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Footage Of Disappearing Culture - उत्तराखंड के गायब होती संस्कृति के चिहन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 17, 2007, 03:35:52 PM

Devbhoomi,Uttarakhand

उत्तराखंड गाँवों का प्रदेश है,और यहाँ गांव के सयाने बुजुर्ग का सब लोक सम्मान करते थे।देवता के रूप में पूजते थे। इससे लगता है कि उत्तराखण्ड का प्राचीन समाज कितना संवेदनशील था। समय बदला लोकगाथा गाने वाला गायक गायन के लिए पैसे मांगने लगा। गाँव का सयाना आदमी जिसे लोग देवता की तरह मानते थे वह भी डंगरिया के रूप में पारम्परिक बन गया। कुछ डंगरिये तो शराब भी पीने लगे।

कहने का तात्पर्य था परम्परा अच्छी थी, किन्तु उसका रूप बिगड़ गया। उत्तरांचल के ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग दुःख, बीमारी आदि की स्थिति में अपने घर पर जागर लगवाकर अपने इष्ट से मनौती मांगते है। घर के आंगन में घूनी जलाई जाती है।

लोक गायक के रूप में ढोल बजाने वाले को मजदूरी देकर बुलाया जाता है। ढोल बजाने वाले को 'औजी' कहा जाता है। गांव में ही देवता का प्रतीक कोई आदमी होता है, उसे डंगरिया कहा जाता है। औजी (ओझा) जब ढोल बजाता है। डंगरिये के शरीर में कम्पन होता है। वह जो भी बोलता है, उसे देवता का बोल माना जाता है।

अपनी श्रद्धा व परम्परा के अनुसार लोग देवी, पाण्डवों, कत्येर, गोलू, हरज्यू, सैम, नृसिंह, भोलनाथ, गंगनाथ आदि देवी-देवताओं को जागर लगाकर उनसे अपने दुःख निवारण की प्रार्थना करते है। उत्तराखण्ड के गांवों में अभी भी काफी लोग इस परम्परा पर विश्वास करते हैं। कई क्षेत्रों के लोगों का विश्वास है कि बलि देने पर देवता प्रसन्न होते हैं तथा मन की मुराद पूरी करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रेतात्मा व मृत आत्माओं के पूजन की भी परम्परा है। यहां की सामाजिक परम्परा में कृषि कार्य को सामूहिक रूप से करने की परम्परा है। रोपाई तथा गुड़ाई के समय गांव की महिलाएं समूह में एक परिवार के खेत में एक साथ कार्य करती है।

महिलाओं के साथ लोकगायक हुड़के की थाप पर लोकगाथा गाता है। लोकगाथा के बीच में महिलाएं भी बीच-बीच में कार्य करते हुये गाना गाती है। इससे कार्य जल्दी होता है तथा थकावट नहीं आती है। इस परम्परा को हुड़की बौल कहा जाता है।


सुधीर चतुर्वेदी

वक्त की बयार ने पहाड़ के विवाहोत्सवों पर चढ़ाया आधुनिकता का रंग (Jun29/10 from Dainik Jagran)

चम्पावत। वक्त के बदलाव की बयार ने पहाड़ की कला संस्कृति, रहन-सहन, खानपान के साथ ही यहा की परंपराओं, संस्कारों और उत्सवों में भारी तब्दीली ला दी है। पैदा होने से लेकर अंतिम संस्कार के रीतिरिवाजों व अनुष्ठानों में जहां रस्म अदायगी दिख रही है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति का रंग सिर चढ़कर बोलने लगा है। विशेषकर गृहस्थी बसाने के लिए होने वाले विवाहोत्सवों में तो अब डीजे व बार संस्कृति के बेसुरे राग ने यहां की वैवाहिक परंपराओं के पुरातन सुर, लय, ताल को हाशिए में धकेल दिया है।

यथा नाम तथा गुण के अनुरूप देवभूमि में गृहस्थी की गाड़ी चलाने के लिए होने वाले विवाह यहा की संस्कृति के अनुरूप शालीनता, लोक सरोकारों व परस्पर सौहार्दपूर्ण और दिखावे से दूर होते थे। रिश्ता पारिवारिक पृष्ठभूमि नाते रिश्तेदारी जन्मकुंडली और हैसियत के अनुसार तय होता था। दिखावे की संस्कृति पर आज भी कई लोग नाक भौं सिकोड़ते हैं। लेकिन पिछले एक दशक से पहाड़ में शादी पर्व में जबरदस्त तब्दीली आ गई है। अब यह दिखावे और जलसे का रूप लेने लगी है। शुरूआती बदलाव तो पहले होने वाली दो दिवसीय शादी के एकदिनी होने से शुरू हुआ। पहले जहां द्वाराचार, धुलर्ग, गोठक ब्या, सात फेरे व नरनारायण की पूजा के बाद विदाई होती थी। और सायं से पूरी रात तथा दूसरे दिन सुबह तक विधिविधान से वैदिक रीति के तहत अनुष्ठान होते थे। बहू के घर पहुंचने पर देली गोठ्न और पूजा होती थी। लेकिन अब एकदिवसीय कार्यक्रम में यह सब रस्म अदायगी के तौर पर शार्टकट फार्मूले में हो रहा है। पहले पहाड़ में जयमाला नहीं होती थी। कहा जाता है कि दुल्हन गोठ के विवाह में कन्यादान के बाद ही अपने जीवनसाथी यानि दूल्हे को सौंपी जाती है। बकायदा कन्यादान से पूर्व की रस्में दोनों पक्षों के बीच पर्दा डालकर होती थी। अब ऐसा नहीं है। दिन में दो बजे धुलर्ग की रस्म अदायगी के बाद जयमाला होती है और बिना फेरे हुए वर-वधु को आशीर्वाद देने का दौर चल पड़ता है। फिर बारी आती है विवाह और फेरों की। यह सब कार्यक्रम एक दो घंटे में निपटाकर, पानी परखने की रस्म के साथ दुल्हन को विदा कर दिया जाता है। फेरों के समय ध्रुव तारे को अब दिन में ही दिखा दिया जाता है। वैवाहिक रस्मों में तो बदलाव आया ही है। इस अवसर पर बजने वाले वाद्ययंत्र भी अब हाशिए पर हैं। ढोल, दमाऊ, मशकबीन और छोलिया नृतकों की जगह अब बैंड बाजे, पंजाबी ढोल व डीजे ने ले ली है। देर रात तक कानफोड़ू शोर लोगों की नींद उड़ा रहे हैं। इस मौके पर आयोजित होने वाले भोज की परंपरा भी बदली है। पंडितों द्वारा बनाई गई रसोई और लौरों की जगह स्टैंडिंग सिस्टम के साथ ही यहां की परंपरागत डिसें गायब हो गई हैं। तेल, मसालों व वसायुक्त खाना परोसना शान समझा जाने लगा है। कहीं कहीं तो अब मांसाहार से भी परहेज नहीं रहा। बहरहाल पहाड़ के वैवाहिक रस्मों में आ रहा बदलाव हमारी संस्कृति व पहचान को लीलने लगा है।

Rajen

बिलकुल सत्य कहा है सर आपने.  अपने आप को आधुनिक दिखाने की दौड़ में हम अपनी संस्कृति को अपने ही पैरों के तले रोंद रहे हैं.  बैदिक काल से चली आ रही हमारी संस्कृति और रीति रिवाज जितने प्रभावशाली हैं उतनी ही खोखली है ये आधुनिकता जो अंततः हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. 

Devbhoomi,Uttarakhand

फाटा में हुई सांस्कृतिक कला संस्थान की स्थापना
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फाटा(रुद्रप्रयाग), निज प्रतिनिधि : हिमालय की सनातन एवं पौराणिक संस्कृति के उत्थान के लिए फाटा में श्री हिमालयन संस्कृति एवं सांस्कृतिक कला संस्थान की स्थापना की गई जिसमें विलुप्त होती जा रही पौराणिक संस्कृति के संरक्षण पर भी जोर दिया गया।

संस्थान के उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि गढ़वाल विश्व विद्यालय के प्रो. ललन सिंह ने कहा कि हिमालय से लुप्त होती जा रही संस्कृति को पुर्नजीवित करने का प्रयास किया जाना अति आवश्यक है। उन्होंने हिमालयन संस्थान की इस पहल की सराहना भी की। हिमालयन संस्कृति एवं कला संस्थान के प्रबंधक धर्मानंद जमलोकी ने कहा कि आज विज्ञान के इस युग में हिमालय के साथ अनेक प्रयोग व परीक्षण किए जा रहे हैं जो उचित नही हैं। हम सभी को मिल कर हिमालय की रक्षा एवं उसकी संस्कृति एवं संरक्षण के लिए प्रयास करने चाहिए। विशिष्ट अतिथि राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित राइंका गुप्तकाशी के प्रधानाचार्य केएस राणा ने कहा कि कला संस्थान द्वारा हिमालय की संस्कृति उत्थान के जो प्रयास किया है वह सराहनीय कदम है। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से हिमालयी संस्कृति को जीवंत रखा जा सकता है। इस अवसर पर विश्व कल्याण के लिए अखंड रामायण का भी पाठ भी किया जा रहा है।

http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttranchal/4_5_6823983.html


kundan singh kulyal

मदत
मदत (सहायता) मदत करना हमारे पहाड़ों की संस्कृति का एक अहम् हिस्सा था जो आज ये गायब हो चुकी हैं सिर्फ मदत के नाम पर गाँव मैं किसी का लेंटर डालना हो तो थोड़े बहुत लोग जाते हैं वो भी लेंटर पड़ने के बाद दारू और बकरे की पार्टी चाहिए...... मैं ज्यादा पुरानी बात नहीं कर रहा हु  मात्र २० साल पहले तक ये संस्कृति जिन्दा थी गाँव मैं किसी की भी शादी होती थी तो पुरे गाँव वाले मिलकर धान कूटने से लेकर गेहू पिसवाने तक जिस घर मैं शादी होनी हैं उस घर कि सफाई रंगाई पुताई से लेकर बारातियों कि बिदाई तक का पूरा काम पूरे गाँव वाले मिलकर किया करते थे किसी का माकन बन रहा हो तो माकन पूरा होने तक गाँव वाले मदत करते थे कहते थे 'चाकुव पाथर लाम दार मैं त गों वालोली मदत कारन पड्छी'  गाँव मै जितने भी समोहिक कार्य होते थे सब लोग अपना घर का काम समझ कर करते थे खेती के काम मैं कोई परिवार पीछे रह जाता था तो सरे गाँव वाले मिलकर उनकी सहायता के लिए पहुच जाते थे यहाँ तक कि पूरा गाँव एक परिवार कि तरह रहता था जितना अपनापन पुरे गाँव मैं रहता था आज एक परिवार मैं भी देखने को नहीं मिलता हैं........