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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 4
बसंत पंचमी

किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर

मिटे प्रतीक्षा के अब क्षण
गीत गया उसने मल्हार का
रंग बिरंगी रंग खिले हैं
फूलों संग भौंरें मिले हैं

ऋतु कि यह कुसुमाकर
आयी वो लेके यौवन बहार
विरह मिलन के खुले क्षण
चहुँ और हर्षित खिले मन

नवल युगागम शारदे माँ
स्वर्ग धरा सफलम् सुफलम्
रचित हो मेरे ह्रद्य सदा माँ
सुंगधित कविता प्रति पल

किरण नई उल्हास कि
छोड़ा उसने दिल बेराग का
बसंत अपनी पंचमी साथ
छा गयी इस धरा पर

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 2
ये जिंदगी

ये जिंदगी
सिखाती देती है
ये जिंदगी
पड़ा देती है
रोना जिंदगी हँसना जिंदगी है
चलना दौड़ना जिंदगी में
ये जिंदगी
सिखाती देती है

अकेले में मिला जाती है
अपनों से बेगाना कर जाती है
तो कैसी है जिंदगी
पालूं तुझे तो
तू खो जाती है कंही
ये जिंदगी
सिखाती देती है

सवेरे शाम साथ रहती है
रातों में भी तू पास रहती है
निराशा कभी आशा है
कोई नही जाने
तेरी परिभाष सही
ये जिंदगी
सिखाती देती है

सांसों से तेरा मेल कैसा
धड़कन से क्या खेल तेरा
मस्तिष्क जुडी है क्यों ऐसे
ह्रदय नसों से गुजरी रेखा
मिले ना मिले तू
ये जिंदगी
सिखाती देती है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 1
वो सुबह

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

कल्पना कि पतंग
उड़ने को बेकरार है
सीमा प्रान्त देश सारे
बंधन को तोड़कर

खुले आकाश में
विचरण करने को
ऊपर निचे दाँयें बांयें
उड़े खोल के बांहे

डोर जोड़ी जोड़कर
मोड़े कलम अपनी
मोड़े उस छोर पर
बैठा आज सोचकर

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 31
ठेला मेरा

मेरा भी
ठेला लगा है
राग-द्वेष छोड़ो
बस प्रेम से
ही वो चला है

मट्टी का
घड़ा है वो
शीतल जल से
भरा है वो

त्प्त ना इसे
इतना किया करो
भाप बन शीघ्र
कंही उड़ जाये ना वो

आंसूं को
अब लगाम दो
एक मुस्कान से
अब जीवन संवार दो

मुफ्त सेवा है ये
ले लो जितना
उतना बड़ा मेवा है
हर वक्त खुला
मेरा ठेला है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
5 hours ago
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२
चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

रिश्तों कि यंहा कभी जंजीर जुडी थी ....२
टूटी अब वो रिश्ते मिले पड़े बिखरे बिखरे
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

कैसे संभले कैसे संवारे इनको अब हम ....२
दिल कि दीवारों पर अब जो एक लकीर खिंची है
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

चेहरे पे चेहरे लगाया है सब ने अपने अपने ....२
अक्स भी अब हैरान है इनको पहचानो कैसे
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२
चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 9
खाली जेब

खाली जेब खूब मचाये शोर आज
सड़कों पे खड़े होकर वो बिंदास

ले कदम दो कदमों का साथ साथ
जिव्ह में खूब आक्रोश भरा आज

मुठी भिंची सीना तना उसके पास
उठ जाती वो हथेली बातों ही बात

नीम सी कड़वी बातों से यूँ लगाव
जलेबी सा रास्ता खुला उसके पास

पैंसे कमाने ,अब आने लगे पसीने
खाली जेब ही लगे अब खाली जीने

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 8
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

अंधेरा आँखों के पटल पर छाया,
नभ को अब कौन यंहा देख पाया ,
फिर भी हम इंटरनेट मोबईल टीवी कंहा छोड़ पाते है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

कौन सुना करता अब उनका टिमटिमाना,
इस पृथ्वी से उस काले आकाश को निहारना ,
अब यंहा इतना वक्त कंहा कौन किसे दे पाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

ऊपर निचे के बीच कसा फंसा मानव ,
अपने बने संकोचित घेरे से बंधा मानव,
जग का इस सुंदर दृश्य वंचित रह जाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

एक उत्तराखंडी

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पर्वत सिखाते

पर्वत सिखाते सर उठा कर जीने को
ना ही सर झुका कर यंहा से भाग जाया करो

सुख दुःख जीवन है माना यंहा रहकर हमने
दूर से ना अब तुम हम पर उंगलियां उठया करो

पहाड़ी जीवन बड़ा कठिन है जीना यंह पर समझे
हवाओं में ना तुम यूँ ना अब हमारी बात उड़ाया करो

सवेरे शाम रात आती हैं यंहा पर भी देख लो
हम से अब यूँ ना तुम अपनी आँखें चुरया करो

ऐसे हमसफ़र से अब मुलकात ही कम हो
जिसके लिए मेड पर हरपल आँखें बिछानी पड़े

चॉद सूरज मन्जिल पाने चाला वो जिस राह पर
ऐसे राहों को क्यों कर अब हम पुकारा करें

घर उसी का सही क्या तुम भी हकदार हो
यंहा आकर अब अपने पहाड़ को अपनाया करो

पर्वत सिखाते सर उठा कर जीने को
ना ही सर झुका कर यंहा से भाग जाया करो

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२
चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

रिश्तों कि यंहा कभी जंजीर जुडी थी ....२
टूटी अब वो रिश्ते मिले पड़े बिखरे बिखरे
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

कैसे संभले कैसे संवारे इनको अब हम ....२
दिल कि दीवारों पर अब जो एक लकीर खिंची है
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

चेहरे पे चेहरे लगाया है सब ने अपने अपने ....२
अक्स भी अब हैरान है इनको पहचानो कैसे
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२
चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके
बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे

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Photo: बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२ चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे रिश्तों कि यंहा कभी जंजीर जुडी थी ....२ टूटी अब वो रिश्ते मिले पड़े बिखरे बिखरे बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे कैसे संभले कैसे संवारे इनको अब हम ....२ दिल कि दीवारों पर अब जो एक लकीर खिंची है बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे चेहरे पे चेहरे लगाया है सब ने अपने अपने ....२ अक्स भी अब हैरान है इनको पहचानो कैसे बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे....२ चढ़े वो रंग मगर वो भी फीके फीके बदलती दुनिया के बदलते रंग देखे एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ईमानदारी

ईमानदारी ना ही खरीदी जाती
ना ही वो किसी बजार में बेचीं जाती
वो तो एक रूहानी रूह है
बस महसूस कि जाती
आँखों में वो यूँ उत्तर जाती
सच्चाई अपने आप बयां कर जाती

प्रामाणिकता आज बाँधी गयी
सत्यता कटुता से अब दबा दी गयी है
निष्कपटता में एक दिन तो उछाल आयेगा
शुध्द अन्तःकरण ही काम आयेगा
धर्मशीलता परायण गाथ गायेगा
सत्यरक्षा नीतिपरायणता कि खराई गयी है

कंही तो छुपी होगी वो तुझ में
झूठ के हजारों पर्दों के आड़ में वो पीछे
कचोटत होगा वो तेरा मन तुझको
अफ़सोस तो होता होगा किसी को ठगा कर
उस पल को प्रकाशित कर जीवन में
ईमानदारी प्रकाशित तब होगी तेरे मन

एक उत्तराखंडी

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