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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 21
दबोच ले मौक मौका परस्त मेरा नेता

मैं रंग ने लगा मेरी खोयी तस्वीर आम दीवारों पर
तकदीर ने साथ दिया था आप ने खुद ठोकर मार दी

पन्ने पर किरदार फिर उभर पड़े हैं अपने आप में
अब सलाखों पीछे बिछी पड़ी,शायद दिल्ली बिसात

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 21
कुछ तो कह गया होगा

कुछ तो कह गया होगा
ये पल ये कल जाते जाते
कुछ तो कह गया होगा

पूछा उस ने तुझ से तो होगा
अकेले तेरे संग जब बैठा होगा
आज,याद तेरी साथ लेकर वो

कुछ तो कह गया होगा
ये पल ये कल जाते जाते
कुछ तो कह गया होगा

आऊंगा उसने कहा तो होगा
तुझ से जब विदा हुआ होगा
नये रूप नये रंग में वो फिर

कुछ तो कह गया होगा
ये पल ये कल जाते जाते
कुछ तो कह गया होगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 20
हम तो कह गये अब आपकी बारी है कहने की
वीरान गांव,टूटे घर, उजाड़ा खेत छोड़ गये हैं हम अब आपकी बारी है संवारने की
बस आँखों में लेके दो बूंद पानी
ये ही है प्रवासी उत्तराखंड़ीयों की कहानी

......... ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 20 · Edited
मेरी बौऊ सुसि ले बौजी
मिल कौथिग जाणे या

म्यारा दियुरा पिरेमा रे दियुरा
मिल दगडी आणे या

मिल लगलू छेंक ये दियुरा
लगलू छेंकु या

कौथिग मा जेके ये दियुरा
कया तिल ये लेणू या

मेरी बौऊ सुसि ले बौजी
मिल कौथिग जाणे या

म्यारा दियुरा पिरेमा रे दियुरा
मिल दगडी आणे या

वो बिसरा दिना फिर ऐजा फुर्र ... ध्यानी

https://www.youtube.com/watch?v=zqgc4ghNF54

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
19 hours ago
हम उस महफ़िल में

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

मैंने भी वंहा अपना अकेला वो ठेला लगा दिया
बहते हुये मय में मैंने भी अपने गम को नहला दिया

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

ठहाके गूंजे यंह पर बिखरे बिखरे टूटे दिल के
हमने भी अपनी एक गजल उस फर्श पर तोड़ दी

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

कोशिशें की थी भूलने की उन्हें यूँ ही रुला दिया
यादों का आसमान सुलाने की उन्हें फिर जगा दिया

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
May 22 · Edited
हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

दो पंक्तियाँ की सोच , अब आप कोशिश कर देख लो
............... जारी है

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 21
जिंदगी लिख डाली थी मैंने भटकने के नाम उन राहों पर
जिस्म से आजाद हो के अब भी रूह को आराम ना मिला

ध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
6 hours ago
तुम मुझ से प्यार करते हो क्या ?

दिल के दरवाजे पे लिखा है बस अब मेरे नाम तेरा
चाहे पैगाम आये ना आये तेरा मैने ले लिया नाम तेरा

बिखरे हुए लम्हों को समेट लिया जाये जाके दर पे आज तेरे
फिर से तेरी उन यादों से तेरे दिल के साथ फिर मुलकात हो की ना हो

अपने दिल की बात कहने की किसी से कोई इजाजत ना लेनी थी
सुनने वाल जब अब कोई दिल पास साथ हो की ना हो

हम भी मौजूद थे तकदीर के दरवाजे पर लोगों ने जब दौलत बांटी
एक सिक्का खोटा था प्रेम का वो ही उठाया हम ने इस दिल से लगया

ना ही पिघली धरती ना ही पिघला आसमान मेरे रोने से
फिर क्या फर्क पड़ता है वफ़ा ये सनम मेरे होने ना होने से

भूखी-प्यासी बैठी रही वो मेरी तड़पती मोहब्बत मुझसे
फना हो के भी उस दिल उसके दरवाजे को उसका यकीन ना आया

दिल के दरवाजे पे लिखा है बस अब मेरे नाम तेरा
चाहे पैगाम आये ना आये तेरा मैने ले लिया नाम तेरा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
May 24 · Edited
दो आँसूं मेरे , यूँ ही गिरते रहे

दो आँसूं मेरे , यूँ ही गिरते रहे
एक बहाता रहा ,दुसरा संजोता रहा

बदलता समय ना मै पड़ सका
जिसे ना चाहा वो ही पुकारता रहा

जिस को चाहा उसने ना परवाह की
चौराहे खड़ा कर वो अपनी राह चल दिया

प्रेम का दस्तूर है ये असर एक ही है
एक समझा मुझे एक ना समझ सका

एक नर था वो एक नारी थी वो
रिश्ता मगर मेरा उन से बेटा बेटी का था

नारी के लिये नर ने ठोकर मार दी मुझे
खबर मिली मेरी बेटा भुला बेटी ने आँसूं बहा दिया

अब आजाद हूँ उन सारे बंधनो से
पर बेटी के कर्ज से एक पिता कैसे आजाद हो

दो आँसूं मेरे , यूँ ही गिरते रहे
एक बहाता रहा ,दुसरा संजोता रहा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
May 23
हम उस महफ़िल में

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

मैंने भी वंहा अपना अकेला वो ठेला लगा दिया
बहते हुये मय में मैंने भी अपने गम को नहला दिया

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

ठहाके गूंजे यंह पर बिखरे बिखरे टूटे दिल के
हमने भी अपनी एक गजल उस फर्श पर तोड़ दी

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

कोशिशें की थी भूलने की उन्हें यूँ ही रुला दिया
यादों का आसमान सुलाने की उन्हें फिर जगा दिया

हम उस महफ़िल में मशगूल थे ये ग़ालिब
साथ साथ पर सब अकेले ही नजर आये

एक उत्तराखंडी

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