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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 8
कंही खुद से ना खो ना जाऊं मै

उड़ते धुँये के अंदर
बहती धार में बहकर
मय तेरे जाल में फंसकर
इस हाल में कैद ना हो जाऊं मै
कंही खुद से ना खो ना जाऊं मै

देख मुझे बहुत कुछ करना है
मेरे माँ के सपनो में है जीना
आया हूँ इस जीवन में
ना जाना चाहता हूँ व्यर्थ खो कर
कंही खुद से ना खो ना जाऊं मै

मान दिल तो टूट गया
तेरा प्यार तुझ से रूठ गया
दिल एक के लिए दस को नारज ना कर
तेरी गली नही यह तो अपने घर को चल
कंही खुद से ना खो ना जाऊं मै

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 7
बुझे बुझे से लगे

बुझे बुझे से लगे वो अपने मेरे
टीम टिमाते रहे वो सपने मेरे .... २
बुझे बुझे से लगे .......

वो आधा चाँद आधी मुरादों वाला
आधी कैफियत मेरी वो वाह वाह करने वाले .... २
बुझे बुझे से लगे .......

एक बात को दो कर ने वाले
जमाने ने दिखाये रंग इंसान दो जुबां वाले
बुझे बुझे से लगे .......

बुझे बुझे से लगे वो अपने मेरे
टीम टिमाते रहे वो सपने मेरे .... २
बुझे बुझे से लगे .......

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 6 · Edited
अरमान मेरे दिल के

अरमान मेरे दिल के
आये और चले गये
अरमान मेरे दिल के
खुद अपने को देख के
कुछ हालत पे रो के चले गये
अरमान मेरे दिल के .........

उल्फतों का जमाना था
कंहा मंजिल कंहा ठिकना था
फकीरी का चोला धारा हम ने
अपना ही कर्ज तो चुकाना था
अरमान मेरे दिल के .........

कुछ रूठे रूठे दिल थे
कुछ टूटे छूटे सपने थे
रात का सफर था वो
या फिर दिन का वीराना था
अरमान मेरे दिल के .........

कुछ पल रुके वो साथ मेरे
रुक कर वो भी चल दीये
कुछ चुप चाप निकल गये
कुछ आंसूं निकला के चले गये

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

कोई

अमेठी को भुला मैं अमेठी मुझको भूल गयी
कह देना कोई आया था दो नग्मे सूना के चला गया
कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है

कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है
दिखया जो अमेठी ने आईना अब मेरा दिल भी डरता है
कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है

मुझे अर्श की चाहत थी ला के फर्श पे मारा है
लिखी मैंने थी जो कविता फिर वक्त ने उसे दोहराया है
कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है

खड़ा उस दोहराये पर आज फिर खुद को झुठला रहा हूँ मैं
मई की गर्मियों में अकेला सावन के आंसूं बहा रहा हूँ मैं
कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है

ख़ास बनने की चाह थी ठीक से आम भी ना बन पाया मै
सुबह का भुला था जैसे कोई मैं फिर अपने घर लौट आया मैं
कोई पागल समझता है कोई मजनू समझता है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 15 · Edited
आशा

ना मेरा आगाज ना अन्त ध्यानी
फिर भी रोज सुबह मैं चला आता हूँ
हर एक अंधियारी रात के बाद
एक उजाले कि किरण बनकर
आशा तेरे पथ पर चलकर

ध्यानी

#बालकृष्णडीध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 13 · 
अब ढोल और नगाड़े हो जाओ तैयार.....
आस बड़ी उन्हें जो कमल पे हैं सवार
देखना कितने अच्छे दिन आने वाले हैं
बीते दिनों तरंह वो वैसे ही जाने वाले हैं

...... ध्यानी

#बालकृष्णडीध्यानी
See Translation

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 12 · Edited
कुछ जानकारी अच्छी होती है : शीर्षक चकबंदी ......उत्तरखंड भी उसी राह पर !!!

चकबंदी वह विधि है जिसके द्वारा व्यक्तिगत खेती को टुकड़ों में विभक्त हाने से रोका एवं संचयित किया जाता है तथा किसी ग्राम की समस्त भूमि को और कृषकों के बिखरे हुए भूमिखंडों को एक पृथक्‌ क्षेत्र में पुनर्नियोजित किया जाता है। भारत में जहाँ प्रत्येक व्यक्तिगत भूमि (खेती) वैसे ही न्यूनतम है, वहाँ कभी कभी खेत इतने छोटे हो जाते हैं कि कार्यक्षम खेती करने में भी बाधा पड़ती है। चकबंदी द्वारा चकों का विस्तार होता है, जिससे कृषक के लिये कृषिविधियाँ सरल हो जाती हैं और पारिश्रमिक तथा समय की बचत के साथ साथ चक की निगरानी करने में भी सरलता हो जाती है। इसके द्वारा उस भूमि की भी बचत हो जाती है जो बिखरे हुए खेतों की मेड़ों से घिर जाती है। अंततोगत्वा, यह अवसर भी प्राप्त होता है कि गाँव के वासस्थानों, सड़कों एवं मार्गों की योजना बनाकर सुधार किया जा सके।

इतिहास

चकबंदी का कार्य सर्वप्रथम प्रयोगिक रूप से सन्‌ १९२० में पंजाब में प्रारंभ किया गया था। सरकारी संरक्षण में सहकारी समितियों का निर्माण हुआ, ताकि चकबंदी का कार्य ऐच्छिक आधार पर किया जा सके। प्रयोग सामान्य: सफल रहा, किंतु यह आवश्यक समझा गया कि पंजाब चकबंदी कानून १९३६ में पास किया जाय, जिसके द्वारा अधिकारियों को योजना तथा काश्तकारों के मतभेदों का निर्णय करने का अधिकार प्राप्त हो जाय। १९२८ में "रायल कमीशन ऑन ऐग्रीकल्चर इन इंडिया' ने, जिसे इसका अधिकार नहीं था कि वह जमीन की मिल्कियत में कोई परिवर्तन करे, यह संस्तुति की कि अन्य प्रांतों में भी चकबंदी ग्रहण कर ली जाय। परंतु केंद्रीय प्रांतों और पंजाब के अतिरिक्त, जहाँ कुछ सीमित सफलता के साथ चकबंदी कार्य हुआ, अन्य प्रांतों में बहुत कम सफलता प्राप्त हुई। यह पाया गया कि थोड़े से ही एसे खंड थे जहाँ पंजाब की भूमि की अदला बदली या चकबंदी द्वारा होनेवाली क्षति की जोखम उठाने को अनिच्छुक थे।

स्वतंत्रता के पश्चात्‌ चकबंदी पद्धति में व्यावहारिक रूप से ऐच्छिक स्वीकृति के सिद्धांत का समाप्त कर एक नवीन प्रेरणा प्रदान की गई। बंबई में प्रथम बार १९४७ में पारित एक विधान द्वारा सरकार को यह अधिकार प्राप्त हुआ कि वह जहाँ उचित समझे, चकबंदी कार्य लागू करे। जिन प्रांतों ने इस प्रथा का पालन किया उसमें पंजाब (१९४८), उत्तर प्रदेश (१९५३ और १९५८), पं. बंगाल (१९५५), बिहार तथा हैदराबाद (१९५६) शामिल हैं। प्रांतीय सरकारों को केंद्रीय सरकार द्वारा बहुत प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। तीनों पंचवर्षीय योजनाओं में चकबंदी के विस्तार का आयोजन किया गया और मई, १९५७ में भारतीय सरकार ने यह घोषणा की कि वह राज्यों का चकबंदी कार्य लागू करने के लिये बहुत सीमा तक आर्थिक सहायता देने के लिये सहमत है। चकबंदी कार्यक्रम के विकसित आवेश को इस तथ्य से जाँचा जा सकता है कि जहाँ मार्च, १९५६ में अंत तक भारत का कुल चकबंदी क्षेत्र ११०.०९ लाख एकड़ था वहाँ मार्च, १९६० के अंत तक बढ़कर २३०.१९ लाख एकड़ हो गया तथा उसी समय १३१.८७ लाख एकड़ क्षेत्र पर चकबंदी कार्य चल रहा था। किंतु विभिन्न प्रांतों में ये काम असंतुलित ढंग से हो रहा था। मार्च, १९६० में चकबंदी किए हुए क्षेत्र का आधे से भी अधिक भाग पंजाब प्रांत में (१२१.०८ लाख एकड़) स्थित था, जबकि बड़े प्रांतों- जैसे आ्ध्रा, मद्रास, बंगाल और बिहार में चकबंदी क्षेत्र या तो बिलकुल शून्य था या नगण्य।

स्पष्टतया उस क्षेत्र में चकबंदी करना सरल कार्य नहीं है जहाँ भूमि में मुख्यत: सजातिता का गुण नहीं है। इसके लिये सदैव बहुत संख्या में प्रशिक्षित (और ईमानदार) अधिकारी चाहिए। दुर्भाग्यवश अनिवार्य बाध्यता ने इसे काश्तकारों में अधिक लोकप्रिय नहीं होने दिया और जितने अच्छे परिणामों की आशा थी उतने अभी तक प्राप्त नहीं हुए, बल्कि आशंका इस बात की रहती है कि चकबंदी के बाद तक फिर से विभाजित न हो जायें। इसलिये कुछ प्रांतों में, उदाहरणार्थ उत्तर प्रदेश में, चकबंदी किए हुए क्षेत्र को उपभोग, विक्रय एवं हस्तांतरण करने से रोकने के लिये विशेष नियम बनाए गए हैं। किंतु अन्य प्रांतों जैसे पंजाब में अभी यह नियम नहीं लागू किए गए हैं तथा कुछ प्रांतां ने अभी तक इसपर विधिवत्‌ विचार भी नहीं किया है (१९६२)।

धन्यवाद

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 12
कुछ बीती ऐसी बातें जो दिल को कचोटती रहती हैं
ना चाह कर भी दिल में क्यों वो घर सा कर जाती हैं

......... ध्यानी
#बालकृष्णडीध्यानी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 11 · Edited
ना धुप ना छाँव
ना सुबह ना शाम
ना मानव ना जानवर
ना अस्त्र ना शस्त्र
ना जमीन ना आसमान
अब प्रकट व्हैजा महराजा

हे कुल देबता नरसिंगा मेरु सेवा लिंवा महराजा सब थै सुखि सुफल रख्याँ देब्तों मेरा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
May 10
इस दुनिया में क्या रखा है

इस दुनिया में क्या रखा है
एक जमी ,एक आस्मां रख़ा है

टूटे खाव्ब हैं टुटा दिल है
एक समंदर एक आस रखी है

मकड़ी सा जालों मे घिरा है
अपने ही उधेड़ बुन मे लगा है

रंगों को रंगता रहता है
परया है वो पर अपना लगता है

सपने झूठे हकीकत झुठा
अपने फरेब में वो फंसा रहता है

एक समा बस जलती बुझती है
कारवां जिंदगी गुजरता रहता है

इस दुनिया में क्या रखा है
एक जमी ,एक आस्मां रख़ा है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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