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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जय माँ

माँ कू डोला
सज्यूं छा
बोई कु मंडाण
नई मुंबई मा लग्युं चा

भक्त ऐ वा
ऐ जावा
देका बोई नंदा नंदा बोई बुलाणी
जय माँ नंदा कि
जय पाडे माता कि

सदनी इनि छै राखी
अपरु कि मयालदी बोई राणी
तेर छत्र सदनी रैं ऊँचो
मेरु गढ़देश कि महराणी

सबु का सब ऐ जावा
बोई कु जयकारा लगावा
देका बोई नंदा नंदा बोई बुलाणी
जय माँ नंदा कि
जय पाडे माता कि

रंगमत हुंयूनच पहाड़
नई मुंबई मा छै विंकी बहार
तू बि ले बोई को आशीर्वाद
बणी जालि तेर बिगड़ि बात

ऐ जा मेर भोलू पाड़ी
पाड़ा कि देबी ते थे धैय लगाणी
देका बोई नंदा नंदा बोई बुलाणी
जय माँ नंदा कि
जय पाडे माता कि

माँ कू डोला
सज्यूं छा
बोई कु मंडाण
नई मुंबई मा लग्युं चा

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तेरी माया मा

तेरी माया मा तेरी माया मा
पाड़ों कि हैर भैर छैया मा
उकाळु ऊंदरू बाटों ते आली भेंटि
तेरी माया मा तेरी माया मा

बौल्या बणाई रौलूँ पुंछेई
अपरा अपरि मा मि यखुली बणाई
हर्चि सूद बूद मेरि लगि बस तेर खुद
तेरी माया मा तेरी माया मा

किद किद हैसणी दांतों दतुली
लग्दि रैंदी अब विंकी बडूली
चमचमकी विं आँखि अंधुरू जिकुड़ी
तेरी माया मा तेरी माया मा

मुळ मुळ फूलणी ऊ बुरंसी मुखडी
किन्गोड़ा कि दाणी मेर हिंसोला कि गाणी
काफल खैकी वि घुघती मैसे छुईं लगाणी
तेरी माया मा तेरी माया मा

ठंडू मिठु पाणी सि हिलांसी माया मेरी
ह्युंद सी जमी पाड़ों माथा पौड़ी माया मेरी
गदनी जनि बगती जांद खोलों थे अटकी जांद
तेरी माया मा तेरी माया मा

बसि वा मेर दगड इनी
जियु स्वास कि जसी च वा मेर लड़ी
रै तू मै दगड इनी हि सदनी बसि
तेरी माया मा तेरी माया मा

एक उत्तराखंडी

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हिट रि खुटी

हिट रि खुटी
मेरि
हिट रे खुटी

जौंला
चल जौंला
भूलि भैण किरण नेगी
कु इंसाफ बाण

हिट रि खुटी
मेरि
हिट रे खुटी

९ फरवरी २०१४
जंतर मंतर कै औरी
ब्योखुन ४ बजे कु
ले हाथा माँ दीप धरि

हिट रि खुटी
मेरि
हिट रे खुटी

कबैर मिळालू
विपदा थे इंसाफ रे भुला
ले दीदी दीदा कु
हाथ पकड़ि कि

हिट रि खुटी
मेरि
हिट रे खुटी

एक उत्तराखंडी

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बांकी

कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा
किले बिसरांण रै
अपरी ये मुल्की पछाणा
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

दाणा दाणा का कथन
बाँधी ले सयाना
सिरणु का गेड़ा मा
मारी रखी बुद्धि मकाना
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

रै जालू तेरु कियूं धरो
अपरु बाण परायुं कारु
अगंवाल जब वा आली
ये धरा ही मोक्ष दयाली
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा
किले बिसरांण रै
अपरी ये मुल्की पछाणा
कया रैं जाण
यख बांकी रै अजाणा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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हम थे बि अन्दी

हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी

भैर परदेश मा
खुदेंदा रेंदा हम अपरुं का ही सोच मा
यकुला यकुला हम चुका चकुला
कैमा लगाणा अपरि विपदा जी
हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि ...।

काम घार सिनि खानी
इच हमारी यखरा रोजा का चरखा जी
बडुलि लगदि ठसका लगदि जबेर
बस याद आंदी यख अपरु कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी

हम थे बि अन्दी
खुद अपरा डंडा पुंगडा घोरा कि
हम थे बि रुळन्दी
ये आँखि आंसूं का गारा सी
एक उत्तराखंडी

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देकि च

देकि च
देकि च
तेर आँखियुं मा
तस्बीर मेर दड़ दड़ी सी..२
तेर आँखियुं मा
भेटि छे
भेटि छे
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा
ईं जिकुड़ी लगि झड़ झड़ी सी
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा

माया मेर खतेनी
त्यूं डालियों
त्यूं डांडीयूँ मा
फूल बण बणी का खिलेनि माया मेरी
बुरंसी लाली ...तेर ग्लोडी मा
देकि च
देकि च
तेर आँखियुं मा
तस्बीर मेर दड़ दड़ी सी..२
तेर आँखियुं मा

बथा दे
बथा दे
ये मेर हँसेली बथा दे
लुका ना
लुका ना
मेरा माया थे लुका ना
जियु कि हुर हुर मा
जियु कि धूड़ धूड़ मा
इनि ना छुपे राखि मी थे
तेर काया मा मेर माया थे
भेटि छे
भेटि छे
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा
ईं जिकुड़ी लगि झड़ झड़ी सी
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा

एक उत्तराखंडी

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उत्तराखंड

देक झलकि
झलकि मेरा पाड़ा कि
आच मेरा राजपथ मा
जगमग कैकि

हैर भैर बणो मा
दिके बेटी घास जांदी
पुंगड़ी मा दिके
ब्वारी काम करदी

घार मा बैठी बोई
चुलुह मा भात पकानी
पाड़ी टूक दिके दीदा
अपड़ा दुकानी थे चलाणु

सबैर भतिक ब्योखन
कामा रंगत मेरु पाड़ा
कण रंगीलो छबीलो
मेरु उत्तराखंड

मेरा देबतों को थान
मेरु जियु मेरु पराण
मेरु देश हिंदुस्तान
ये च मेरु आन

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
19 hours ago
ये जिंदगी

ये जिंदगी
सिखाती देती है
ये जिंदगी
पड़ा देती है
रोना जिंदगी हँसना जिंदगी है
चलना दौड़ना जिंदगी में
ये जिंदगी
सिखाती देती है

अकेले में मिला जाती है
अपनों से बेगाना कर जाती है
तो कैसी है जिंदगी
पालूं तुझे तो
तू खो जाती है कंही
ये जिंदगी
सिखाती देती है

सवेरे शाम साथ रहती है
रातों में भी तू पास रहती है
निराशा कभी आशा है
कोई नही जाने
तेरी परिभाष सही
ये जिंदगी
सिखाती देती है

सांसों से तेरा मेल कैसा
धड़कन से क्या खेल तेरा
मस्तिष्क जुडी है क्यों ऐसे
ह्रदय नसों से गुजरी रेखा
मिले ना मिले तू
ये जिंदगी
सिखाती देती है

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी

वो सुबह

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

कल्पना कि पतंग
उड़ने को बेकरार है
सीमा प्रान्त देश सारे
बंधन को तोड़कर

खुले आकाश में
विचरण करने को
ऊपर निचे दाँयें बांयें
उड़े खोल के बांहे

डोर जोड़ी जोड़कर
मोड़े कलम अपनी
मोड़े उस छोर पर
बैठा आज सोचकर

वो सुबह आती है
नया कुछ करने को
सोचता है ये मन
कुछ नये रंग भरने को

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 31
ठेला मेरा

मेरा भी
ठेला लगा है
राग-द्वेष छोड़ो
बस प्रेम से
ही वो चला है

मट्टी का
घड़ा है वो
शीतल जल से
भरा है वो

त्प्त ना इसे
इतना किया करो
भाप बन शीघ्र
कंही उड़ जाये ना वो

आंसूं को
अब लगाम दो
एक मुस्कान से
अब जीवन संवार दो

मुफ्त सेवा है ये
ले लो जितना
उतना बड़ा मेवा है
हर वक्त खुला
मेरा ठेला है

एक उत्तराखंडी

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