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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 12
अचानक छोड़कर

अचानक छोड़कर वो
चले जाते हैं चले जाते हैं
बंधन तोड़कर वो
चले जाते हैं चले जाते हैं

जाते कंहा है जाते कंहा है
किस को पता नही,जाते कंहा है
ये सांसे छोड़कर
अपनों से मुंह मोड़ कर चुप चाप वो
चले जाते हैं चले जाते हैं

साथ रहते हैं साथ रहते हैं
कदम कदम वो पास रहते हैं
सुख दुःख के हमारे वो अपने
बस अपनी यांदे छोड़कर
उन यादों को किनार कर वो
चले जाते हैं चले जाते हैं

अचानक छोड़कर वो
चले जाते हैं चले जाते हैं
बंधन तोड़कर वो
चले जाते हैं चले जाते हैं

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
January 12
इश्क तेरा रंग ऐसा

हर एक रंग रंगा है
हर एक अंग चढ़ा है
वफ़ा है या बेवफाई
दिल कि चाहत का नशा है
हर एक रंग रंगा है.............

यकीनन मिलते है अश्क वंहा पर
इस दिल कि राह पर जो चला है
फूलों कि चाह कि थी ऐ दिल
कंटों पर ही जा कर वो खिला है
हर एक रंग रंगा है.............

मोम कि तरह वो पिघलती रही
समा के साथ लपटों में मचलती रही
परवान हो बेखबर उस आंच से
उन नाशिली आँखों के आगोश में उतरता रहा
हर एक रंग रंगा है.............

ना कोई रंग है ना कोई रूप है
प्रेम तो बस प्रेम है वो
ना ही कोई उसका स्वरुप है
आ ही जाता है वो जिस पर आना होता है
हर एक रंग रंगा है.............

हर एक रंग रंगा है
हर एक अंग चढ़ा है
वफ़ा है या बेवफाई
दिल कि चाहत का नशा है
हर एक रंग रंगा है.............

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 10
रैन बसेरा

ठंड से बचने का बसेरा
तेरा और मेरा क्या
वो रैन बसेरा

उठता ये सवाल क्यों
हर साल क्यों
इन राजनीती गलियारों में
वो रैन बसेरा

सेक दो चार दिन कि
बड़ा दो अपने वोटों कि गिनती
ले के दो चार घड़याली आंसु
वो रैन बसेरा

कुछ दिन पश्चात
पुन सा वो समान,मरे या जिये
अपने भाग सारे जिये
वो रैन बसेरा

बस दो दिन का बखेड़ा
सर्द रात कि ठिठुरती रातों में
वो अकेला खड़ा मैं अकेला
वो रैन बसेरा


एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
एक अलग दिल

एक अलग दिल है जो
जो धड़कता ही रहा
एक अलग दिल है जो

कभी अपनों के लिये ......... २
कभी गैरों के लिये वो मचलता ही रहा
एक अलग दिल है ......

सांस बाँध रखी
उसने इस सुबह से
उस नई सुबह के लिये

एक अलग दिल है जो
जो धड़कता ही रहा
एक अलग दिल है जो

वो तड़पता ही रहा
अपनों के उस मकाम
उस मकान के लिये

कभी अपनों के लिये ......... २
कभी गैरों के लिये वो मचलता ही रहा
एक अलग दिल है ......

राह वो अनचाही
वो अनजानी मंजिल के लिए
वो बस चलता ही रहा

एक अलग दिल है जो
जो धड़कता ही रहा
एक अलग दिल है जो

बुझे दीपक को
मन के तरंगों से जो
वो रोशन करता ही रहा

कभी अपनों के लिये ......... २
कभी गैरों के लिये वो मचलता ही रहा
एक अलग दिल है ......

मील जाये तुम्हे
या दिख जाये कभी तुम्हे वो राहों में
बस एक निगाह उस आँखों में देखकर जी लेना

एक अलग दिल है जो
जो धड़कता ही रहा
एक अलग दिल है जो

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
नारी कभी तो

एक पथ में
अनेक रहें जुड़ी
फिर भी अकेली

क्यों खड़ी ऐसे
वो रहें उसकी
किसके इंतजार में

कवायद दिन रात
एक अनसुलझी सहेली
कैसी वो पहेली

ममता छांव कि
अपने गांव कि
प्रियतम प्रेम कि

बांहे फ़ैली हुयी
सुनी गलियों खड़ी
अब भी मिलेगी

वो अंधेरा छटेगा
किरण पौ फटेगा
उसके अन्धकार में

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
8 hours ago
तिरंगा मेरा

हाथों में ना
बस तू ऐसे थाम ले
दिल का दराज
तू अपना खोल दे
तिरंगा है मेरे देश का
इन तीन रंगों को
अपने जिस्म में
इस कदर उतार ले
हाथों में ना
बस तू ऐसे थाम ले

बहना चाहिए
लुह बनकर नस नस में
वंदे मातरम वंदे मातरम
हर रग रग में से
जोश का यूँ ही संचार कर
भारत माँ पर अपना
शीश निछावर कर
हाथों में ना
बस तू ऐसे थाम ले

फूल बनकर
तू खिल इस तरह
सुगंद तेरी चहुँ और हो
फैला दे इस जंहा में
सुनहरा तमगा मेरे देश का
तू है तो मेरा देश है
मेरा देश है तो हम हैं
हाथों में ना
बस तू ऐसे थाम ले

एक उत्तराखंडी

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नारी कभी तो

एक पथ में
अनेक रहें जुड़ी
फिर भी अकेली

क्यों खड़ी ऐसे
वो रहें उसकी
किसके इंतजार में

कवायद दिन रात
एक अनसुलझी सहेली
कैसी वो पहेली

ममता छांव कि
अपने गांव कि
प्रियतम प्रेम कि

बांहे फ़ैली हुयी
सुनी गलियों खड़ी
अब भी मिलेगी

वो अंधेरा छटेगा
किरण पौ फटेगा
उसके अन्धकार में

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बालकृष्ण डी ध्यानी
January 23
तेरे प्यार में

टूटे फूटे वो
अक्षर पड़े मेरे
आओ जोड़ लो

करती हैं बातें
अब भी मुलकातें
वो यादें तेरी

जोड़ कर रखा
बिखरा जो पड़ा
संवारा था कभी

अब भी बैठ
तेरे इन्तजार मै
तू आयेगी यंही

कितने जमाने गये
हम दीवाने रहे
तेरे प्यार में

एक उत्तराखंडी

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देकि च

देकि च
देकि च
तेर आँखियुं मा
तस्बीर मेर दड़ दड़ी सी..२
तेर आँखियुं मा
भेटि छे
भेटि छे
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा
ईं जिकुड़ी लगि झड़ झड़ी सी
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा

माया मेर खतेनी
त्यूं डालियों
त्यूं डांडीयूँ मा
फूल बण बणी का खिलेनि माया मेरी
बुरंसी लाली ...तेर ग्लोडी मा
देकि च
देकि च
तेर आँखियुं मा
तस्बीर मेर दड़ दड़ी सी..२
तेर आँखियुं मा

बथा दे
बथा दे
ये मेर हँसेली बथा दे
लुका ना
लुका ना
मेरा माया थे लुका ना
जियु कि हुर हुर मा
जियु कि धूड़ धूड़ मा
इनि ना छुपे राखि मी थे
तेर काया मा मेर माया थे
भेटि छे
भेटि छे
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा
ईं जिकुड़ी लगि झड़ झड़ी सी
त्यूं ऊँ बाटीयूँ मा

एक उत्तराखंडी

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उत्तराखंड

देक झलकि
झलकि मेरा पाड़ा कि
आच मेरा राजपथ मा
जगमग कैकि

हैर भैर बणो मा
दिके बेटी घास जांदी
पुंगड़ी मा दिके
ब्वारी काम करदी

घार मा बैठी बोई
चुलुह मा भात पकानी
पाड़ी टूक दिके दीदा
अपड़ा दुकानी थे चलाणु

सबैर भतिक ब्योखन
कामा रंगत मेरु पाड़ा
कण रंगीलो छबीलो
मेरु उत्तराखंड

मेरा देबतों को थान
मेरु जियु मेरु पराण
मेरु देश हिंदुस्तान
ये च मेरु आन

एक उत्तराखंडी

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