• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
19 hours ago
******
प्यारी बेटियां

बेटी के
बस दो आंसूं गिरे पिताजी के लिये
पिताजी के लिये
काफी है जिंदगी गुजरने के लिये
बस ध्यानी बोल देता है

दोस्तों शुभ दिवस
आप सब का मेरा सदैव हौसला बढ़ने का धन्यवाद
ध्यानी प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
पर्वत सिखाते

पर्वत सिखाते सर उठा कर जीने को
ना ही सर झुका कर यंहा से भाग जाया करो

सुख दुःख जीवन है माना यंहा रहकर हमने
दूर से ना अब तुम हम पर उंगलियां उठया करो

पहाड़ी जीवन बड़ा कठिन है जीना यंह पर समझे
हवाओं में ना तुम यूँ ना अब हमारी बात उड़ाया करो

सवेरे शाम रात आती हैं यंहा पर भी देख लो
हम से अब यूँ ना तुम अपनी आँखें चुरया करो

ऐसे हमसफ़र से अब मुलकात ही कम हो
जिसके लिए मेड पर हरपल आँखें बिछानी पड़े

चॉद सूरज मन्जिल पाने चाला वो जिस राह पर
ऐसे राहों को क्यों कर अब हम पुकारा करें

घर उसी का सही क्या तुम भी हकदार हो
यंहा आकर अब अपने पहाड़ को अपनाया करो

पर्वत सिखाते सर उठा कर जीने को
ना ही सर झुका कर यंहा से भाग जाया करो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
23 hours ago
कविता प्रेम कि

कविता प्रेम कि
इस तरह आगाज हुयी
पहली बार
आँखों से चार हुयी
दिल के पार हुयी

कविता प्रेम कि
नजरों से पड़ी मैंने
अपनों परायों से
घड़ी सी जुडी रही
करती वो टिक टिक

कविता प्रेम कि
ना रंग है उसका
ना उसका कोई रूप है
भा जाता है सबको
उसका वो स्वरुप है

कविता प्रेम कि
अंजाना रिश्ता वो
बढ़ जाता पल पल
एक अनंत विश्वास
उस भ्रमांड पार भी

कविता प्रेम कि
आओ जोड़े उस सार से
इस भवसगार प्यार से
करे सार्थक अब अपना
प्रेम इस संसार से

कविता प्रेम कि

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ईमानदारी

ईमानदारी ना ही खरीदी जाती
ना ही वो किसी बजार में बेचीं जाती
वो तो एक रूहानी रूह है
बस महसूस कि जाती
आँखों में वो यूँ उत्तर जाती
सच्चाई अपने आप बयां कर जाती

प्रामाणिकता आज बाँधी गयी
सत्यता कटुता से अब दबा दी गयी है
निष्कपटता में एक दिन तो उछाल आयेगा
शुध्द अन्तःकरण ही काम आयेगा
धर्मशीलता परायण गाथ गायेगा
सत्यरक्षा नीतिपरायणता कि खराई गयी है

कंही तो छुपी होगी वो तुझ में
झूठ के हजारों पर्दों के आड़ में वो पीछे
कचोटत होगा वो तेरा मन तुझको
अफ़सोस तो होता होगा किसी को ठगा कर
उस पल को प्रकाशित कर जीवन में
ईमानदारी प्रकाशित तब होगी तेरे मन

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
वो रे निर्मोही

वो रे निर्मोही
मोह लगाकर चला
सड़कों का सफर था
सब कुछ त्याग कर
फिर सड़कों कि ओर चला

बेदर्द दुनिया में
सब बेदर्दी यंहा
अपना रास्ता बना
फिर शून्य कि ओर चला
फिर सड़कों कि ओर चला

प्रेमहीन अंतर में
करुणा के बीज ना पनपा
निर्दयी इस तन के लिये
ना सबको मना तू चला चल
फिर सड़कों कि ओर चला

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी

बस दूर से देख

देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब
ना ना करीब ना जाओ हकीकत बयां ना हो जाये
देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

लगता है कितना सुंदर शांत खड़ा अकेला वो
उसकी उथल पुथल कोई ना सुन सकेगा दूर से
देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

अचल है भग्या उसका उसकी पीड़ा कि तरह
दूर से देखा बस वाह ही निकलेगा मुख से इस तरह
देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

इन्तजार पलायन आँसूं मिलेंगे सच्चे लोगों के बीच
दो चार पल का विचरण और गुजर जाना तेरा वंहा से
देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

ना दिखेगा ना तू देख पायेगा तू उन आँखों से
तेरे आँखों में जो खूबसूरती का काला चस्मा चढ़ा
देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
कचोटता है मुझे

पहाड़ों का सूनापन
कचोटता है मुझे
वो करता है अब मुझे
कुछ लिखने को मजबूर

सूनी गलियां
सूने खेत खलिहान
सूने मन सूनी पहचान
सून होकर मांग रहा वो हक

खड़ा है वो चुपचाप
अनगिनत हाथ थे वो अब लुप्त
कंहा लगये वो अकेला पुकार
सदियों से वो खड़ा उजाड़

नदियां सुख रही है
धरती हो रही बंजर
वन रिक्त,खो रहे कंकड़
सूना है वो अब अपनों को खोकर

चलता रहेगा ऐसे गर
वो कचोटेगा अब तेरे दिल मकान
लेगा तुझसे तेरे जाने का हिसाब
अकेला जब तू खुद को पायेगा

पहाड़ों का सूनापन
कचोटता है मुझे
वो करता है अब मुझे
कुछ लिखने को मजबूर

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
Timeline
Recent

    बालकृष्ण डी ध्यानी
    5 hours ago · Edited
    बस दूर से देख

    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब
    ना ना करीब ना जाओ हकीकत बयां ना हो जाये
    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

    लगता है कितना सुंदर शांत खड़ा अकेला वो
    उसकी उथल पुथल कोई ना सुन सकेगा दूर से
    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

    अचल है भग्या उसका उसकी पीड़ा कि तरह
    दूर से देखा बस वाह ही निकलेगा मुख से इस तरह
    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

    इन्तजार पलायन आँसूं मिलेंगे सच्चे लोगों के बीच
    दो चार पल का विचरण और गुजर जाना तेरा वंहा से
    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

    ना दिखेगा ना तू देख पायेगा तू उन आँखों से
    तेरे आँखों में जो खूबसूरती का काला चस्मा चढ़ा
    देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब

    एक उत्तराखंडी

    बालकृष्ण डी ध्यानी
    देवभूमि बद्री-केदारनाथ
    मेरा ब्लोग्स
    http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
    में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
    — with Geeta Chandola and 103 others.
    See Translation
    Photo: बस दूर से देख देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब ना ना करीब ना जाओ हकीकत बयां ना हो जाये देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब लगता है कितना सुंदर शांत खड़ा अकेला वो उसकी उथल पुथल कोई ना सुन सकेगा दूर से देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब अचल है भग्या उसका उसकी पीड़ा कि तरह दूर से देखा बस वाह ही निकलेगा मुख से इस तरह देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब इन्तजार पलायन आँसूं मिलेंगे सच्चे लोगों के बीच दो चार पल का विचरण और गुजर जाना तेरा वंहा से देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब ना दिखेगा ना तू देख पायेगा तू उन आँखों से तेरे आँखों में जो खूबसूरती का काला चस्मा चढ़ा देखो उन हसीन वादियों दूर से साहिब एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
    Like · · Stop Notifications · Share
        Anoop Singh Rawat, Mahendra Singh Rana and 21 others like this.
        View 1 more comment
        Mahendra Singh Rana उम्दा

        इन्तजार पलायन आँसूं मिलेंगे सच्चे लोगों के बीच
        ...See MoreSee Translation
        3 hours ago · Like
        Bhaskar Harivansha
        Bhaskar Harivansha's photo.
        43 minutes ago · Like
        Rajpal Panwar Suprabhaat Dhyani ji..Bahut khoob...
        24 minutes ago · Like
        राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' सुप्रभात ध्यानी जी ! सुन्दर अभिव्यक्ति ।See Translation
        23 minutes ago · Like
        Mahi Singh Mehta
        Write a comment...
    बालकृष्ण डी ध्यानी
    Yesterday
    कचोटता है मुझे

    पहाड़ों का सूनापन
    कचोटता है मुझे
    वो करता है अब मुझे
    कुछ लिखने को मजबूर

    सूनी गलियां
    सूने खेत खलिहान
    सूने मन सूनी पहचान
    सून होकर मांग रहा वो हक

    खड़ा है वो चुपचाप
    अनगिनत हाथ थे वो अब लुप्त
    कंहा लगये वो अकेला पुकार
    सदियों से वो खड़ा उजाड़

    नदियां सुख रही है
    धरती हो रही बंजर
    वन रिक्त,खो रहे कंकड़
    सूना है वो अब अपनों को खोकर

    चलता रहेगा ऐसे गर
    वो कचोटेगा अब तेरे दिल मकान
    लेगा तुझसे तेरे जाने का हिसाब
    अकेला जब तू खुद को पायेगा

    पहाड़ों का सूनापन
    कचोटता है मुझे
    वो करता है अब मुझे
    कुछ लिखने को मजबूर

    एक उत्तराखंडी

    बालकृष्ण डी ध्यानी
    देवभूमि बद्री-केदारनाथ
    मेरा ब्लोग्स
    http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
    में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
    — with Geeta Chandola and 103 others.
    See Translation
    Photo: कचोटता है मुझे पहाड़ों का सूनापन कचोटता है मुझे वो करता है अब मुझे कुछ लिखने को मजबूर सूनी गलियां सूने खेत खलिहान सूने मन सूनी पहचान सून होकर मांग रहा वो हक खड़ा है वो चुपचाप अनगिनत हाथ थे वो अब लुप्त कंहा लगये वो अकेला पुकार सदियों से वो खड़ा उजाड़ नदियां सुख रही है धरती हो रही बंजर वन रिक्त,खो रहे कंकड़ सूना है वो अब अपनों को खोकर चलता रहेगा ऐसे गर वो कचोटेगा अब तेरे दिल मकान लेगा तुझसे तेरे जाने का हिसाब अकेला जब तू खुद को पायेगा पहाड़ों का सूनापन कचोटता है मुझे वो करता है अब मुझे कुछ लिखने को मजबूर एक उत्तराखंडी बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
    Like · · Stop Notifications · Share
        Preeti Singh, बालकृष्ण डी ध्यानी, Hemant Joshi and 71 others like this.
        View 18 more comments
        भूषण लाम्बा बहुत सुंदर रचना भाई जी,
        शुभ दोपहर, आपका दिन मंगलमय हो.See Translation
        19 hours ago · Like · 1
        Anoop Singh Rawat बहुत खूब भैजी
        See Translation
        19 hours ago · Like · 1
        Pardeep Singh Rawat Sochne wali bat hai. waki mw ek din pahad apna hisab jarur mangega. tab ham kayi ke nahi rahenge
        19 hours ago · Like · 1
        बालकृष्ण डी ध्यानी आप सबके इस स्नेह का धन्यवाद और शुभ रात्रि जीSee Translation
        9 hours ago · Like
        Mahi Singh Mehta
        Write a comment...
    बालकृष्ण डी ध्यानी
   
    अब ऊँगली उठाना

    अब ऊँगली उठाना बड़ा आसान हो गया
    ध्यानी वो मेरी एक अब पहचान बन गया

    शीशे के मकानो से घिरा था अपने मै
    शीशा चटका मेरे सर वो इल्जाम आ गया

    दूर वंह पर धुँआ उठा रहा अब कभी कभी
    शमशान बुझा है अब रखों का नाम आ गया

    बस मुंह खोल देते हैं बिना सोचे समझे
    हमने बोल दिया तो वो सरेआम हो गया

    अब तो महफिल सजती है इनकी ही
    हमने महफिल सजाई वो वीरान हो गया

    अब ऊँगली उठाना बड़ा आसान हो गया
    ध्यानी वो मेरी एक अब पहचान बन गया

    एक उत्तराखंडी

    बालकृष्ण डी ध्यानी
    देवभूमि बद्री-केदारनाथ
    मेरा ब्लोग्स
    http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
    में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 15
वो रे निर्मोही

वो रे निर्मोही
मोह लगाकर चला
सड़कों का सफर था
सब कुछ त्याग कर
फिर सड़कों कि ओर चला

बेदर्द दुनिया में
सब बेदर्दी यंहा
अपना रास्ता बना
फिर शून्य कि ओर चला
फिर सड़कों कि ओर चला

प्रेमहीन अंतर में
करुणा के बीज ना पनपा
निर्दयी इस तन के लिये
ना सबको मना तू चला चल
फिर सड़कों कि ओर चला

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
February 14
कविता प्रेम कि

कविता प्रेम कि
इस तरह आगाज हुयी
पहली बार
आँखों से चार हुयी
दिल के पार हुयी

कविता प्रेम कि
नजरों से पड़ी मैंने
अपनों परायों से
घड़ी सी जुडी रही
करती वो टिक टिक

कविता प्रेम कि
ना रंग है उसका
ना उसका कोई रूप है
भा जाता है सबको
उसका वो स्वरुप है

कविता प्रेम कि
अंजाना रिश्ता वो
बढ़ जाता पल पल
एक अनंत विश्वास
उस भ्रमांड पार भी

कविता प्रेम कि
आओ जोड़े उस सार से
इस भवसगार प्यार से
करे सार्थक अब अपना
प्रेम इस संसार से

कविता प्रेम कि

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित