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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 6
बेरोजगारी

ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर
मिल जाते है रोज वो अब हमको
छोड़े थे हमने
वो जिस राह जिस पथ पर
ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर........

मिलती है रुसवाईयाँ पड़ी वंहा पर
बंद फाइलें टकटकी लगाती हर जगहा पर
मोड़ आया मैं मोड़ गया
तकदीर है कि वो मगर मोड़ती नही है
ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर........

हताश है दिन हताश है रातें
बेरोजगारी खटकती रहती है दरवाजे
हर पल बजती है वो ही धुन अब तो
दिलो दिमाग को अब वो सूना करती
ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर........

ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर
मिल जाते है रोज वो अब हमको
छोड़े थे हमने
वो जिस राह जिस पथ पर
ढूंढते रहते हैं हम तो
अपने निशाँ कदमों के अक्सर........

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

March 5

ये मेरी झँपा

बस
इतनी सी देरी
हो गयी खफा
ये मेरी झँपा
तू क्यों बथा
बस इतनी सी देरी
हो गयी खफा

घास के गेड़ी
अब तो खुला
कै डालु लटी च
ई रुसेली पोटली
कै बाटा मा बथा
कब तू हंसली ये तो बता
बस इतनी सी देरी
हो गयी खफा

ना रूस ना रूस
ना ईं जिकुड़ी ते तू दुखा
ना बैठी यकुली
ना मेरु जियु यु झुरा
छुईं लगा मेर छुयेंडि
अब त ये गुस्सा थूक दे या
बोल्युं मान मेरी झँपा
मान जा या
बस इतनी सी देरी
हो गयी खफा

बस
इतनी सी देरी
हो गयी खफा
ये मेरी झँपा
तू क्यों बथा
बस इतनी सी देरी
हो गयी खफा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी

... वो प्रेम है

सवेरे आँखें खोलने से पहले
जिसका चेहरा को देखने का मन होता ... वो प्रेम है

मंदिर में भगवान के दर्शन करते हुये
जिसका पास होने का अहसास होता है ... वो प्रेम है

जिसके कंधे पर सर रख कर
पुरे दिन की थकान दूर हो जाये ऐसा लगता है ... वो प्रेम है

जिसके गोद में सर रख कर
मन खुला खुला सा होने लगता है ... वो प्रेम है

खुद को कितना भी दर्द हो
लेकिन जिस के ये दिल ख़ुशी माँगता ... वो प्रेम है

जिस को लाख भुलाने मन करता है
पर उसे वो भूल नही पाता है ... वो प्रेम है

परिवार के फोटो में माँ पिताजी के संग
जिसका फोटो होना चाहिये ऐसा लगता है ... वो प्रेम है

वो प्रेम है जिसकी भूल में गुस्सा
नही बस प्यार आता है ... वो प्रेम है

ये पंक्तियाँ पड़ते समय प्रत्येक
पंक्ति में जिसकी याद आयी तुम्हे ... वो प्रेम है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
तेरी तरनुम में

तेरी तरनुम में भीगे हम इस तरंह
होश ना रहा अब तो आक़िबत तक हमें ये खुदा

आग़ाज था अंत का उस आंच के सरर में
मोहब्बत कहते हैं लोग वो मरज़ हमको हुआ

आंचल किनारे कोने ने रुसवाईयाँ से गुफ़तगू कि
आफ़त का वीराना मेरा लिये वो आबाद हो गया

अख्ज़ फ़रिश्ते दबोचने आ गये दोजख से मुझे
अदम रहा मैं अपने आखरी अन्जामे सफर तक

तेरी तरनुम में भीगे हम इस तरंह
होश ना रहा अब तो आक़िबत तक हमें ये खुदा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
March 10
सब लगाते

सब लगाते आरोप यंहा
ऊँगली उठती अब आमने सामने

कौन सोचेगा कौन समझेगा
बस सत्ता का खेल यंहा चल रहा

नाच रही है आम बिना दाम ही
मदारी बने सफ़ेदपोश खड़े यंहा

कान,मुंह बंद आँखों में पर्दा पड़ा
सदियों से मन एक प्रश्न उठ रहा

होगा हल इस प्रश्न का इस हाल में
चल मन वोट करें अपने कर्म का

सब लगाते आरोप यंहा
ऊँगली उठती अब आमने सामने

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी 


माँ एक नई कहानी

माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२
वो ही राजा तेरा माँ वो ही तेरी रानी
बात है माँ ये तो सदियों पुरानी
सुन सुन कर मैं थक गया हूँ माँ
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

कुछ अच्छी सी कुछ पक्की सी
आज के संदर्भ में वो लिखी सी
सुनकार वो मुझे नया सा लगे
अपना ना हो पर भी अपना सा लगे
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

कल्पना से दूर कंही माँ मेरी
आज मुझे हकीकत से मिला दे
रेशमी पलंग नही सोना माँ मेरी
अब अंगारों में चलना सिखा दे
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२
वो ही राजा तेरा माँ वो ही तेरी रानी
बात है माँ ये तो सदियों पुरानी
सुन सुन कर मैं थक गया हूँ माँ
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

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बालकृष्ण डी ध्यानी

***
प्रणाम
***********
गर फ़साने लिखे जायेंगे
ध्यानी उन में क्या हम नजर आयेंगे
जिक्र भी गर आया मेरा तो ये रब
सकुन से हम चले जायेंगे
बस रंज तो इतना रह गया
किसी के काम ना आ सके
गर फ़साने लिखे जायेंगे
उन में क्या हम नजर आयेंगे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
21 hours ago
इस बार होली में

हर एक एक के मैंने रंग देखे
रंग में मिले हमने कई बिखरे रंग देखे
मिले जैसे रंग घुले होली में
ना मिले रंग कभी उस चोली में

एक रंग है अकेला आदम का
मन बदले उस मन कई रंग दबे दिखे
वैसे तू रंग है शून्य इस भ्रमांड में
भ्रान्ति कभी उल्हास में वो घिरे पड़े

कभी ख़ुशी के कभी दुःख के रंग
कभी उस पानी कि बौछार में वो बहे
ना दिखे रंग गरीबी के किसी को
आँखा होकर भी वो अकेले लुप्त रोये

चाहूं ऐसे रंग इस होली में अब
ना उतरे सारी उम्र तेरे तन मन
मिले दिल से दिल तन से तन
ऐसा भाई चारा रहे मेरे वतन

हर एक एक के मैंने रंग देखे
रंग में मिले हमने कई बिखरे रंग देखे
मिले जैसे रंग घुले होली में
ना मिले रंग कभी उस चोली में

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
March 12
मै अतृप्त अब भी

मेरे खोये...... रोये जज्बात में लगी है आग .......२
आ देख ले मेरे पहाड़ों में मिलेगी मेरी वो पड़ी बुझी राख

अब भी जल रहे हैं वो ख्वाब जो कभी देखे थे मैंने
अकेले अकेले ही वो अब भी संग मेरे हैं चल रहे

मेरे खोये...... रोये जज्बात में लगी है आग .......२
आ देख ले मेरे पहाड़ों में मिलेगी मेरी वो पड़ी बुझी राख

उजाड़ा बंजर सुखा उखड़ा सा अब भी मैं पड़ा यंहा
प्यासा सदियों से मैं अतृप्त अब भी तड़प रहा यंहा

मेरे खोये...... रोये जज्बात में लगी है आग .......२
आ देख ले मेरे पहाड़ों में मिलेगी मेरी वो पड़ी बुझी राख

दहका था कभी वो लहका था उत्तराखंड आंदोलन में
पर जो सोचा था ना पाया ना मिल सका अब भी मुझे

मेरे खोये...... रोये जज्बात में लगी है आग .......२
आ देख ले मेरे पहाड़ों में मिलेगी मेरी वो पड़ी बुझी राख

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
March 12
... वो प्रेम है

सवेरे आँखें खोलने से पहले
जिसका चेहरा को देखने का मन होता ... वो प्रेम है

मंदिर में भगवान के दर्शन करते हुये
जिसका पास होने का अहसास होता है ... वो प्रेम है

जिसके कंधे पर सर रख कर
पुरे दिन की थकान दूर हो जाये ऐसा लगता है ... वो प्रेम है

जिसके गोद में सर रख कर
मन खुला खुला सा होने लगता है ... वो प्रेम है

खुद को कितना भी दर्द हो
लेकिन जिस के ये दिल ख़ुशी माँगता ... वो प्रेम है

जिस को लाख भुलाने मन करता है
पर उसे वो भूल नही पाता है ... वो प्रेम है

परिवार के फोटो में माँ पिताजी के संग
जिसका फोटो होना चाहिये ऐसा लगता है ... वो प्रेम है

वो प्रेम है जिसकी भूल में गुस्सा
नही बस प्यार आता है ... वो प्रेम है

ये पंक्तियाँ पड़ते समय प्रत्येक
पंक्ति में जिसकी याद आयी तुम्हे ... वो प्रेम है

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