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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
April 9
मै पहाड़ी

मै पहाड़ में रहने वाला हूँ
मै पहाड़ी हूँ

गिरिपाद के राह हमारी
शैल कि तरह निगाह हमारी

मै पहाड़ में रहने वाला हूँ
मै पहाड़ी हूँ

पर्वतश्रृंखलाओं ये दरवाजे मेरे
अटखेली लेती नदियाँ बाहें मेरी

मै पहाड़ में रहने वाला हूँ
मै पहाड़ी हूँ

राग पहाड़ी,विलुप्त बोलीयां
बोल पहाड़ी किस ओर जायें

मै पहाड़ में रहने वाला हूँ
मै पहाड़ी हूँ

कठनाई भरी डगर हमारी
झुंज रहा अकेला मै पहाड़ी

मै पहाड़ में रहने वाला हूँ
मै पहाड़ी हूँ

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बैठी तू उदास

बिमला आच किले होली बैठी तू उदास
झण् क्य व्हाई बात बिमला किले छे तू उदास
सरगा मा टक टकि लगे कया खोज्णी नि च आच
बिमला आच किले होली बैठी तू उदास

बोलि दे ना गम-सुम रै जिकोड़ी की भेद उमली दे
कया झुराणु ते थे कु रुळुनु ते थे आपरी ये गिच से बोलि दे
ना रूस तू ना झुरु तू ना अपरू से ना व्है इनि दूर तू
इनि कडक्स ना कैर बिमला ना इनि बैठ दूर तू
बिमला आच किले होली बैठी तू उदास

कंठ मेरु तिसी गेलो पिला दे छुईं की मीठी धार
गिचे नि गिची मेरी किले होली बैठी च आच तू शांत
ना साते ना खिजे चुचि कनि पट ना मि मोरी जोंलों आच
दे दे मेरा स्वासों थे तू सांस बिमला ना इनि बैठ दूर तू
बिमला आच किले होली बैठी तू उदास

बिमला आच किले होली बैठी तू उदास
झण् क्य व्हाई बात बिमला किले छे तू उदास
सरगा मा टक टकि लगे कया खोज्णी नि च आच
बिमला आच किले होली बैठी तू उदास

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

सबि यक बिकयां छन

सबि यक बिकयां छन,बिकयां छन
ढुंगा गारा धारा छाला बिकयां छन

क्वी नि यक कै कु वि सबी बिखरयाँ छन
कूड़ा गौंऊ अपरा पराया बिखरयाँ छन

गढ़ देश कु क्वी नि रयुं यक रै-गुंसाईं
ध्यानी सबी अपरा अपरा मन्ख्यों दगडी लग्यां छन

कैल सुचण यक कैल बिगण कैल ऐकन मेरु
यक की खैरी विपदा पीड़ा कैल भोगण यक

यक बाट ऊँ यकुल्या बाटा ऊ बणयां
जोड़ा चप्लों का चढ़े की कैल बौडी ऐन

मि त लग्युं रोंलो तुमरि जिकोड़ी झुरुलु
ऐ बी जालु क्वी परती की बस इनि बाट हेरलु

सबि यक बिकयां छन,बिकयां छन
ढुंगा गारा धारा छाला बिकयां छन

क्वी नि यक कै कु वि सबी बिखरयाँ छन
कूड़ा गौंऊ अपरा पराया बिखरयाँ छन

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 10
फिर किले तू इन जीणु

फिर किले तू इन जीणु
फिर किले तू इन मरणु
दीकि ले तिल ई दुनिया थे ......२
कैका बाना कु जीणु,कैका बाना कु मरणु यख
फिर किले तू इन जीणु

ना भै ना रैगे यख पैल जण कुच बि यख
बदलणी जींदगाणी बगदी जनि गंगा कि धारा
तू बि बदल दे अपरा थे
अपरा अंखियुं का सुप्निया थे
फिर किले तू इन जीणु

दैल फ़ैल का गैल च सब यख
अपरा अपरा किसमती न घैल च सब
जीयु कि नि सुणदा अब क्वी यख
बस जी टक्कों का घोळ च सब
फिर किले तू इन जीणु

फिर किले तू इन जीणु
फिर किले तू इन मरणु
दीकि ले तिल ई दुनिया थे ......२
कैका बाना कु जीणु,कैका बाना कु मरणु यख
फिर किले तू इन जीणु

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा म्यारा डाँडों-कांडों मा
घिर घिर झिर झिर ऐगे म्यारा आँखिंयों मा
चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

बैठी छ सौंजड्या मेर बाटों माँ मेरा सान्युं मा
हेर् दी घेर दी माया मेर बाँध राखि विं न ऊँ माया कि गेड़ीयों मा
चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

ऐ जांदी कबि सुरक कबि झणमण म्यारा स्यारों मा म्यारा डालियों मा
चाखल पाखाल कै जांदी सैरभैर गढ़देश कु ढुंगा गारों मा
चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

जिकुड़ी कि कैल सुणि जिकुड़ील काब कया पाई म्यारा ध्यानियों मा
धैल फ़ैल पाणा कुन छुड़गे तू ई बरखा थे यख यूँ रूलणयों मा
चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा म्यारा डाँडों-कांडों मा
घिर घिर झिर झिर ऐगे म्यारा आंखोयुं मा
चौमासी बरखा मेरा पाड़ों मा

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
April 3
अमरुद कि दाणी हो

अमरुद कि दाणी हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो
याद ऐगे कया लठ्याळ ....2
तेरे बिसरी कहाणी हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो

कच्चा पक्यां ऊँ डलियुं मा
कच्चा पक्यां ऊँ डलियुं मा
ढून्गू चुलुयुं ऊँ दाणीयों ....2
झँपा जख खिली हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो

मीठी मीठी रशिलि दाणी हो अ हो
मीठी मीठी रशिलि दाणी हो
मेरु बाल पणा कि निशाणी....2
क्ख्क गैनि वो दिन फुर आग लगे ईं जवानी थे हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो

कखक अब ढूंगा चुलु मी हो अ हो
कखक अब ढूंगा चुलु मी हो
नि रैगै यख वो गेल्या अब ....2
ऊँ कि खुद बल आन्दी जान्दी हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो

अमरुद कि दाणी हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो
याद ऐगे कया लठ्याळ ....2
तेरे बिसरी कहाणी हो अ हो
अमरुद कि दाणी हो

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भूख बढ़ती रही प्यास बढ़ती रही

भूख मिटती नही प्यास बुझती नही
ये गरीबी की लौ क्यों बुझती नही

उम्मीद कि लौ अकेली लड़ती रही
जनांदोलन दे साथ फड़फड़ाती रही

अकेली थी अकेले पथ पर चलती रही
सफेद धोखे पे धोखे वो खाती रही

डगर ना मिली उसे जिसे वो ढूॅंढती रही
भूख बढ़ती रही प्यास बढ़ती रही

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

जय हनुमान

राम नाम धुन ये संसार
पतित पावन बोलो जय हनुमान

लगा छलांग लंका पार
हे मारुती नंदन कर दे बेड़ा पार

लूम लपेटी अहम जरावा
फूँक दो हमारे अहम को वानर राज

अंजनी पुत्र बोलो जय श्री राम
राम सीया संग विराजो ये हिर्दय भगवान

राम नाम धुन ये संसार
पतित पावन बोलो जय हनुमान

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
जय हनुमान

राम नाम धुन ये संसार
पतित पावन बोलो जय हनुमान

लगा छलांग लंका पार
हे मारुती नंदन कर दे बेड़ा पार

लूम लपेटी अहम जरावा
फूँक दो हमारे अहम को वानर राज

अंजनी पुत्र बोलो जय श्री राम
राम सीया संग विराजो ये हिर्दय भगवान

राम नाम धुन ये संसार
पतित पावन बोलो जय हनुमान

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बालकृष्ण डी ध्यानी
April 13
मन हो तो

मन हो तो आ जाओ
बात मेरी तुम सुन लो .....२
मन हो तो .......

देखो ना अगर सुनना हो
बस आ कर सामने से गुजर जाओ
इतनी सी तो ये आरजू है
यूँ ना तुम मुकर जाओ

मन हो तो आ जाओ
बात मेरी तुम सुन लो .....२
मन हो तो .......

बैठ हूँ तेरे सहारे के लिये
अपने सभी बहाने लिये
रोक अगर लों तुम्हें एक पल भी
मिल जायेंगे जिंदगी के किनारे मेरे

मन हो तो आ जाओ
बात मेरी तुम सुन लो .....२
मन हो तो .......

एक उत्तराखंडी

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