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Articles by Writer, Lyrist & Uttarakhand State Activitvist Dhanesh Kohari

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 05, 2010, 11:24:22 PM

धनेश कोठारी

सौदेर

माया का सौदेर छां हम
इन्कलाब जिन्दाबाद
बैर्यों बग्तौ चेति जावा
निथर होण मुर्दाबाद

कथगै अंधेरू होलु
हम उज्याळु कैद्योंला
भाना कि बिंदुलि मा
गैणौं तैं सजै द्योंला
हम सणि अळ्झाण कु
कत्तै करा न घेरबाड़

हत्तकड़ी मा जकड़ि पकड़ी
जेल भेजा चा डरा
बणिगेन हथगुळी मुट्ट
इंतजार अब जरा
लांकि मा च प्रण प्रण
लौटा छोड़ा हमरी धद्द

क्रांतिकारी भौंण गुंजणी
हिमाला कु सजायुं ताज
मौळ्यार कि टक्क धरिं च
घाम बि जग्वाळ् आज
हम सणिं बिराण कु
जम्मै न कर्यान् उछ्याद

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari



धनेश कोठारी

लोकल 'पप्पू' भी सांसत में

वर्षों से कोई 'पप्पू' पुकारता रहा, तो बुरा नहीं लगा। मगर अब उन्हीं लोगों को 'पप्पू' का अखरना, समझ नहीं आ रहा। भई क्या हुआ कि 'पप्पू' अभी तक फेल हो रहा है। यह कुंभ का मेला तो है नहीं कि बारह साल में एक बार आएगा। हर साल कहीं न कहीं यह परीक्षा (विधानसभा, पंचायत, निकाय चुनाव) तो होगी ही, तब राष्ट्रीय न सही लोकल 'पप्पू' तो पास हो जाएगा। रही बात हाल में 'पप्पू' के पास न होने की, तो इससे मैं भी आहत हूं। एक राष्ट्रीय पप्पू ने लोकल पप्पूओं की वाट जो लगा दी है। अब देखो, सब हर फील्ड में पप्पू होने का मतलब नाकामी से जोड़ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड वाले भी सोच रहे हैं कि 'पप्पू' को फेल का पर्यायवाची बना दिया जाए। देश में अब मां-दे लाडलों को भी दुत्कार में 'पप्पू' नहीं कहा जा रहा। मांएं भी जाने क्यूं इस नाम से खौफजदा हैं। शायद उन्हें भी लग रहा है, कि कहीं प्यार-दुलार के चक्कर में बेटे की नियति भी 'पप्पू' न हो जाए।
'बाजार' हर साल कैडबरी बेचते हुए इसी उम्मीद में जीता है, आस लगाए रहता है कि 'पप्पू' पास होगा, तो मुहं मीठा जरूर कराएगा, और वह भी निश्चित ही कैडबरी से.। एड में अपने बड़े एबीसीडी भी तो हमेशा पप्पू के पास होने का भरोसा देते हैं। दें भी क्यों न, इस बहाने से उनका भी तो कुछ न कुछ जेब खर्च जो निकलना है। एड एजेंसी से लेकर चैनल तक सबकी दाल रोटी चलेगी। मगर, अफसोस अपने 'पप्पू' को पास होने में शर्म आ रही है। कह रहा है कि अभी 'आप-से' सीखना है।
कहते हैं कि उम्र ए दराज मांग कर लाए थे चार दिन, दो आरजू में कट गए दो इंतजार में। कहीं सीखने पर ऐसा ही हलंत न लग जाए, कि आरजू और इंतजार सीखने में ही गुजर जाएं। दूसरा अब इन मत- दाताओं को कोसूं नहीं तो क्या करुं, जिनका दिल पत्थर हो गया है। 128 साल का इतिहास भी नजर नहीं आ रहा उन्हें। अब तो मेरे दर्द का दिल दरिया भी थम नहीं रहा। 'पप्पू' के पास होने के लिए की गई मेरी सब दुआएं, मंदिरों में टेका मत्था, घोषणापत्रों की तरह भगवान को दिया गया प्रलोभन भी बेकार हो रहा है।
..और रही सही कसर अपना वॉलीवुड भी बार-बार तानें मारकर पूरी कर रहा है, कि 'पप्पू कान्ट डांस साला..'। कभी नहीं सोचा था कि 'पप्पू' इतना निकम्मा निकलेगा। यही सब सुनना बाकी रह गया था हमारे लिए। हमने फेल होना सहा, मगर वह तो 'डांस' में भी अनाड़ी निकला। चुनावों में अनुत्तीर्ण होना तो उसका शगल बन गया। बाप-दादा की 'टोपी' की भी फिक्र नहीं। जबकि दूसरे टोपी पहनकर उछल रहे हैं।
भई अपुन तो सफाई दे देकर उकता गया, आलोचकों के तानों से कहते हैं, नया रास्ता निकलता है। मगर क्रिटिक्स हमरी बॉडी में यही बाण मार रहे कि काहे इतना 'पप्पू' हुए जा रहे हो। क्या बताऊं उन्हें कि 'पप्पू' के पासिंग- आउट का कोई 'विश्वास' करे न करे, मुझे तो है। हां, ये मत पूछना कि किस पप्पू से उम्मीद है, राष्ट्रीय, बाजार वाले या लोकल, क्योंकि सुबह पड़ोसी 'मलंग बाबू' गुरुमंत्र दे गए, कि 'आप' और 'नमो' मंत्र का जाप करो। 'पप्पू' न सही तुम जरूर पास हो जाओगे। अब करूं क्या, कैसे अपने 'पप्पूपन' को तिलांजली दूं। आपको मालूम हो तो बताएं..।
धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

बसंत

लो फिर आ गया बसंत
अपनी मुखड़ी में मौल्यालर लेकर
चाहता था मैं भी
अन्वा र बदले मेरी

मेरे ढहते पाखों में
जम जाएं कुछ पेड़
पलायन पर कस दे
अपनी जड़ों की अंग्वा ळ

बुढ़ी झूर्रियों से छंट जाए उदासी
दूर धार तक कहीं न दिखे
बादल फटने के बाद का मंजर

मगर
बसंत को मेरी आशाओं से क्या
उसे तो आना है
कुछ प्रेमियों की खातिर
दो- चार फूल देकर
सराहना पाने के लिए

इसलिए मत आओ बसंत
मैं तो उदास हूं

धनेश कोठारी
कापीराइट सुरक्षित @2013


धनेश कोठारी

कन्फ्यूजिंग प्रश्नों पर चाहूं रायशुमारी
अपने भविष्य को लेकर आजकल बड़ा कन्फ्यूजिया गया हूं। निर्धारण नहीं कर पा रहा हूं, कौन सा मुखौटा लगाऊं। आम- आदमी ही बना रहूं, या आम और आदमी के फेविकोल जोड़ से 'खास' हो जाऊं। अतीत के कई वाकये मुझे पसोपेस में डाले हुए हैं। कुछ महीने पहले मेरी गली का पुराना 'चिंदी चोर' उर्फ 'छुटभैया' धंधे को सिक्योर करने की खातिर 'खास' बनना, दिखना और हो जाना चाहता था। एक ही सपना था उसका, कि बाय इलेक्शन या सेलेक्शन वह किसी भी सदन तक पहुंच जाए। फिर बतर्ज एजूकेशनल टूर हर महीने 'बैंकाक' जैसे स्वर्गों की यात्रा कर आए। मगर, कल जब वह नुक्कड़ पर 'सुट्टा' मारते मिला, तो बोला- दाज्यू अब तुम बताओ यह 'आम आदमी' बनना कैसा रहेगा? मैं हतप्रभ। देखा उसे, तो उसमें साधारण आदमी से ज्यादा 'आप' वाला 'आदमी' बनने की ललक दिखी, सो कन्फ्यूजिया गया। इसलिए उसे जवाब देने की बजाए मैं 'मन-मोहन' हो गया।
फिर सोचा क्यों न आपके साथ ही चैनलों की 'डिबेट' टाइप बकैती की जाए। बैठो, बात करते हैं, हम- तुम, इन कन्फ्यूजियाते प्रश्नों पर। आपसे रायशुमारी अहम है मेरे लिए। तब भी फलित न निकला तो एसएमएस, एफबी, ट्वीटर का ऑप्शन खुला है। जरुरी लगा तो प्रीपोल, पोस्टपोल, एग्जिट पोल भी संभव। रुको, बकैती से पहले बता दूं। गए साल प्रवचन में 'बापू' कहते थे, प्रभु की शरण में आम और खास सब बराबर हैं। मगर, बड़ी बात है (आम) आदमी बनना। उससे पहले सुना था, 'भैंस' लाठी वाले की होती है। फिर सुना, देखा कि हर पांच साल में खास (नेता) लोग दशकों से मूरख बनते आम आदमी को 'खास' कहते, बताते हैं। उसके भूत और भविष्य उनकी चिंता की कड़ाही में उबलते हैं। नौबत पादुकाएं उठाने की आएं, तो उसे सिर माथे लगाने से हिचकते नहीं।
अब देखो, अरविंद ने बड़ी नौकरी छोड़ी, आम आदमी बनें, तो सीधे सीएम बन गए। उन्हीं के नक्शेकदम कई और 'खास' भी अपने 'ओहदों' को त्यागकर 'आम- आदमी' बनने के लिए धरती पकड़ होने लगे हैं। आशुतोष भैया तो मलाई छोड़ चटाई पर आ भी गए। सो बंधु कन्फ्यूज बहुत है। समझना मुश्किल हो रहा है कि मेरे कन्फ्यूजन को दूर कौन करेगा, केजू, राहुल या नमो। केजू कथा का मूल पात्र तो आदमी पर 'आम' का प्रत्यय लगाना नहीं भूलता। इसी फार्मूले से खुद को भी आदमी से पहले 'आम' बताता है। दामादजी की तरह 'बनाना पीपुल्स' नहीं कहता। वहीं राहुल बाबा तो वर्षों से झोपड़ी यात्राओं से बताते रहे हैं कि खास होते हुए भी उन्हें 'सुदामा' के पास बैठना, उठना, लेटना अच्छा लगता है। वही आम आदमी जिनके लिए कभी 'दादी' ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था।
इधर देसी मीडिया ने अपने नरेंद्र भाई को शॉर्टनेम 'नमो' क्या दिया, कि हर कोई 'शनिदोष निवारण' शैली में 'जाप' करना नहीं भुल रहा। आखिर चायवाले का 'खास' होना, और फिर कारपोरेटी रैलियों को जुगाड़ कर वापस चायवालों (आम) तक पहुंचना भी तो बड़ी बात है। वेटिंग को कन्फर्म करने के लिए इशारों में बतियाए रहे हैं- उन्हें 60 साल दिए, मुझे 60 महीने दे दो। भुज से लेकर चतुर्भुज तक 350 की स्पीड वाली बुलेट शंटिंग कर दूंगा। सो भांति-भांति के मुखौटों को देख मैं कन्फ्यूज हूं। यदि मैं किन्नर नरेश (खास) बन गया, तो कितने दिनों का टिकाऊ समर्थन मांगना पड़ेगा। अभी तक तो दे दनादन कांग्रेसी घुड़की मिल रही है। तभी 'संजय' की उधार दृष्टि से मैंने इलाहबाद को निहारा। जहां संभवतः नमो और आशुतोष युद्धम् शरणम् गच्छामि। ऐसे में मेरे जैसे निठल्ले चिंतित हैं, कि इनके रहते अपने दशहरी, लंगड़े का क्या होगा। सो मैं कौन सा मुखौटा लगाऊं, है कोई सॉल्यूशन आपके पास।
धनेश कोठारी

धनेश कोठारी

सर्ग दिदा

सर्ग दिदा पाणि पाणि
हमरि विपदा तिन क्य जाणि

रात रड़िन्‌डांडा-कांठा
दिन बौगिन्‌हमरि गाणि

उंदार दनकि आज-भोळ
उकाळ खुणि खैंचाताणि

बांजा पुंगड़ौं खौड़ कत्यार
सेरौं मा टर्कदीन्‌स्याणि

झोंतू जुपलु त्वे ठड्योणा
तेरा ध्यान मा त्‌राजा राणि

Copyright@ Dhanesh Kothari

धनेश कोठारी

लंपट युग में आप और हम
बड़ा मुश्किल होता है खुद को समझाना, साझा होना और साथ चलना। इसीलिए कि 'युग' जो कि हमारे 'चेहरे' के कल आज और कल को परिभाषित करता है। अब आहिस्ता -आहिस्ता  उसके लंपट हो जाने से डर लगता है। मंजिलें तय भी होती हैं, मगर नहीं सुझता कि प्रतिफल क्याग होगा। जिसे देखो वही आगे निकलने की होड़ में लंपट होने को उतावला हो रहा है। हम मानें या नहीं, मगर बहुत से लोग मानते हैं, बल्कि दावा भी करते हैं, कि खुद इस रास्तेा पर नहीं गए तो तय मानों बिसरा दिए जाओगे। दो टूक कहते भी हैं कि अब भोलापन कहीं काम नहीं आता, न विचार और न ही सरोकार अब 'वजूद' रखते हैं। काम आता है, तो बस लंपट हो जाना। इसीलिए सामने वाला लंपटीकरण से ही प्रभावित है।
लंपटीकरण आज के दौर में बाजार की जरुरत भी लगती है। सब कुछ बाजार से ही संयोजित है। सो बगैर बाजारु अभिरचना में समाहित हुए बिना कौन पहचानेगा, कैसे तन के खड़े होने लायक रह पाओगे। यह न समझें कि यह अकेली चिंता है। कह न पाएं, लेकिन है बहुतों की। हाल में एक जुमला अक्सहर सुनने को मिलता है, अपनी बनाने के लिए धूर्तता के लिए धूर्त दिखना जरुरी नहीं, बल्कि सीधा दिखकर धूर्त होना जरुरी है। सीधे सपाट चेहरे हंसी लपेट हुए मासूम नजर आते हैं। लेकिन पारखी उनकी हंसी के पेंच-ओ-खम को ताड़ लेते हैं। अबके यही मासूम (धूर्त) लंपटीकरण की राह पर नीले रंग में नहाए हुए लग रहे हैं, और हमारा, आपका मन, दिल उन्हें  'तमगा' देने को उतावला हुए जा रहा है। बर्तज भेड़ हम उस लंपटीकरण की आभा के मुरीद हो रहे हैं।
अब यह न मान लें, कि लंपट हो जाना किसी एक को ही सुहा रहा है। यहां भी हमाम में सब नंगे हैं, कि कहावत चरितार्थ हो रही है। मानों साबित करने की प्रतिस्पीर्धा हो। नहीं जीते (यानि लंपट नहीं हुए) तो पिछड़ जाएंगे। मेरा भी मन कई बार लंपट हो जाने को बेचैन हुआ। तभी कोई फुस्स  फुसाया कि तुम में अभी यह क्वानलिटी डेवलप नहीं हुई है। आश्चकर्यचकित.. अच्छाf तो लंपट होने के लिए किसी बैचलर डिग्री की जरुरत है। बताया कि इसकी पहली शर्त है, लकीर पीटना बंद करो। सिद्धांतों का जमाल घोटा पीना पिलाना छोड़ दो। गांधी की तरह गाल आगे बढ़ाने का चलन भी ओल्डा फैशन हो चला है। दिन को रात, रात को दिन बनाने अर्थात जतलाने और मनवाने का हुनर सीखो। जो तुम्हें  सीधा सच्च  कहे, खिंचके तमाच मार डालो। समझ जाएगा, मुंडा बिगड़ गया। बस.. दिल खुश्‍ होकर बोल उठा, व्हा।ट ऐन आ‍इडिया सर जी।

धनेश कोठारी

मैं हंसी नहीं बेचता

जी हां
मैं हंसी नहीं बेचता
न हंसा पाता हूं किसी को
क्योंकि मुझे कई बार
हंसने की बजाए रोना आता है

हंसने हंसाने के लिए
जब भी प्रयत्न करता हूं,
हमेशा गंभीर हो जाता हूं
इसी चेतना के कारण
हंसी, हमेशा रुला देती है

हास्य का हर एक किरदार
मेरे शब्दों में उलझकर
हंसाने की बजाए,
चिंतन पर ठहर जाता है

सामने सिसकते घाव
मुझे आह्लादित नहीं करते
फिर, कैसे शब्दों के जरिए
हंसाऊं किसी को 
कैसे बेचूं मंचों पर हंसी
नहीं आता, यह शगल
इसलिए
मैं नहीं बेचता हंसी ।।

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