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Bhana Gang Nath Jagar - भाना-गंगनाथ जागर का वर्णन

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 07, 2011, 11:54:59 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(म्यूजिक-जय भगवती देवी)

(4) अलख निरंजन-2
बुजि लिये -2 मेरि बात बुजी लिये,
त्यरो ईष्ट- त्यरो ला पै-ईष्ट,
स्वच्छ मन ली बेरि जाये, दियो धार चड़ाये
सब ठीक हे जालो-2
पार्ष्व गायन-
तन्त्र मन्त्र जयोति विधिा नाथा रे,
विधा भी चलायी गंगनाथ रे,
जन्म कुण्डली दिखाई नाथा रे,
किसी ने दिखाया हाथ नाथा रे,
सब कोई आया गंगनाथा रे ,
पर-भाना नहिं देखि गंगनाथा रे-2
पार्ष्व भाषा- गंगनाथ इस प्रकार दुखियों का दुख हरते हुवे अपने
तेजस्वी माया से पूरे इलाके में चर्चित हो जाते है, परन्तु भाना के
वियोग में वह अपना आसन कहीं भी सुव्यवस्थित नहीं लगा पाते
है। इसी कारण वह अपना रूख-पंचराज नगरी की ओर मोड़
देते है-जहा। रोपाई खेती वारी का कार्य चल रहा होता है।
कृषकों का प्रवेश-
हपूर बजानी द्यूरा सू रू रू रू-
बॉज की हवा छः बाटा सू सू रू रू..
आज कॉ जाइया, बाटा रू रू रू रू
कबै की अवा छः बटा सू रू रू रू
यो हमारि मातृ भूमि निर्मल संसार।
भुलि जूंलो दांत पाठी नी भुलूं अनार!
तीले दार बोला शाबास मेरा मोति बल्द।
तीले दार बोला शाबास मेरा जोडिया बल्द!
नौ रूपै को मोतिया बल्द-2- सौ रूपै को सींग
-शाबास मेरो मोतिया बल्द,
झिरी झुमका रोपाई हे रे छः, आहा झिरी झुमका रोपाई......2
झिरी झुमका गोडाई हे रे छः, आहा झिरी झुमका.........2
झिरी झुमका सराई हे रे छः, आहा झिरी झुमका.........2

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(गंगनाथ जी का प्रवेश- एक स्त्री का सहेली के साथ प्रवेश वार्ता)


महिलायें-
नमोः नारायण बाबा, नमोः नारायण-2
नमोः नारायण बाबा- प्रणाम तुमके-2
नमोः नारायण बाबा- कि नाम तुमरो-2
गंगनाथ-
डोटी को कुॅवर हुं मै आज इति आयूॅ-2
राज-पाठ छाड़ी जोगी बेष छः बनायो-2
महिलायें-
जोगी का वेष में तुम, कीलै दति आया-2
डोटी का कुॅवर तुम, हमके बताला-2
गंगनाथ-
अल्मोंड़ा जोशी खोला रूपसी भाना-2
वीका कारण आई रयूॅ मन छ बैचेन-2
(एक महिला जाते-जाते रूक जाती है, गंगनाथ से कहती है)
महिला द्वारा-
तेरी आस लागी रूंछी भाना रूपसी भाना,
बाटा-बटा चायी रूंछी भाना रूपसी भाना,
जैका कारण तैले राज-पाठ सब छोड़यो,
भाई बन्धु मित्रो है अपनो मुख मोड़यो,
जोशी के दिवान की-बेटी रूपसी भाना,
रूंछी जोशी खोला भाना-भाना रूपसी भाना।
गंगनाथ-
घस्यारी ओ घस्यारी, बात तू बताली,
भाना रूपसी भाना, कै गौं मा होली-2
जै कारण आयी रयूं बात तूं बताली
मै इति बैठी जाछू-उके तू बताली-2

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(महिलाओं का गंगनाथ को साथ में ले जाते हुए गांव की ओर प्रस्थान-
गांव का दृश्य)

महिला द्वारा-
सुण मेरी भाना हमारा मन्दिर-2
मोहनी सूरत वालो-2 एक जोगी आयो भाना-2
राजा को कुॅवर जैसो मै कड़ी लागछ-2
मोहनी सूरत वीकी की भलो लागछ भाना की
भालो लागछ-2
न्योली भाना-
मेरी मन मीत होलो, मै पछाड़ी ज्यालो
होलो अगर गंगाचन्द संग मै लीजालो-2
(सभी महिलाओं के साथ नौले में पानी का दृश्य)
भाना-
ओ दिदी, ओ भूली, मेरा मन ऐछ जोगी गंगनाथ-2
लागी रयो जैकी आस वी छ गंगनाथ-2
मेरा गौ में आयो आज जोगी गंगनाथ
ओ दिदी,ओ भूली, मेरा मन...........
न्योली -
खो गई अतीत में भाना रूपसी भाना-2
खो गई अतीत में भाना रूपसी भाना-2

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(भाना का अपने अतीत में खो जाना साथ ही दिवान जी के दो गुप्तचरों काआगमन)हरूवा भाषा -ओ परूवा.... ओ शेरूवा देख-देख-देखजोगी का यप में आयो यो निराधाम कपटीपरूवा भाषा -होई-होई-होई जोगी का दगाड़ा तोभाना मस्त हो रै छदिवान ज्यू का घर अन्धेर हे रै छ-एक जोगी का दगड़ा भाना मस्त हे रै छ-17हरूवा भाषा -हिट-हिट-हिट सबन बतूनू-अब होली को त्यौहार छःदिवान ज्यू थे जाई बैरी उनूके बतूला,सब का सामनी तैकी मूनी फाटी द्यूला,(ग्रामीण तथा भाना गंगनाथ का अन्दर को जाना तुरन्त उसके आदमीका आना भाना का हाथ पकड़ कर खींच कर मंच में लाना )आदमी भाषा -बेशरम जरा शरम कर, दुनियॉ की डर कर डर पापडिं, कुलक्षणि,कलंकणि-तेरा करम सुणि-सुणि मै लागी गे शरमभाना भाषा -आज तुमन कै लागी डरआज मै-पापडिं, कुलक्षणि, कलंकणि बणि गयूं-आज तक कॉहु जाइ र्योछया-तुमारा घर बैठी-बैठी सारी उमर बिती गैछ....आदमी भाषा -अच्छा, आज म्यारा घर बैठी-बैठी तेरी उमर बीति गै,हॉ-समझणयों, समझणयों, समझणयों तेरी मन की बात- सबसमझि गयों, काल आग्योछ, तुम द्वियोन्को देख पे देख-24 धड़ीमें तुम द्वीनकी -हेजालि मौत-हॉ-हवै जालि मौत-!(भाना और आदमी का धीरे-धीरे अन्दर को जाना)(अल्मोड़ा जा कर-दिवान ज्यू को सूचित करने हेतु गुप्तचरों का जाना)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

'पंचम दृष्य'

(दिवान जी के पास उनके वफादार-गंगनाथ को ढूंढते-2 शिकायत
करने पहुॅचते है और दिवान होली के त्यौहार के दिन आकर सब देखने को
कहते हैं )
रास्ते में ग्रामीणों की वार्ता-
दिवान ज्यू धे जाई बेर बात यो बतूंला
आशिर्वाद रूप में हम सब- इनाम पांला।
हरूवा वार्ता-
दिवान ज्यू ओ दिवान ज्यू.........
बात यो थी..... तै को, तै को.......
दिवान-
बता, बता झटट् बता,
बात गलत होलीत तुम जाड्या!
परूवा वार्ता-
महाराज गों मे एक निरंकारी बाबा आई र्योछः
जोगी का दगाड़ा भाना-मस्त है रै छः
दिवान आदेश-
होली को त्यौहार भोल शुरू होलो,
मै गों में एक बेर-देखंूलो,
देखो-तुमरी बात सही भै-इनाम पाला,
गलत भै-उनरि जाग तुमरि-मुनि काटि द्योलो।
(दूसरे दिन ग्रामीणों का गंगनाथ को ढूंढते हुवे आना और- जोगी को
मारने की योजना बनाना)


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

'होली प्रारम्भ'

होली प्रारम्भ-

को रे बांधे चीर, हो रधुनन्दन राजा
रामी चन्द बांधे लछीमन बांधे,
बांधे लव-कुश चीर हो रधुनन्दन राजा,
ब्रहमा, विष्णु बांधे गणपति बांधे,
बांधे लव-कुश चीर हो, रधुनन्दन राजा
हॉ-हॉ रे मोहन गिरधारी-2
ऐसो अनाड़ी चुनरि गयो फाड़ी,
हॅसि-हॅसि दे गयो गारी, गोहन गिरधारी
हॉ-हॉ रे मोहन गिरधारी-2
(गंगनाथ को लाया जाता है, भांग घोटा पिलाकर उन्हैं मस्त कर उनके पहने
दिव्य वस्त्र उतार कर- दिवान के आदेश पर विश्वनाथ घाट में मौंत के घाट
उतार दिया जाता है, तब भाना श्राप देती है-
भाना श्राप-
अरे-की होई ग्यो, की करन लायी र्योछा,
ये-बेकसूरस-किला मारन लागि रिछा,
-मारन्छ-मैस मार-मैंस मार.........
भाना (रोते-हुवे-हूॅ, हूॅ, हूॅ, हूॅ,)
मैं तुमन श्राप दिंछु, फिटकार दिंछु-2 तुमरो भलो जन हो, गोठ का गोठ, पाणा
को पाणा रे जो पानी की एक बूॅद खिन ले तरसला, अन्न ले जन हो-2
(इसे सुनकर दिवान आदेश देता है- भाना को मार दो, इस पर सभी को
मार दिया जाता है, माहोल गमगीन हो जाता है)
तीन दिन बाद ही.....
(सम्पूर्ण ग्रामीण पागलपन की हालत में पहुॅच जाते हैं, तब एक-सयाना
वृद्ध ग्रामीण बताता है, उस दुखद धड़ी को याद दिलाता है।
तब सभी लोग उस स्थान की ओर चल पड़ते है और भाना-गंगनाथ
व झकरवा, बर्मीबाला की पूजा अर्चना करने लगते हैं)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भाषा- जन मानस में लिखा एक अनपढ़ा, अनवाचा इतिहास पूराना बार-बार सामने आता है, और समय की चादरों में लिपटे सिमटे से तीन शवांे को दिखलाता है। ये तीन शव सत्गति की सदा प्रतिक्षा करते आये हैं-कैसे हैं हम लोग इंसानो को जीवित, जलाकर, सूली पर लटकाकर, गोलियों से दाग-दाग कर अपनी करनी का परिचय देते हैं और रखते हैं उन्हैं देवताओं की श्रेणी में।

ये तीन शव है- भाना, गंगनाथ एवं बर्मीबाला सत्गति न होने के कारण-ठीक तीन दिन बाद अवतार ले लिया अवतार लेते ही सारा विश्वनाथ घाट व जोशी खोला हिलने लगा और वहा भयंकर अनिष्ठ व उत्पात होने लगे, इसे देख वहा के जोशीयों ने भाना-गंगनाथ से क्षमा-याचना की और अपने दरवाजों के उपर रख कर उन्हैं पूजना प्रारम्भ किया।
हम धरती के लोग भी अजीब हैं, पहले मारते हैं, फिर उन्ही को

पूजते हैं, दससे आगे देखिये अपनी करनी-अपने ही ऑखो........।
म्यूजिक - दैन, दमुवा पर-ढम, ढम, ढम
(हाथों में मसाल लाते ग्रामीण जनों का प्रवेश)
(हुड़का और, थाली में खेला प्रारम्भ होती है)

खेला-

मानी जा हो....... डोटी को कुॅवर अब,
मानी जा हो....... रूपवती भाना अब,
जागो हो-डोटी को कुॅवर अब,
जागो हो-रूपवती भाना अब,
प्राणीयों का रणवासी छोड्यो-2
छोड्यो डोटी वास!
मॉ का प्यार, पिता का द्वार-2-छोड्यो तू ले आज
विभूति रमाई गंगनाथा रे-2
डोटी का कुॅवर गंगनाथा रे-2
रूपवति भाना-गंगनाथा रे-2
ताज क्यो उतारि दियो नाथा रे-2
जोगी को भेष लियो नाथा रे-2
विभूति रमाई गंगनाथा रे-2

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ग्रामीणों द्वारा विनती-

गल्ती है गै प्रभू, माफ करिया,
नर बानर भया, गल्ती है गै छ,
प्रभू दैन होया, हमन सजा मिलि गैछ,
आब गोठ ले पांणा ले सबन को भल करिया,,
गंगनाथ- (हॅसते हुवे-रोते हुवे-आपबीती बताता है)
देख ला देख सौकार,
मेरो परिवार त तैले उजाड़ि हाच,
मै आफी आइना को ना थ्यूं,
तेरि रूपसी बान भाना ले बुलायू,
आब माफी मांगन ला रिछैत
सुन पॉ....... सुन....... सुन......
मनी गयों त गंगनाथ भयों,
फूल-फुल्या करि दिन्या भयों,
बिगडि गयों त............2
भूत भयों ला भूत!
आज मरी अल्मोड़ा का जोशी खोला में-
देलि मथाल में, देलि मथाल में-
मेरी पूजा ल्यूंलो-2
नै जानू कैलाश, चौकोड़ी बत्ती जलाये-2
(धीरे-धीरे भाना-गंगनाथ का कैलाश को प्रस्थान और पूर्ववत् खेला वाली
स्थिति पर आ जाना।)

joshibc007

मेहता जी
गंगनाथ जी के बारे में आपने यह बहुत ही रोचक जानकारी दी है
हमारे यहाँ गंगनाथ जी की बहुत मान्यता है
धन्यवाद
भुवन चंदर जोशी



Quote from: एम.एस. मेहता /M S Mehta on January 07, 2011, 11:54:59 PM

Dosto,

We are going give here a detailed information on  "Jagar" on "Bhana & Gang Nath Devta" which is very-2 popular in Kumoan Region of Uttarakhand. Gang Nath is also known as a "God of Justice" similar to "Golu Devta"!

This Jagar has been compiled by Mr Hem Raj Singh Bisht and Navodya Parvteey Kala Kendra Pithorgarh.

Hope you would appreciate this exclusive information on Culture of Uttarakhand.

M S Mehta
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DETAILED JAGAR YOU AND LISTEN FROM HERE

http://www.esnips.com/doc/0f7b0e66-b0df-4300-85d7-41d893c426ed/Jagar%20by%20Nain%20Nath%20Rawal

सांस्कृतिक परिचय (By Hem Raj Bisht)

लोक संस्कृति मानव र्ध्म है। लोक गीत ध्रती के गीत है। ध्रती जिसे हम जिस नाम से भी जानते हों वह माटी की ध्रती है। मनुष्य किसी भी देश,प्रदेश या अंचल में रहे वह मानव है। उसके सुख, दुख, उल्लास-वेदना उसकी भावना बहुत कुछ समान है। वह अपनी प्रसÂता मुस्कान में बिखेरता है तथा उसके दुःख दर्द आंसू बताते हैं। परन्तु ध्रा जो हमें सब कुछ देती है वह उससे एक नादान अवोध् बालक की तरह लेते ही मांगते ही जाते हैं। देते कुछ नहीं हैं। पिफर भी जीवन एक बहुरंगी है तथा लोक साहित्य लोक जीवन का दर्पण है। लोक साहित्य ने ही शिष्ट साहित्य को जन्म दिया है। उसके लिये मातृ-वृक्ष का कार्य किया है। साथ ही मूल में उसे चेतना तथा वस्तु देकर उसका मार्ग प्रशस्त किया है। लोक साहित्य लोक जीवन की भावनाओं, मान्यताओं, धरणाओं, लोक संस्कृति के जीवंत तत्वों सर्वोपरि लोक जीवन की अनुभूतियों एवं अभि व्यज्जनों का एक मात्रा वाहक है। लोक-जीवन के इन तत्वों के इस कार्य में लोक गाथाओं का अपना अत्यन्त महत्व है। क्योंकि वे चिरकाल से एक निश्चित परम्परा द्वारा संचारित होकर, अतीत से वस्तु
लेकर, वर्तमान से प्रभावित होती हुई भविष्य की ओर दृष्टि पात करती हुई आगे बड़ती है। यह लोक-गाथाएं किसी लोक जीवन के इतिहास, संस्कृति तथा लोक-जीवन की अभिव्यक्ति को वहन करने का कार्य करती आयी हैं।

हमारे विभिÂ अंचलों के जन-जीवन से लोक-संस्कृति उभरती है। वह नाना रूपों में व्यक्त करती है। मानव हृदय के उन उदगारों को जिनमें विविध्ता में साम्य निहित है, अनेक रूपता में एकता है। भारत के प्रत्येक प्रान्तों में लोक साहित्य तथा लोक कवि का महत्व छिपा हुआ है। आज साहित्य के क्षेत्रा में लोक साहित्य के अध्ययन की हल-चल तथा भाग दौड़ इसके महत्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इन्हीं में कुँमाऊ की लोक संस्कृति अपनी विशिष्ट छटाओं से अपनी ओर जन मानस को आकर्षित करती है। कुँमाऊ की लोक संस्कृति यहां के निवासियों के रहन-सहन, एकता,भाई चारे को भी परिलक्षित करती है। कुँमाऊ की लोक संस्कृति विविध्ता में एकता का संदेश देती हुई  बहुआयामी है। यहां के लोक गीतों-लोक नृत्यों एवं लोक ध्ुनों का यहां भण्डार पाया गयाहै ;प्रकृति की अनुपम छटा के मध्य यहां की लोक ध्ुनें बरबस मन को मोह लेती हैं। लोक संस्कृति में सर्वाध्कि विविध्ता विद्यमान है। यहां के झोड़ों में मुख्यतः दुर्गा तथा सारंग राग का मिश्रण मिलता है, जिनकी ध्ुनें पर्वत प्रदेश की ऊंचाईयों से प्रतिध्वनित होकर मन में एक विचित्रा अवर्णनीय गुद-गुदी पैदा करती है। यहां की मॉसल हरीतिमा देवदार की पत्तियां, घाटियां तथा अध्पित्यिकायें लोक मानस में एक उदासी भरे रूमानी प्रेम तथा जीवन की आकांक्षा की स्पफूर्ति भरी प्रेरणा भरती रहती हैं।

कुँमाऊनी लोक गीतों में मुख्यतः न्योली, भगनौला, छबेली, भयेडा गीत, प्रयाण गीत,झोड़ा चांचरी बैर, आहवान गीत, बरम गीत, सकुन गीत, बनड़ा, कुँमाऊ की लोक गाथाओं में मुक्तक छन्द, वर्णित छन्द, लोक साहित्य की कुछ प्रमुख गीति प(तियों में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुये हैं। इन्हीं गीतों में कृषि सम्बन्ध्ी गीतों में -गुडौल - 'हुड़की बौल'- कर्म और संगीत का जो सुमुध्ूर प्रेरणास्पद सम्मिलन पाया जाता है वह श्रम की थकान को तो हरता ही है साथ ही संयुक्त कर्म को करने के लिए अज्ञात रूप से प्रोत्साहित करता रहता है। इसी प्रकार जहां झोड़ों एवं मेलों के गीतों में प्यार भरी छेड़-छाड़ पाई जाती है वहीं ट्टतु गीतों में प्राकृतिक सौन्दर्य की भावना तथा छोलियों में भाव प्रवण रसाकांक्षा की उन्मद पुकार प्राणों को झकझोर देती है। जहां जन मानस धर्मिक गीत, संस्कार गीत, जागर तथा एकाग्रता में न्योलियों का सहारा लेने लगता है तो वहीं दूसरी ओर वीर गाथाओं और एतिहासिक कथाओं को भी जाने बिना नहीं रह सकता है। कुँमाउनी लोक गाथाओं को निम्न चार भागों में बांटा गया है।

(क) बीर गाथायें- रणुवा रौत, अजवा बपफौल, भगुवा रौत, नरसिंह और ध्ना, रमौल, सिददू, बिद्दू, पुरख पन्थ।
(ख)प्रेम गाथायें - राजुला मालू साही एवं भाना गंघनाथ
(ग) देव गाथायें- हरू तथा सैम, विणभाट गाथा, गंवारा की गाथा, कालसिण तथा छुरमल
गाथा, ऐडी की गाथा ध्ड़देवी गाथा, परी आंचरी गाथा तथा नाग गाथा।
(घ) र्ध्म गाथायें - लंका तथा कुरू क्षेत्रा गाथा, नरसिंह गाथा, शिव ध्नुष गाथा, भष्मासुर
गाथा आदि ।
कुमाऊँ लोक साहित्य में कुॅमाउनी लोक गीतों तथा लोक गाथाओं के मिश्रण से
यहां का समूचा क्षेत्रा देव स्थल के नाम से जाना जाता है। इसीलिये यहां का लोक साहित्य
समूचे भारत में अनुपमता छटा बिखेरे हुये हैं।