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Muruli Baji Ge Book By Sushma Joshi, Mother of Prasoon Joshi-मुरूली बाजे गे

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 10, 2011, 06:43:55 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are pleased to inform you that Smt Sushma Joshi, Mother of famous Ad Guru and Lyricist Prasoon Joshi has written a book title as "Muruli Baji Ge". This books is written on Kumoani language.


Joshi ji has really done a great work to promote the culture of Uttarakhand.  The book has been written in kumaoni, it will help to promote the language and people will definitely inspire.

I am you will appreciate this work of Joshi ji.

Many-2 congratulations to Sushma Ji on Behalf of Merapahad Family.



भारत के अन्य आंचलो की भाति उत्तराखंड के पारंपरिक संगीत आयोजनो का आरम्भ भी कुमयुवासियों की श्रधा एव आस्था के प्रतिक श्री गणेश, दुर्गा मा, तथा गोल्ल देव की स्तुति से होता है.. मेने इसी बात को धय में रखकर पुस्तक के आरम्भ में इन्ही को श्रधा सुमन अर्पित किये है..

इसके बाद भिन्न भिन्न ऋतुओ के मध्यम से उत्तराखंड का श्रृंगार करने वाले ऋतू गीतों की रचना की, कभी कभी साथियों से छुटे अकेले पक्षी का डर, ममतामई माँ के अंचल से ढककर शिशु को मीठी मीठी लोरी सुनाकर कर सुलाने का प्रयास, पति के वियोग में नायिका के विरह स्वरुप न्योली, चेत माह में भाई द्वारा पकवान मिठाई, वस्त्र आदि लेकर जाने वाले भाई बहिन की प्रतीक्षा के गीत , मेले आदि में गए जाने वाले लोक गीत, चाचरी, छपेली, झोडा, होली के गीत,

आदि विधाओ को ध्यान में रखकर मेने अपने मोलिक शब्दों, संवेदनाओं के धागे में पिरोकर गीतों में ढलने का प्रयास किया है..
इस प्रयास में हुई त्रुटियों के लिए कुमायूं के सुधिजन मेरी त्रुटियों के लिए मुझे छमा करेंगे.. इस आशा के साथ समर्पित है आपको कुमाओं के लोकगीतों के ये पुस्तक. कयोंकि गीतों की सांगत हेतु प्रायः मुरली व हुडके का प्रयोग होता है, इसी से मेने अपनी पुस्तक का शीर्षक "मुरली बाजी गे" रखा है. - By Smt Sushma Joshi Ji.
  Regards, M S Mehta



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


The book is available at

   "Sahitya Prakashan
   101 Pratap Nagar Mayur Vihar-I
    Delhi - 110091

 

Himalayan Warrior /पहाड़ी योद्धा

Oh great news.

Many-2 Congratulations to Sushma Ji.. We really appreciate her efforts for this noble job.

Sushma Ji son Mr Prasoon Joshi ji is also great Writer, Lyricist who has made us proud. God bless you.. Please keep up the good work.

We are sure many people will get motivated by this work of Sushma ji. I wil definitly purchase htis book.

Jai Nanda Devi.

नवीन जोशी

Bahut badhiya, dhoodhkar padhta hun. matlab Prasoon ji kee pratibha ke peechhe unkee mataji hain.

Mehta ji ka is jaankaaree ke liye aabhaar.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


बिलकुल सही जोशी जी !

यह बुक दिल्ली में उपलब्ध है!  पता एव फ़ोन नंबर इस प्रकार है :-

   साहित्य प्रकाशन
  १०१ प्रताप नगर, मयूर विहार, फेज १

नंबर है :

  011-22751228
  011-22790165




सुषमा जी को बहुत बधाई!

बहुत अच्छा शीर्षक है किताब का और कवर भी अच्छा है !  मै इस किताब को जरुर खरीदूंगा!


Poonam Rawat

आजकल उत्तराखंड संगीत जगत में नए नए कलाकरों के द्वरा गाये गाने वाले गीतों का हाल किसी से छुपा नहीं है जिसका मूल कारण है की आजकल के अधिकतर कलाकार लोकगीतों के बारे में पढना या जानना नहीं चाहते है.

कुमाओं के लोक गीतों की धरोहर को अपनी किताब में पिरोया है श्रीमती सुषमा जोशी जी ने..
अगर आपलोग भी चाहते है की आपकी आने वाली पीढ़ी भी उत्तराखंड की सस्कृति को समझ सके तो इस पुस्तक को जरुर पढ़े...




सास बहु संवाद गीत

सास- भूखा पेट नींद न्हाती कासी बीते रात, रत्ते बयाँण कब होली बीती जाली रात,
बहु- खाली पेट मची सासु पेट मणि खलबली, भाना कुना खाली न्हाती मानिर कौ ले भात.
सास- ना त तेरो सौर घर ना त मेरा च्योलों, कथे कनु सुखा दुखा विपदा की बात.
बहु- नि घबड़ाओ सासु सुणो, देवी देणी होली, मिली जुलि काटी ल्यह्युलो अमुसी जे रात..
सास - नानातिना थें के कौली, कसिके समझाली, कं बै देली खाणा हुणी द्वि घास भात....
बहु- बीती जला दुःख दीन सुखा का दीन आला, जब म्यारा सौर म्यारा स्वामी घर आला.
सास-बहु- : रोज खुलो तब पूरी साग- ससाग बासमती को भात, योई आस करी-करी कटी जला दीन रात


विरह गीत
आकाश के चाई रुंलो कटी जाली रात, नि थामिनी पर यो सुवा आखिन की बरसात.
याद तेरी जब उछ सुवा मन कई नि लागनो, धो काटड़ है जांछ सुवा समय को कटाडो.
चाई रूंछ तारण के गडी- गडी काटन छुं रात.
सब घारण का मैस रोज ब्याव लौटी उनी. सुवा का मन भाई गेछ शहर की दूणी,
जाणी केले मुनि हालो भूलो गों के बाद....
म्यार मैत की देवी सुण कब देणी होली,
कुशल मंगल म्यार सुवा के घर कब ल्याली,
त्यारा थाना दियो जंगूलो चढुलो परसाद.....


Publisher
Sahitya Prakashan, 101, Pratap Nagar,
Mayur Vihar-1
Delhi-110091
contact - 9810402997 - Yogesh Pal - 011- 22751228


हेम पन्त

पारंपरिक लोक गीतों को पुस्तक के माध्यम से पूरी दुनिया तक पहुंचाने का सुषमा जोशी जी का यह प्रयास अंत्यंत सराहनीय है.. इस समय जब हमारी नयी पीढ़ी अपनी बोली भाषा से दूर होती जा रही है और संगीत उद्योग में प्रतिदिन नए गायक फूहड़ गाने गा कर सांसकृतिक प्रदूषण फैला रहे हैं, ऐसे प्रयासों से जरूर उम्मीद जगती है की हमारी संस्कृति और बोली-भाषा मजबूत होकर उभरेगी..