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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 22
मेरी लिखी गजल

मैखाने सजती रही वो मेरी लिखी गजल,
मय साथ वाह वाह लुटाती रही वो मेरी गजल ।

दर्द मेरा बहता रहा पैमाने संग छलक छलक,
मध्यम रोशनी में गीली होती रही गमगीन वो लहक ।

पल पल मदहोश होता रहा समा दिल धड़क धड़क.
होश खोता रहा बस कि मैं रोता रहा वो पहर सहर।

चंद हसरतों की जमी थी दिल पर वो एक टूटी परत,
आँख को मलती रही गजल मेरी वो बहती ही रही ।

मैं कुछ कह नही पाया उस वक्त को सह नही पाया,
बात अक्षरों में लिखी जब मैंने वो बन गयी मेरी गजल ।

मैखाने सजती रही वो मेरी लिखी गजल,
मय साथ वाह वाह लुटाती रही वो मेरी गजल ।

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 21
अपने हरम में

अपने हरम में वो बेरहम
बहे बस तेरे वो यादों के गम

एक एक पल मेरा
गुजरा वो तेरे संग
वो हर तेरी कही बात
अब भी मेरे संग

अपने से लिपटे रहते हैं वो अब भी
तू लिपटी अब गैरों के संग

टूटता है वो दिल
ना अब जोड़ सकेगा
तेरा दिया जख्म
पल पल मुझसे कहेगा

खुश रहे तू सदा दे दे और वो तेरे गम
हम रहे ना रहे ख़ुशी से खिले तेरा चमन

गुजरिश है इतनी
याद गर आ गये हम
अपनी ये सुंदर आँखें
ना करना तुम कभी नम

अपने हरम में वो बेरहम
बहे बस तेरे वो यादों के गम

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 21
ऐसे मै अपना दुःख हल्का करता हूँ

बैठा कर अकेले में
ले के बीते दिनों के सुख-दुःख के झमेले को
अपने से एकांत में खुद से ही बतियाता हूँ
ऐसे मै अपना दुःख हल्का करता हूँ !

खो जाता हूँ अपने सवालों में
अनगिनत अनसुलझे अपने ही विचारों में
उस उत्तर कि आस में मैं अपने आसूं में भीग जाता हूँ
ऐसे मै अपना दुःख हल्का करता हूँ !

बस सिसक निकलती है दिल से
अपने में संभल पाता है वो बड़ी मुश्किल से
लड़ने खड़ा होता है फिर से वो आने वाले कल से
ऐसे मै अपना दुःख हल्का करता हूँ !

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 20
बस वो चेहरे

हमने अपने पलकों के पीछे समंदर को छुपा रखा
छेड़ो ना लहरों को कंही तुमको वो बहा ना ले जाये

गुमनाम खो गया
खामोश चीख पुकारती रही

रंग बदलते रहे बस वो चेहरे
उनका भाव मेरी समझ से परे

अपना अपना सा लगा था
वो अपने में लगा रहा

गुमनाम खो गया मै
खामोश चीख पुकारती रही

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
March 19
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

हर पग लड़ना गर तुझे कुछ करना है
उन्हें सदा तेरे पास-पास साथ रख अगर आगे तुझे बढ़ना है
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

आगे-पीछे दांयें-बाएँ , मीठे शब्दों के जो बाण चलाये
ऐसे मुख को सदा परे रख अनदेख कर तू उसे छोड़ आगे बढ़
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

अपने तक ना सीमित रख साँसे, अश्रु तेरा गर जो तेरे समुख बहा दे
वो ही सच्चा है तेरा फूल में नही जो तुझे काँटों पे चलना सिखा दे
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

कैसे पता चलता है अंतर कर अपने मन का तो अब मंथर
अन्धेरा फिर प्रकाशित होगा कड़वा शब्द एक दिन वो मीठा होगा
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

एक उत्तराखंडी

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

लाली लाली बुराँस

लाली लाली बुराँस
खिली ऊँ डंडियों डालियों मा बोई झम

खुद आणि रुळणी
आँखि गाणी आंसूं कि धारा बोई झम

लाली लाली बुराँस
खिली ऊँ डंडियों डालियों मा बोई झम

मेरु कण ये भाग रूठो
यकुली बैठयूँ सात समुदर पार बोई झम

लाली लाली बुराँस
खिली ऊँ डंडियों डालियों मा बोई झम

खैर पीड़ा विपदा का गैना
बोई बाबा दोई भै चारा भैना बोई झम

लाली लाली बुराँस
खिली ऊँ डंडियों डालियों मा बोई झम

देक मेरु बाटू हेर मेर दगड़या
खिली ऐ चैता बुराँस मी आनु घार बोई झम

लाली लाली बुराँस
खिली ऊँ डंडियों डालियों मा बोई झम

एक उत्तराखंडी

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मेरु रुमाला

छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा
बिंग नि पाई यूँ नजरि कि भासा ,ऊ पौड़ी बजारा
छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा

नि देक पाई मि पौड़ी बहारा ,ऊ पौड़ी बजारा
बस दीकि मि न सुर्म्याली आंखी कु नजारा ,ऊ पौड़ी बजारा
छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा

देकि तिन कब छूटी म्यार हाथों न रुमाला ,ऊ पौड़ी बजारा
संभली नि संभली जियु अब तेरा हवाला ,ऊ पौड़ी बजारा
छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा

अंदी रैंद याद तेर मेरु छुट्यूं रुमाला ,ऊ पौड़ी बजारा
आजा भेंटी जा मी थे दे जा म्यारु छुट्यूं रुमाला ,ऊ पौड़ी बजारा
छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा

छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा
बिंग नि पाई यूँ नजरि कि भासा ,ऊ पौड़ी बजारा
छुची छूटगे मेरु रुमाला,ऊ पौड़ी बजारा

एक उत्तराखंडी

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सुख-दुःख

सुख-दुःख
आणा जाणा राला
गित गितेर लगाणा राला
सुख-दुःख
आणा जाणा राला

भौळ कि वा पीड़ा-खैरी
ब्याल जों बिती अपरि मा
अब नि लगनि वा गैरी
सुख-दुःख
आणा जाणा राला

देर-अबैेर हुन्द रैंदु जी
बगता कि च ई फेरी
अग्ने पिछ्ने लंगी रंगा
किरमुला विं गुड़ा कि ढेली
सुख-दुःख
आणा जाणा राला

हरी कि दुनिया च
हरी ही अब दयाखळा
सब कुच दे दे हरी मा
तेर विपदा कु थौलू
सुख-दुःख
आणा जाणा राला

एक उत्तराखंडी

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खुदेणु खुद

कु भुलु च जपान
कु च इंग्लिस्तान मा
खुद ऐंदी रेंदी दीदा
हम थे बि उत्तराखंड कि

आंदू मैंना चैत कु
फूली फूली मनखी डाली
दूर बैथिकि जियु मेरु
किले तू यकलू खुदेणु

वख खिलि रे जिकुड़ी
बुरांस जनि तेर मुखडी
कंडू ऊंदरु दौड़ी पोटगी
चमकिण रे उकाळु बिंदुली

ना च वो बात यख बहरेन मा
दुबई मा बि निंदी नि आंदी रात
जण आंदी निंदी मिथे म्यारा पहाड़
म्यारा घार कुमो -गढ़वाल मा

कु भुलु च जपान
कु च इंग्लिस्तान मा
खुद ऐंदी रेंदी दीदा
हम थे बि उत्तराखंड कि

एक उत्तराखंडी

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होली ऐगेनी

डंडा कांडा रंगों न रंगीनी
गौं गौं होल्यारों कि टोली ऐगेनी
छे गे रंगमत रंगों बहार
पाड़े फागुन कि मची च उल्ल्यार
डंडा कांडा रंगों न रंगीनी.........

मनखी मनखी फुलेगेनी
डालियों डालियों मा ऊ चढ़ेगेनी
सबु कि ग्लोडी लाल व्हेयगेनी
बुरंस जनि वा खिलेगेनी
डंडा कांडा रंगों न रंगीनी.........

ढोलकी क्ख्की थकलो बजेनी
कखक पांडों का रसा मा नाच नचेनी
गीतों कि कखक रस्यांण लगिगेनी
कखक गिची दगड़ी सियों कि बरखा बरखेनी
डंडा कांडा रंगों न रंगीनी.........

क्वी यकुली बैठी हॉली खुदेनी
बिता पाखी का फुलों थे गेड़णी
हेरदी आंखी होली बाटू मा रुंआसी
कु आणू व्हालू बोई देक ये दुरेनी
डंडा कांडा रंगों न रंगीनी.........

डंडा कांडा रंगों न रंगीनी
गौं गौं होल्यारों कि टोली ऐगेनी
छे गे रंगमत रंगों बहार
पाड़े फागुन कि मची च उल्ल्यार
डंडा कांडा रंगों न रंगीनी

एक उत्तराखंडी

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