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Kedartal Uttarkashi Uttarakhand,केदारताल उत्तरकाशी उत्तराखंड

Started by Devbhoomi,Uttarakhand, October 01, 2011, 08:49:04 AM

Devbhoomi,Uttarakhand

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड को प्रकिरती ने आपार भेंट के रूप में इन सुन्दर पर्यटन स्थलों को प्रदान किया है,इन्ही सुन्दर्ताओं और देवताओं के वास होने के कारण उत्तराखंड  को देवभूमि कहते हैं ! 

  केदारताल हिमालय के सुंदरतम स्थलों में से एक है। यह मध्य हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित है इसमें जोगिन शिखर पर्वत श्रृंखला के ग्लेशियरों का पवित्र जल है यह समुद्र तल से १५,००० फुट से कुछ अधिक ऊंचाई पर स्थित है। इसके पास ही मृगुपंथ और थलयसागर पर्वत हैं। केदारताल से केदारगंगा निकलती है जो भागीरथी की अनेकैक  सहायक नदी है! उत्तरकाशी का यह ताल समुद्र तल से 15000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है! थाल्‍यासागर चोटी का इसमें स्‍पष्‍ट प्रतिबिंब नज़र आता है। केदार ताल जाने के रास्‍ते में कोई सुविधा नहीं मिलती है।इसलिए यहाँ पूरी तैयारी के साथ जाना चाहिए।


हिमालय प्रकृति की कई अदभुत संरचनाओं से भरा पडा है। केदारताल इन्हीं में से एक है। यहां का सफर थोडा मुश्किल बेशक सही, लेकिन एक प्रकृति प्रेमी के लिये आनंददायक है।गंगोत्री से तीस कि.मी. दुर्गम हिम शिखरों में केदार ताल झील अपने दिव्य सौंदर्य के लिए विख्यात है। इस उच्च हिमालय के क्षेत्र में यह अलौकिक झील प्रकृति की अद्भुत संरचना है। निर्मल नीले जल वाली केदार ताल झील के बारे में जनश्रुति है कि समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने अपने कंठ की भीषण ज्वाला को केदार ताल का जल पीकर ही शांत किया था।

गढ़वाली लोग इसे 'अछराओं का ताल' भी कहते हैं। समुद्र तल से 4,050 मीटर ऊंचाई पर गंगोत्री से 19 कि.मी. दूर भागीरथी को पार करते हुए केदार गंगा के किनारे पैदल यात्रा मार्ग है। केदार ताल के सामने  थल सागर है, बायीं तरफ सुमेरु पर्वत और शिवलिंग शिखर है।





M S JAKHI

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हिमालय के सुंदरतम स्थलों में से एक है केदारताल। मध्य हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित यह ताल न केवल प्रकृति की एक विशिष्ट रचना है बल्कि अनूठे नैसर्गिक सौंदर्य का चरम है।

जोगिन शिखर पर्वत श्रृंखला के कुछ ग्लेशियरों ने अपने जल से पवित्र केदारताल को निर्मित किया है। यह समुद्र तल से 15 हजार फुट से अधिक ऊंचाई पर स्थित है।
पास ही हैं प्रसिद्ध मृगुपंथ और थलयसागर पर्वत जो अपनी चोटियों के प्रतिबिंब से ताल की शोभा में चार चांद लगाते हैं। केदारताल से केदारगंगा निकलती है जो भागीरथी की एक सहायक नदी है।

कहीं शांत और कहीं कलकल करती यह नदी विशाल पत्थरों और चट्टानों के बीच से अपना रास्ता बनाती है। अपने आप को पूर्ण रूपेण गंगा कहलाने के लिए गंगोत्री के समीप यह भागीरथी में मिल जाती है।

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गंगोत्री से केदारताल की दूरी तय करते हुए 12 कि.मी. के बाद केदार खड़क में पहला पड़ाव डाला जाता है। बिना टेंट लगाए हमने एक बड़ी चट्टान के नीचे बनी गुफा में रात बिताई।

गंगोत्री में दूसरी रात बिताकर सवेरे हम जल्दी उठे। पांच बजे कमलसिंह हमारे पास पहुंच गया। हल्का नाश्ता लेकर साढ़े पांच बजे हमने यात्रा प्रारंभ कर दी।

अक्सर ट्रेकिंग करने वालों के लिए भी प्रारंभ में केदारताल का रास्ता कठिन है। परंतु 8-10 किमी चलने के उपरांत व्यक्ति रास्ते की कठिनाइयों का अभ्यस्त होने लगता है और मार्ग भी सुगम होने लगता है। हालांकि ऊंचाई वाले इलाकों में आक्सीजन की कमी जैसी समस्याओं को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

ऐसे क्षेत्रों में चलने का मूलमंत्र है धीरे चलना, आक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक पानी पीना, ग्लूकोज लेना और कभी भूखे नहीं रहना। आप कितने भी होशियार हों, सुरक्षित चलने में ही समझदारी है। ऊंचाई पर अज्ञानतावश लोग संकट में पड़ जाते हैं।

दूसरे दिन हम भोज खड़क पहुंचते हैं। यह स्थान केदार खड़क से लगभग दस कि.मी. दूर है। तीसरे दिन 8 कि.मी. चलने के पश्चात भव्य ताल पर पहुंच जाते हैं।

तीसरे दिन ही हमें 6772 मीटर (लगभग 22213 फुट) ऊंचे मृगुपथ शिखर और ऊंचे थलम सागर शिखर के दर्शन हुए। कुछ समय बाद भव्य केदारताल हमारे सामने था। कुछ लोग इस मार्ग को दो दिन में तय करते हैं।

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गंगोत्री और ऊपर की ओर चलते हुए प्रचुर मात्रा में भोजपत्र के वृक्ष और अन्य कई प्रकार के पेड़ पौधे मिलते हैं। सारे क्षेत्र में शिवजी की धूप' नामक एक बूटी फैली हुई है।

इसकी घासनुमा पत्तियों को जलाने पर गुग्गल धूप जैसी सुगंध से वातावरण महक उठता है। स्थानीय लोग इसे बड़ा पवित्र मानते है। बिच्छू बूटी भी यहां बहुत है। ऊंचाई के साथ-साथ वनस्पति भी लुप्त प्राय: होने लगती है।

केवल घास, पहाड़ी फूलों के झुरमुट, झाडि़यां ओर छोटे-छोटे पौधे मिलते है। वन्य प्राणियों में प्राय: भरल हिरण छोटे-बड़े झुंडों में दिखाई दे जाते हैं। एक विशेष प्रजाति का बाज (फाल्कन) यहां पाया जाता है जो बर्फीले क्षेत्रों में रहता है। इसके अतिरिक्त कौए के आकार के पीली चोंच और काले रंग के पक्षी प्राय: दिखाई देते हैं।





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केदारताल से केदारगंगा निकलती है जो भागीरथी की एक सहायक नदी है। कहीं शांत और कहीं कलकल करती यह नदी विशाल पत्थरों और चट्टानों के बीच से अपना रास्ता बनाती है। अपने आप को पूर्ण रूपेण गंगा कहलाने के लिए गंगोत्री के समीप यह भागीरथी में मिल जाती है।

हिमालय के सुंदरतम स्थलों में से एक है केदारताल। मध्य हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित यह ताल न केवल प्रकृति की एक विशिष्ट रचना है बल्कि अनूठे नैसर्गिक सौंदर्य का चरम है।

जोगिन शिखर पर्वत श्रृंखला के कुछ ग्लेशियरों ने अपने जल से पवित्र केदारताल को निर्मित किया है। यह समुद्र तल से 15 हजार फुट से अधिक ऊंचाई पर स्थित है। पास ही हैं प्रसिद्ध मृगुपंथ और थलयसागर पर्वत जो अपनी चोटियों के प्रतिबिंब से ताल की शोभा में चार चांद लगाते हैं।




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गंगोत्री से 14 किलोमीटर दूर इस मनोरम झील तक की चढ़ाई में अनुभवी आरोहियों (ट्रेकर्स) की भी परीक्षा होती है। बहुत ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों पर चढ़ने के लिये एक मार्गदर्शक की नितांत आवश्यकता होती है।

रास्ते में किसी प्रकार की सुविधा नहीं है इसलिये सब कुछ पहले प्रबन्ध करना होता है। झील पूर्ण साफ है, जहां विशाल थलयसागर चोटी है। यह स्थान समुद्र तल से 15,000 फीट ऊंचा है तथा थलयसागर जोगिन, भृगुपंथ तथा अन्य चोटियों पर चढ़ने के लिये यह आधार शिविर है।

जून-अक्टुबर के बीच आना सर्वोत्तम समय है। केदार ग्लेशियर के पिघलते बर्फ से बनी यह झील भागीरथी की सहायक केदार गंगा का उद्गम स्थल है, जिसे भगवान शिव द्वारा भागीदारी को दान मानते हैं। चढ़ाई थोड़ी कठिन जरूर है पर इस स्थान का सौदर्य आपकी थकावट दूर करने के लिये काफी है।