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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 30
प्रणाम

आज जन्म दिन हैं
मेरा
कैसे इसे मनाऊँ
सवेरे सवेरे उठकर
माता पिता के चरणों में
नतमत्स्क होकर
आशीष अपने से बड़ों का पाऊँ
एक अलग दिन
एक अलग साल है
एक नई सोच है
वही मेरे साथ पास है
ना ही कोई टॉफी लूंगा
ना ही कोइ केक काटूंगा
ना मोमबत्ती बुझाऊँगा
ना पेप्सी प्यास बुझाऊँगा
बस एक
दीप मै जलाऊँगा
उस लौ कि तरहा
इस जीवन का अँधेरा
दूर भगाऊँगा
उसकी तरह
मै भी झिलमिलाऊँगा
अनाथ पड़े
मेरे छूटे भाई बहनों को
एक छोटी सी
राशि देकर
उनका भविष्य
सुनहरा बनाऊंगा
बस इतनी इच्छा
पर
बस आप सबका
आशीष
इस शीश बनाये रखें

प्रणाम

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 29

गीत

मैंने लिखा गीत
बस तेरे नाम का
बज उठा मधुर संगीत
अब तो संसार का

शब्दों शब्दों में
राग घुला है प्रेम का
भेद खोल रही है सरगम
अपने छुपे प्रीत का

तराना है गूंजा
सातों तालों आसमानों पर
अधरों के कोपलों से फूटा
लिखा गीत जो तेरे नाम का

मैंने लिखा गीत
बस तेरे नाम का
बज उठा मधुर संगीत
अब तो संसार का

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 28
जिंदगी रोज

जिंदगी रोज एक नया इम्तिहान लेती है
बीते पल पल का एक एक हिसाब लेती है
किसी को दे देती है कुछ ना मांगे वो फिर भी
किसी को दाने दाने को मोहताज करती है

कोई ख़ुशी में भी दुःख से दूर ना रह पाता है जिंदगी
कोई जीवनभर दुःख में रहने पर भी सुख से मर जाता है
क्या असर है क्या आयाम है तेरा ये जिंदगी
हसरत भरी निगाहें फिर भी तुझको देखा करती हैं

बादलों कि आड़ लिये झुरमुट के बीच संग जिंदगी
गाता है गीत कोई महफिल में कोई लिखता है उसे तन्हाईयों मे
अक्सर ये होता है मगर ऐसा होता क्यों है
आइने फलक में लिखा एका एक सब मिट क्यों जाता है

आना जाना यंह पर चला है चलता ही रहेगा जिंदगी
जाके किसी को भी पूछ लो कि क्या फलसफा था उसका
ना उम्मीदी और बस एक आस पड़ी मिलेगी वंहा पर
तू जो जिस राहा आया जिस रहा से चला जायेगा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देक ले स्वर्ग

देकि छ
देकि छ कबि स्वर्ग ते नि
देक ले
देक ले स्वर्ग बसि यखी
मेरु गौंऊ मेरु घोर
मेरु पहाड़ मेरु उत्तराखंड
देकि छ
देकि छ कबि स्वर्ग ते नि
देक ले

ढुंगु ढुंगु
गार गार मा मिली जालू
गंगाजी कि
बगदी धारा बगी जालू
त्यूं हिंवाली चुल मा दिकी जालू

देकि छ
देकि छ कबि स्वर्ग ते नि
देक ले

उकाळु मा
मुंड उठे देकि ले
बुरंसी फूली
छुईं लगा कि देकि ले
हिलांसा जनि उड़ि उड़ि कि देकि ले

देकि छ
देकि छ कबि स्वर्ग ते नि
देक ले

पुंगडु मा
हैरा भैरा डंडा घाटा मा
अपरा मुल्की कि बाटा मा
किले नि देकि मनखी
तिल अपरि मनखी दगड़ी

देकि छ
देकि छ कबि स्वर्ग ते नि
देक ले
देक ले स्वर्ग बसि यखी
मेरु गौंऊ मेरु घोर
मेरु पहाड़ मेरु उत्तराखंड

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऐ जा अपरा पहड़ा मा

दल भात रोटी भुजी
खाणे त आ जा ,आळे खाणा कुंन
ऐ जा अपरा पहड़ा मा

ज्यूंद भी ई उडी जालू
जपले राम नाम सद्गति पाणा कुंन
ऐ जा ऐ देवभूमि मा

दल भात रोटी भुजी
खाणे त आ जा ,आळे खाणा कुंन
ऐ जा अपरा पहड़ा मा

दाना दाना मा मिळाला हरी
हरी नाम का गजरा मा मिळाला हरी
यख ढुंगा ढुंगा खोजण कुन

ज्यूंद भी ई उडी जालू
जपले राम नाम सद्गति पाणा कुंन
ऐ जा ऐ देवभूमि मा

भेद जिकुड़ी कु मान ले जियु
अपरी कुड़ी कुंडली बणाले रै माणस
ऊ अनंत अखंड प्रवास कु

दल भात रोटी भुजी
खाणे त आ जा ,आळे खाणा कुंन ३
ऐ जा अपरा पहड़ा मा

ज्यूंद भी ई उडी जालू
जपले राम नाम सद्गति पाणा कुंन
ऐ जा ऐ देवभूमि मा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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हम थे बि अन्दी

हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी

भैर परदेश मा
खुदेंदा रेंदा हम अपरुं का ही सोच मा
यकुला यकुला हम चुका चकुला
कैमा लगाणा अपरि विपदा जी
हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि ...।

काम घार सिनि खानी
इच हमारी यखरा रोजा का चरखा जी
बडुलि लगदि ठसका लगदि जबेर
बस याद आंदी यख अपरु कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी

हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी
एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
हर तरफ

हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो

एक दर्द मिलेगा अब भी तुमे वंहा
देखते ही उसे वो तेरी आँखों से छलेगा
पूछेगा तब तू खुद से खुद एक सवाल
देख उसका उत्तरा तुझे अब भी ना मिलेगा

पुछ लेना तेरी परछाई से भी कुछ
कंही हो ना जाये वो तुझ से हरजाई
क्या मिला उसे तेरा साथ यूँ देकर
वो कहेगी एक बंजार जीवन अकेला तेरा

अफ़सोस होगा उस उम्र को अकेले में
वो बचपन,जवानी खो गये यंहा वंहा
यूँ ही दूर जाती राहों से ओझल होये वो
अपनों से क्यों कर वो बेगाने होये वो

हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hours ago
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

अंधेरा आँखों के पटल पर छाया,
नभ को अब कौन यंहा देख पाया ,
फिर भी हम इंटरनेट मोबईल टीवी कंहा छोड़ पाते है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

कौन सुना करता अब उनका टिमटिमाना,
इस पृथ्वी से उस काले आकाश को निहारना ,
अब यंहा इतना वक्त कंहा कौन किसे दे पाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

ऊपर निचे के बीच कसा फंसा मानव ,
अपने बने संकोचित घेरे से बंधा मानव,
जग का इस सुंदर दृश्य वंचित रह जाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

हर तरफ

हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो

एक दर्द मिलेगा अब भी तुमे वंहा
देखते ही उसे वो तेरी आँखों से छलेगा
पूछेगा तब तू खुद से खुद एक सवाल
देख उसका उत्तरा तुझे अब भी ना मिलेगा

पुछ लेना तेरी परछाई से भी कुछ
कंही हो ना जाये वो तुझ से हरजाई
क्या मिला उसे तेरा साथ यूँ देकर
वो कहेगी एक बंजार जीवन अकेला तेरा

अफ़सोस होगा उस उम्र को अकेले में
वो बचपन,जवानी खो गये यंहा वंहा
यूँ ही दूर जाती राहों से ओझल होये वो
अपनों से क्यों कर वो बेगाने होये वो

हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
February 6 · Edited
वो प्रेम दीपक

जिंदगी के हैं दो दिन
बस प्यार में गुजार दे
ना बैठ यूँ उदास यार
बस प्यार में गुजार दे

भला ना कर सका किसी का
ना कर बुरा तू भूल में भी किसी का
ना बन सका तेरा रहबर कोई
अकेला ही रहबर बन जा सभी का

ना सोच इतना यार
बस प्यार में गुजार दे
रोना नही हँसना है यंहा
बस प्यार में गुजार दे

पतझड़ की बहार बन जा
बसंत की हो वो जैसे प्रेम फुहार
अंग लगाये ना कोई तुझे यंहा
ले ले तू आलिंगन में सारा संसार

दीप ऐसे जला यार
बस प्यार में गुजार दे
बुझा ना सके वो प्रेम दीपक कोई
बस प्यार में गुजार दे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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