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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बांकी

कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा
किले बिसरांण रै
अपरी ये मुल्की पछाणा
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

दाणा दाणा का कथन
बाँधी ले सयाना
सिरणु का गेड़ा मा
मारी रखी बुद्धि मकाना
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

रै जालू तेरु कियूं धरो
अपरु बाण परायुं कारु
अगंवाल जब वा आली
ये धरा ही मोक्ष दयाली
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा
किले बिसरांण रै
अपरी ये मुल्की पछाणा
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हर जगह


रूठे रूठे नजारे लगते हैं
अब तो हर जगह
देखो तुम
खूंटे से बंधे सहारे नजर आते हैं

खिंच लाये हम को
वो अब आपको अपनी ओर
ना मिलने वाले
क्या दो किनारे नजर आते हैं

फरेब का सिलसिला
चला है अपने आप ही
अब हर तरफ बाजार में
बिकाऊ ईमान नजर आते हैं

किस को पुकारे हम
हम किस को आवाज दें
नीलाम तो हम हो रहे
अब हर कोई खरीदार नजर आते हैं

रूठे रूठे नजारे लगते हैं
अब तो हर जगह
देखो तुम
खूंटे से बंधे सहारे नजर आते हैं

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 26
किस पथ पर

पन्ना पन्ना
बोल रहा
अक्षरों संग क्या
वो डोल रहा

नींव पड़ी
ना जब तू जन्मा था
शीर्ष पर नही है क्यों
किस से पंगा था

पन्ना पन्ना
बोल रहा

मांग रही है रिहाई
अपनों से दुहाई
धूल पड़ी उन पर
बिक रही फुटपाथों में

पन्ना पन्ना
बोल रहा

नीर जल का है
अब हुआ छ्ल छल
कागज कि नाव चली
अब किस पथ पर

पन्ना पन्ना
बोल रहा
अक्षरों संग क्या
वो डोल रहा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 23 · Edited
तस्वीर

मेरी
तस्वीर के हैं दो रूप
एक स्वरूप है दूसरा अनुरूप
मेरी
तस्वीर के हैं दो रूप......................

मिल जाते हैं टंगे से
दिल दीवारों पे छपे पड़े से
बैठ के दोनों के पास मैं
मेरी
तस्वीर के हैं दो रूप......................

बाते करती मुझसे
अकेले में कभी वो तुझसे
बीते पल बीते कल मेरे
मेरी
तस्वीर के हैं दो रूप......................

आ चुरा लें उनसे कुछ
ना यूँ व्यर्थ वो सजे टंगे हैं
इस मन से वो क्यों बंटे हैं
मेरी
तस्वीर के हैं दो रूप......................

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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तू गयी जब

तू गयी जब रिमझिम
बरसात का जोर शोर था
सांसों के होंठो पर
मेरा मन हिचकोले ले रहा था

तू गयी जब रिमझिम
बरसात का जोर शोर था
प्रेम मेरा उस तालब में
अब तेरे साथ गोते ले रहा था

तू गयी जब रिमझिम
बरसात का जोर शोर था
अंधेर में वो जगमग तारा
ढुलकता झुलता मृगजल वो हवा सा भरा

तू गयी जब रिमझिम
बरसात का जोर शोर था
आकाश में मिटटी की खुशबू सा फैला
आहिस्ता बहकर ओढ़े वो तेरा गीला पन

तू गयी जब रिमझिम
बरसात का जोर शोर था
प्रेम प्रतिका तेरा साथ लिये खड़ा
मन भावना में बह रहा था

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दिल कहे

खड़ी हूँ आज वहीं पर मै
जंहा पर छोड़ गये थे तुम मुझको
दिया था दिलासा तुमने दिल को
उसी दिये को ले खड़ी हों मैं
दिल कहे
आओ अब तुम लौटकर

हर पथ पर पड़े भीगे संदेश
वो कागज अब भी गीला है
मोड़कर सिलवटें पड़ी उन पर
एक एक अक्षर उनका सिला है
दिल कहे
आओ अब तुम लौटकर

बित गये अब खड़े कितने पल
कोना कोना अब खाली है
आँखों का वो मेरा सूनापन
जीवन ने अब मेरे बुना है
दिल कहे
आओ अब तुम लौटकर

खड़ी हूँ आज वहीं पर मै
जंहा पर छोड़ गये थे तुम मुझको
दिया था दिलासा तुमने दिल को
उसी दिये को ले खड़ी हों मैं
दिल कहे
आओ अब तुम लौटकर

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दीदार

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है
दूर मेड पर हो खड़ा
वो कौन गा रहा है

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है .........

क्यों खुली है वो
आज बाहें फैला हुये
किसके दीदार मे
आज सजी हुयी है

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है .........

मिलने वाला आज
कोई बिछड़ा उसका कोई
बरसों कि उजाड़ में
आज बसंत हरयाली आयी

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है .........

दीदार में तरसी अँखियाँ
कितने बरस कि ये दूरियां
क्या जाने कब खत्म होगा
वो सपना अब हर दिन टूटा

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है .........

उन वादियों से पूछो
आज कौन आ रहा है
दूर मेड पर हो खड़ा
वो कौन गा रहा है

एक उत्तराखंडी

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कचोटता है मुझे

पहाड़ों का सूनापन
कचोटता है मुझे
वो करता है अब मुझे
कुछ लिखने को मजबूर

सूनी गलियां
सूने खेत खलिहान
सूने मन सूनी पहचान
सून होकर मांग रहा वो हक

खड़ा है वो चुपचाप
अनगिनत हाथ थे वो अब लुप्त
कंहा लगये वो अकेला पुकार
सदियों से वो खड़ा उजाड़

नदियां सुख रही है
धरती हो रही बंजर
वन रिक्त,खो रहे कंकड़
सूना है वो अब अपनों को खोकर

चलता रहेगा ऐसे गर
वो कचोटेगा अब तेरे दिल मकान
लेगा तुझसे तेरे जाने का हिसाब
अकेला जब तू खुद को पायेगा

पहाड़ों का सूनापन
कचोटता है मुझे
वो करता है अब मुझे
कुछ लिखने को मजबूर

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

पीछे उस छोर पर

अपनों को छोड़कर
रुका दिल किस मोड़ पर
मोड़ के देख देख जरा
पीछे उस छोर पर
भुला है कुछ
तू उस ओर पर
अपनों को छोड़कर
रुका दिल किस मोड़ पर
दबी दबी याद पड़ी है
चूल्हे में वो बुझी आग पड़ी है
एक दो टूटे बरतन
तेरे खिलौने
कुछ अधूरी बात पड़ी है
अपनों को छोड़कर
रुका दिल किस मोड़ पर
रूठा बचपन
छूटी झूठी जवानी
तकिया किनारे गिरा
वो आँसूं का पानी
चला सब गीला छोड़कर
अपनों को छोड़कर
रुका दिल किस मोड़ पर
अब भी कुछ साथी
इन्तजार सांस बाकी
खड़ा है वो एक ओर
तू खड़ा दूजी ओर पर
धक धक कि डोर पर
अपनों को छोड़कर
रुका दिल किस मोड़ पर
मोड़ के देख देख जरा
पीछे उस छोर पर

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

रंग उदासी का

हर जुबां चुप है यंहा
जाने कैसा दुःख है यंहा
आंख ही रोती है क्यों
अश्क से भिगोती है क्यों
समंदर है खारा खारा यंहा
जिस कोर से निकली वो धारा वंहा
हर जुबां चुप है यंहा
जाने कैसा दुःख है यंहा

मन से उभर वो गीत है
दर्द भरा क्यों छेड़ा संगीत है
गा रहा है या वो रो रहा है
दूर जा रहा छोड़ उसका वो मीत है
चाह था उसने दिल से उसे
टूट है जो वो अब छलक रहा
हर जुबां चुप है यंहा
जाने कैसा दुःख है यंहा

कैसे उसको को मनाऊँ मै
बेवफा के प्रेम में बहता जाऊं मै
रोक ना अपने को पाऊँ मै
गम को अपने कैसे छुपाऊँ मै
नीर है अब वो थमता नही
रंग उदासी का अब उतरता नही
हर जुबां चुप है यंहा
जाने कैसा दुःख है यंहा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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