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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 15
कुछ रिश्ते होते हैं

कुछ रिश्ते होते हैं खून के,
तो कुछ दिल के ...........|

कुछ रिश्ते होते हैं जन्म-जन्म के
तो कुछ ... कुछ होते क्षण भरके.......|

कुछ रिश्ते होते हैं
कभी ना टूटने वाले
पर समय आने पर झुकनेवाले......|

कुछ रिश्ते होते हैं
दूर से अपने को अपना कहने वाले....|
पर पास जाने के बाद दूर करने वाले .......|

कुछ रिश्ते होते हैं
पैंसे से सब कुछ खरीद करने वाले
तो कुछ प्रेम से अपना करने वाले .......|

कुछ रिश्ते होते हैं
ना जोड़े बिना दूर तक निभाने वाले
तो कुछ जोड़के भी टूटने वाले .......|

मेरा आपसे रिश्ता कैसा है
कलम और अक्षर से जोड़ने वाला
या पसंद,टिप्प्णी करके निकलने वाला .......|

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 14
जनहित में जारी ...।

कीचड़ ही कीचड़
रजनीति कि निति आज
बेखबर है अब भी आम
कि कौन कमल खिलाये
सवाधान आप का मत
बस आपके साथ
सावधन ये वक्त फिर
ना फिर जल्द आयेगा
कीचड़ ही कीचड़
रजनीति कि निति आज

शुभ संध्या का प्रणाम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
March 14
माँ एक नई कहानी

माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२
वो ही राजा तेरा माँ वो ही तेरी रानी
बात है माँ ये तो सदियों पुरानी
सुन सुन कर मैं थक गया हूँ माँ
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

कुछ अच्छी सी कुछ पक्की सी
आज के संदर्भ में वो लिखी सी
सुनकार वो मुझे नया सा लगे
अपना ना हो पर भी अपना सा लगे
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

कल्पना से दूर कंही माँ मेरी
आज मुझे हकीकत से मिला दे
रेशमी पलंग नही सोना माँ मेरी
अब अंगारों में चलना सिखा दे
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२
वो ही राजा तेरा माँ वो ही तेरी रानी
बात है माँ ये तो सदियों पुरानी
सुन सुन कर मैं थक गया हूँ माँ
सुना दो ना कोई एक नई कहानी
माँ सुना दो ना एक नई कहानी ...२

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी 

जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

हर पग लड़ना गर तुझे कुछ करना है
उन्हें सदा तेरे पास-पास साथ रख अगर आगे तुझे बढ़ना है
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

आगे-पीछे दांयें-बाएँ , मीठे शब्दों के जो बाण चलाये
ऐसे मुख को सदा परे रख अनदेख कर तू उसे छोड़ आगे बढ़
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

अपने तक ना सीमित रख साँसे, अश्रु तेरा गर जो तेरे समुख बहा दे
वो ही सच्चा है तेरा फूल में नही जो तुझे काँटों पे चलना सिखा दे
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

कैसे पता चलता है अंतर कर अपने मन का तो अब मंथर
अन्धेरा फिर प्रकाशित होगा कड़वा शब्द एक दिन वो मीठा होगा
जिस -जिस मुख से निकले कटु सत्य ,उस-उस मुख को धन्यवाद कर

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी

हम अपने में लगे रहे

हम अपने में लगे रहे यूँ
नजारों को दर किनारा कर दिया
सागर ने अपना दर बड़ा दिया
पर्वत ने अपना कद घटा दिया
हम अपने में लगे रहे

कुछ इशारे कर रही थे वो हमें
हम ने उस पेड़ को ही जड़ से उखाड़ दिया
गर्मी बहुत बड़ गयी है घर घर में
हम ने वातानाकूलित यंत्र लगा दिया
हम अपने में लगे रहे

आराम कैसे मिले हम को अब
ये सोचने में पूरा जीवन व्यर्थ गँवा दिया
जीवन चक्र को घूमना था गोल गोल
हमने उसका रास्ता ही मोड़ दिया
हम अपने में लगे रहे

अब पृथ्वी कम पड़ने लगी है अब हमें
हम ने अब अंतरिक्ष को ताकना शुरू कर दिया
अब भी वक्त है खुद को जान ले पहचान ले
अपने नही प्रकृति के बारे में तो सोच ले
हम अपने में लगे रहे

हम अपने में लगे रहे यूँ
नजारों को दर किनारा कर दिया
सागर ने अपना दर बड़ा दिया
पर्वत ने अपना कद घटा दिया
हम अपने में लगे रहे

एक उत्तराखंडी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी

वो मेरी खोली

दस बाय दस कि वो मेरी खोली
वो मेरा जीवन , सुन जा मेरी बोली
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

एक ही खिड़की एक ही वो दरवाज
उस से ही होता मेरा बाहर देखना,आना जाना
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

कुछ ना था छुपाने को बस सब कुछ था दिखाने को
चार कोना चार दिवारी पड़ी ,वंही वो यांदें पुरानी
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

बचपन बिता बित गयी वो आधी जवानी
ना मिट सकी वो बीते दिनों कि कहानी
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

खोली नंबर था तेरह वो मेरा
दस बाय दस गरीब में था वो प्रेम गहरा
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

टूटी फुट गयी किसी कोने में अकेले पड़ी
वो खोली मेरी दो बेड रूम कि चाह में खो गयी
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

दस बाय दस कि वो मेरी खोली
वो मेरा जीवन , सुन जा मेरी बोली
वो मेरी खोली मेरी हमजोली

एक उत्तराखंडी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
5 hours ago
दो दिन

दो दिन इंतजार करने में गुजर गये , दो दिन दुःख में
अब हिसाब कर रहा हूँ कितना बाकी रह गये हैं दरवाजे पर कि गर्मियों के

सौ बार चाँद आया , तारे खिले , रात मदहोश हुयी
रोटी का चाँद खोजने में जिंदगी यूँ ही बर्बाद हो गयी

ये हाथ मेरे सर्वस्व , गरीबी का कर्जदार ही रहे
कभी ये गर्दन ऊपर तनी , कभी कटी अवस्था में मिली

हर घड़ी आंसूं बहे नही , ऐसे भी क्षण आये
तभी आंसूं दोस्त बनके सहायता के लिये भाग कर आये

दुनिया का विचार हर घड़ी किया विश्वास करो जगमय मै हुआ
दुःख सहें कैसे , फिर जियें कैसे , ये पाठशाल नही सिखा

आगभट्टी में तपे फौलादा जैसे जीवन अच्छा तपा
दो दिन इंतजार करने में गुजर गये , दो दिन दुःख में

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
20 hours ago · Edited
एक झलक है पलक पर

एक झलक है पलक पर
वो झुकी आंखों में तेरे
एक झलक है पलक पर.............

छू लूँ लपक कर
देखूं क्या आये हिस्से मेरे
एक झलक है पलक पर.............

देख इधर मुझे तू
आ छू ले तेरा समंदर पुकारे
एक झलक है पलक पर............

ना यूँ आ टपक टपकर
गीला हूँ मै लहर लहर भर
एक झलक है पलक पर............

तन्हा अकेली तू वंहा
मै भी इन्तजार में खड़ा
एक झलक है पलक पर............

क्या लिखा है उस झलक में
पलक आ जा मुझे बता दे
एक झलक है पलक पर............

बालकृष्ण डी ध्यानी
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बालकृष्ण डी ध्यानी
Yesterday
अगर

जो आयेगा
वो चला जायेगा
अगर
रोक लूँ उसे
क्या वो रोक जायेगा

नियति है
वो चलती रहेगी
वो गति है जो
वो बढ़ती रहेगी

रोकना जिसने चाहा
वो मिट जायेगा
रोक के उसे ऐसे
बता क्या पायेगा

मुक्त है वो
हवाओं कि तरह
शब्द है वो
निगाहों कि तरह

उष्ण है वो
तू जल जायेगा
राख सा पड़ा तू
जल में बह जायेगा

अगर तू
साथ साथ चल ना सका
वो वक्त
पीछे मोड़ के ना आयेगा

एक उत्तराखंडी

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बालकृष्ण डी ध्यानी
March 22
उलझे लोग यंहा उलझा देश मेरा

पथ प्रकाशित नही साफ साफ
अन्धेरा - कोहरा घाना छाया यंहा
टूटी लाठी के सहारे चल रहा
उलझे लोग यंहा उलझा देश मेरा

सफेद रंग बहुत हैं रंगमंच पर सजे
पर सहमा है वो काला रंग अडिग मन में बसा
वो उजाला नाकाफी है उसे सुलझाने को
उलझे लोग यंहा उलझा देश मेरा

दशकों से उलझा है वो इस जाल में
कैसे छुटकारा मिलेगा दिल को बस पांच साल में
वो बुनता रहेगा तू उलझता रहेगा
उलझे लोग यंहा उलझा देश मेरा

पथ प्रकाशित नही साफ साफ
अन्धेरा - कोहरा घाना छाया यंहा
टूटी लाठी के सहारे चल रहा
उलझे लोग यंहा उलझा देश मेरा

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