ांद द्योरु रोज
बिजली कड़कदी धार मा
हौड़ बिनैगे भटका भटकी मा
आयोडैक्स कु ख्याल ही नि
घाम लग्युं च.............

झुनकौं उंद छन झिलारी बासणी
ल्वत्गी लफारी गळ्बट गिच्च
मुसा का छन पराण जाणा
बिराळा कु तैं ख्याल च सच्च
दौंळ् बोटण कु सेळु नि
घणमण घंडुलि अछणा धरिं
फौंर्याई मन भैलू लेकि
अंधेरा कु तैं शरम ही नि
घाम लग्युं च.............

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari