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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
April 18
खाली खाली

होने लगे हैं खाली खाली
मेरे पेड़ मेरे पहाड़ मेरी नदीयाँ सारी
रहा ना इस गढ़ का कोई सवाली
छोड़ के चली जा रही कंहा इसकी जवानी
होने लगे हैं खाली खाली
मेरे पेड़ मेरे पहाड़ मेरी नदीयां सारी

ना समझे है मेरे मूल निवासी
क्यों छाई दूर तक शांत और ये गहरी उदासी
बैठे सदियों से इंतजार की वो राहें
खाली खली हैं बस वो मेरी दो निगाहें
होने लगे हैं खाली खाली
मेरे लोग मेरे अपने मेरे वो सपने

छटपटा रहा हूँ मैं अपने अस्तित्व को
कर दिया है अपनों ने ही अकेला मेरे वजूद को
खून की धार बही थी कभी मेरे अपने शहीद हुये थे तभी
उनके सपनों संग मै अब भी खाली खाली
होने लगे हैं खाली खाली
मेरे लोग मेरे अपने मेरे वो सपने

होने लगे हैं खाली खाली
मेरे पेड़ मेरे पहाड़ मेरी नदीयाँ सारी
रहा ना इस गढ़ का कोई सवाली
छोड़ के चली जा रही कंहा इसकी जवानी
होने लगे हैं खाली खाली
मेरे पेड़ मेरे पहाड़ मेरी नदीयां सारी

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
April 17
अश्क ही अश्क है

अश्क ही अश्क है ,इस दुनियादारी में
कोई रह गुजर ना ,इस खुमारी कि बिमारी में
अश्क ही अश्क है ......

टप टिप टप टिप करते बिना कारण बहते
रोक सके ना कोई कैसा ये सबब इस दुनियादारी में
अश्क ही अश्क है ......

बस इतनी जुबानी है,दो लफ्जों की कहानी है
समझे सब पर कह ना पाये इस दुनियादारी में
अश्क ही अश्क है ......

आँखों ने आँखों से , कुछ कहा तो होगा
दिल ने सुनकर अनसुना किया इस दुनियादारी में
अश्क ही अश्क है ......

अश्क ही अश्क है ,इस दुनियादारी में
कोई रह गुजर ना ,इस खुमारी कि बिमारी में
अश्क ही अश्क है ......

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
April 16
मै आया हूँ और यंहा से चला जाऊंगा

मै आया हूँ और यंहा से चला जाऊंगा
दो पल रोक कर भी मै यंहा क्या पाऊँगा

चलती-थमती है तूने दी ये हस्ती मेरी
बस आगे ही दौड़ती है मुझ से ये जिंदगी तेरी

मोह इससे लगा कर मै यंहा तो फंस जाऊँगा
दो पल रोक कर भी मै यंहा क्या पाऊँगा

थामता हूँ जितना भी उसे वो तो छूट जाती है
हाथों की लकीरों से रेत की तरहं सरक जाती है

संवारना जितना चाहूँ उतना ही उलझ जाती है
दो पल रोक कर भी मै यंहा क्या पाऊँगा

तकदीर मेरी ऐसे ही अब तो बिखर जाती है
भटकते भटकते आहें और राहें गुजर वो जाती हैं

दीपका आस का जलना मगर तुम नही भूलती
दो पल रोक कर भी मै यंहा क्या पाऊँगा

मै आया हूँ और यंहा से चला जाऊंगा
दो पल रोक कर भी मै यंहा क्या पाऊँगा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
2 hours ago
वोट मांग रहा देश तेरा

उस एक ऊँगली में मेरा एक निशान
बने मेरे देश की वो सुनहरे भविष्य की पहचान

लगा ले अपने कर्म की स्याही
जो तूने किया उम्र १८ साल की दहलीज पार

वो तेरा अधिकार है वो कर्तव्य है तेरा
भारत के सविधान ने किया है तुझ से आह्वान

बने उस दल की सरकार
जो बनाये भारत की एक अलग पहचान

अग्रसर रहे देश मेरा यूँ ही
हाथों से हाथ मिलते चले सब धर्म एक साथ

तो चल हो जा तयार
वोट मांग रहा देश तेरा दे दे तेरा वक्त आज देश को यार

उस एक ऊँगली में मेरा एक निशान
बने मेरे देश की वो सुनहरे भविष्य की पहचान

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
9 hours ago
जोड़ों मै

शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै
घटाने की तरह घटती जिंदगी कैसे छोड़ूँ मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

जोड़ जोड़कर खड़ा किया उसे कैसे तोड़ूँ मै
घटती किस्मत की लकीरों को कैसे मोड़ों मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

दोनों मिलता नही एक साथ-साथ में कभी
क्या छुपा के रखा जिंदगी ने मेरे इन हाथ में
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै....

जोड़ा जो एक दिन छोड़कर चले जाना है
ऐसे जोड़ जोड़कर भला तुझे क्या पाना है
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै
घटाने की तरह घटती जिंदगी कैसे छोड़ूँ मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
April 23
मेज मेरी

लकड़ी के वो चार खुटे
मेरे ख्वाबों के वो बूटे
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

सोच जन्मी वंही
वंही मेरी कल्पना बड़ी
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

आयताकार विचारों से घिरे
मेरे ख्वाबों के वो गुलदस्ते
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

कभी गीत कभी गजल
कविता के वंहा मेरे बीते पल
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

रहना मेरे संग यूँ ही उम्र भर
लिखता रहूंगा मै तुझ पे पल पल
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

लकड़ी के वो चार खुटे
मेरे ख्वाबों के वो बूटे
मेज मेरी, तू प्रीत मेरी

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
5 hours ago
उदास कमरें में

काफी चहल-पहल है दिल के उदास कमरें में
अभी अभी किसी ने दस्तक दी है उसी कोने में
काफी चहल-पहल है दिल के उदास कमरें में

बड़े दिनों के बाद आज कोई यंहा पर भटका है
भुला है वो रास्ता या फिर उसका गम मेरे जैसा है
काफी चहल-पहल है दिल के उदास कमरें में

बैठा अब भी वंहा जब से आया वो इस हिस्से में
निकल ने की कोशिश की पर मै हरा अपनी किस्मत से
काफी चहल-पहल है दिल के उदास कमरें में

अब तो रास आने लगा है उसको ऐसे जीने में
दरवाज दोनों बंद करके इस दिल के उदास कमरें में
काफी चहल-पहल है दिल के उदास कमरें में

एक उत्तराखंडी

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वोट मांग रहा देश तेरा

उस एक ऊँगली में मेरा एक निशान
बने मेरे देश की वो सुनहरे भविष्य की पहचान

लगा ले अपने कर्म की स्याही
जो तूने किया उम्र १८ साल की दहलीज पार

वो तेरा अधिकार है वो कर्तव्य है तेरा
भारत के सविधान ने किया है तुझ से आह्वान

बने उस दल की सरकार
जो बनाये भारत की एक अलग पहचान

अग्रसर रहे देश मेरा यूँ ही
हाथों से हाथ मिलते चले सब धर्म एक साथ

तो चल हो जा तयार
वोट मांग रहा देश तेरा दे दे तेरा वक्त आज देश को यार

उस एक ऊँगली में मेरा एक निशान
बने मेरे देश की वो सुनहरे भविष्य की पहचान

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
April 24
जोड़ों मै

शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै
घटाने की तरह घटती जिंदगी कैसे छोड़ूँ मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

जोड़ जोड़कर खड़ा किया उसे कैसे तोड़ूँ मै
घटती किस्मत की लकीरों को कैसे मोड़ों मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

दोनों मिलता नही एक साथ-साथ में कभी
क्या छुपा के रखा जिंदगी ने मेरे इन हाथ में
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै....

जोड़ा जो एक दिन छोड़कर चले जाना है
ऐसे जोड़ जोड़कर भला तुझे क्या पाना है
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै
घटाने की तरह घटती जिंदगी कैसे छोड़ूँ मै
शब्दों के जोड़ में खुद को जोड़ों मै

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
पहाड़ बचपन

बचपन रूठा रूठा
कुछ छूटा कुछ टूटा
बचपन रूठा रूठा

कोना एक खाली था
कोना वो अब भी खाली है
बचपन रूठा रूठा

छोड़ कर गये कंहा
बाबाजी वो मेरे मुझसे
बचपन रूठा रूठा

खोया खोया बैठा हूँ
खोजों अब उनको कैसे
बचपन रूठा रूठा

पहाड़ का बचपन
हर घर मे बना ये वन
बचपन रूठा रूठा

खोजती निगाहें है
बोलती ये मेरी बाहें हैं
बचपन रूठा रूठा

आ जाओ बाबाजी मेरे
आँगन यंहा अब भी सुना है
खिलौन वो रूठा टूटा है

बचपन रूठा रूठा
कुछ छूटा कुछ टूटा
बचपन रूठा रूठा

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