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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

राज खोलता हूँ मै

राज खोलता हूँ मै
जब भी बोलता हूँ मै
दिल को तेरे टटोलता हूँ मै
उसमे भी कुछ खोजता हूँ मै
राज खोलता हूँ मै
जब भी बोलता हूँ मै

कुछ तेरे पीछे छूट गये होंगे
उन क़दमों के निशान ढूंढता हूँ मै
बोझ तेरे दिल का कुछ देर तो उठता हूँ मै
याद आकर आँखों  से  तेरे अश्रु  जब बहता हूँ मै
राज खोलता हूँ मै
जब भी बोलता हूँ मै

तू भी सोचता होगा मुझको खोजता  होगा
दूर तुझसे कब गया मै खुद से जब तू पूछता होगा
मै अब  भी पास तेरे मै अब भी  साथ तेरे
तेरे ख्यालों तेरे यादों तेरे अहसासों  में बस पुकार ले मुझे 
राज खोलता हूँ मै
जब भी बोलता हूँ मै

ये रेखा तेरे मेरे बीच जो खिंच गयी है
दिखती  नहीं है वो अब पूरी तरह लुप्त हो गयी
तू भी कहीं ना उसकी तरहं लुप्त हो जाना
वक़्त मिले तुझे जब भी अपनी पुरानी गली तू जरूर आना   
राज खोलता हूँ मै
जब भी बोलता हूँ मै

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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devbhumi

सत्य मेर दिल में  था

सत्य मेर दिल में  था
जो दबा
होंठ मगर
क्यों ? ना कह पाये वो

आसमान बिकने लगा
बिक गयी देखो सारी जमीं यंहा
बह रहे आँसूं आँखों से
पलकों में क्यों ? ना थम पाये वो

मै खड़ा चुपचाप देखता ही रहा
कदम मेरे उस राह पर चल ना पाये क्यों ?
बात  छोटी  थी मगर अब बढ़ गयी
कैसे  इस दुःख को अब झेल पाये हम

खाली खाली हो गया है वो अब
मै भरा ,दर्द भरा सा क्यों? लग रहा है मुझे
वो चुप खड़ा होकर देख रहा है मुझे
कान मेरे उसकी आवज  क्यों? नही सुन पा रहे हैं

सत्य मेर दिल में  था
जो दबा
होंठ मगर
क्यों ? ना कह पाये वो

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

बात अपनी बताता हूँ मैं

बात अपनी बताता हूँ मैं
चलो तुम्हे अपने  पहाड़ों  में घूमता  हूँ  मै
किन्गोड़े काफल का स्वाद चखाता हूँ मै
गदेरे का  ठण्डु मिठू पानी पिलाता  हूँ मै
बात अपनी बताता हूँ मैं

मेरे बीते बचपन मेरे बाँकपन से मिलाता हूँ मै
मेरे गाँव मेरे अपनों से तुम्हरी भेंट करता हूँ मैं
रोज इस पावन गंगा में डुबकी लगाता  हूँ मै
इस माटी को अपने शीश पर सजाता  हूँ मै
बात अपनी बताता हूँ मैं

बावन किलों से आज तुमको मिलता हूँ मै
काँटों से कैसे फूल खिलाना तुमको  वो मलेथा दिखता हूँ मै
मेरे इस उकाल उंदार में आज तुम्हे खूब दौड़ता  हूँ मै
जंगलों में सजे लाल बुरांस पीली फ्योंली तुम्हे दिखता हूँ मै
बात अपनी बताता हूँ मैं

रामी बहुरानी अब हर घर घर में खड़ी तुम्हें दिखता हूँ मै
तिलु रौतेली चन्द्रसिंह गढ़वाली माधव भंड़री की गाथा गाता हूँ मै
डूबे टिहरी गढ़वाल से तुझे आज मिलता हूँ  मै
पहाड़ खाली हो रहे हैं अब उस ख़ामोशी को आज सुनाता हूँ मै
बात अपनी बताता हूँ मैं

ढोल दामो के साथ चल आज तुझे  नचता  हूँ मै
झुमेलो खुदेड़ गीत पांडव नृत्य चंचेरी छपेली लगता हूँ मै
खो रही उत्तराखण्ड के लोक संस्कृति से मिलाता हूँ
अपनापन सादगी भरा जीवन क्या होता तुझे आज दिखता हूँ मै
बात अपनी बताता हूँ मैं

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

अब मै बोलता कम हूँ

अब मै बोलता कम हूँ
अपना मुख खोलता कम हूँ
देख जमाने की बेरुखी को
अपनी नजरों को अब तौलता कम हूँ 
अब मै बोलता कम हूँ

जग में कैसे कैसे बंदे हैं
आँखे होकर भी वो अंधे हैं
अब अपनी आँखों को बंद कर लेता हूँ मै
अँधेरे में ही सब कुछ देख लेता हूँ मै
अब मै बोलता कम हूँ

सड़े टमाटर कहीं सड़े अंडे मिले
सत्य की राह पर अब वो मिल के चले
चप्पल बूट पड़े और तमाचे खाये मैंने
लिखे मेरे लेख राख की ढेर पर पाये मैंने
अब मै बोलता कम हूँ

फिर भी ना डगमग हुये मै और मेरे विचार
मेरे पथ पे वो चले निर्भय अंत तक मेरे साथ
वो सत्य मेव जयते की मशाल जलता हूँ मै
अब भी खुद को अंधेर में खड़ा पाता हूँ मै
अब मै बोलता कम हूँ

बालकृष्ण डी ध्यानी
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पहाड़ों पे पहली बरसात

पहाड़ों पे पहली बरसात
जब गिरती है झम झम
मयूर नाच उठते हैं
नाच उठते हैं ये तन मन

धरा भीग जाती है
भीग जाते हैं जब ये जल थल
सौंधी सुगंध माटी  की
तृप्त करती है जब ये मन

अंकुरित होते हैं भाव
नये नये रूप लेकर वो सृजन सार
देख इन्द्रधनुष के वो सात रंग
पत्थरों पर जब आ जाता यौवन

कई नदी नयी निकलती है
अठखेली लेती है वो झरनों के संग
पहाड़ों पर चल देखने वो उमंग
चलो झूमें और भीगे उसके संग
 
पहाड़ों पे पहली बरसात ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

कबि त अपरा साथ मा

लेल्यूं दगड्या मिथे तुम भी
कबि त अपरा साथ मा
द्वि आखर  लेखी लेला तुम भी
कबि त म्यार प्यार मा

बैठ्युं छों इनि तुमर सार मा
लग्युं छों हर दिन हर बार मा
खुद ऐजाली मेरी तुम थे कभी
खोजी ले ला तुम ये पहाड़ मा

आखर आखर टिप्दा रुं मि
ह्युंद बस्ग्याल और्री ये घाम मा
सुबेर दोफरी ब्योखन बीत ग्याई
भांडी खुद आंदी तुमरी अब रात मा

ब्याल त ये कन भी चली ग्याई
भौल सिन्कोली जाली परबात मा
बोलणु छों मि बस इतगा ही
यूँ ज्योंती जिंदगी कु कर्म कांड मा

लेल्यूं दगड्या मिथे तुम भी
कबि त अपरा साथ मा
द्वि आखर  लेखी लेला तुम भी
कबि त म्यार प्यार मा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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devbhumi

त ऐ बची जाली

पैडि लियां रोज अपरी गढ़वाली
गढ़ भाषा च ये न्यारी पियारी
दोई आखर तुम रोजी पैडि लेला
बिंगी लेला बोली लेला त ऐ बची जाली

निथर ये भी बोगी जाली
पलायन दगडी भागी जाली
अपर नौनु नौनी दगडी रे
दगड्या तू बचाले त ऐ बची जाली   

देक बुरु ना मन्या भैजियों
देक दुसरु क्वी भी नि आन हुलु
हुमन कन जै भी अब कन जी
कैकु सारू नि लाग्न जी त ऐ बची जाली   

सोची ले तू अब समझी ले
अपरी माटी अपरी भाषा मा बोलिले
बचे बचे अपरुँ दगड  रे भेजी
इतगा स काम तू कैजे  त ऐ बची जाली   

बालकृष्ण डी ध्यानी
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तेर कंडो मा

तेर कंडो मा
खिल्दा फूल छों मि ऐ माँ
तू इनि सम्भली  रखी सदनी
अपरी गोदी मा मिथे ऐ माँ
तेर कंडो मा...............

ना अपरी से मिथे कभी दूर कैर
ना कभी नारज  व्है तू ना गुस्सा कैर तू माँ
तेर फ़िक्र मि भी कैदु ऐ माँ
पर अपरी माया थे जातौ बतौ नि सक्दु
तेर कंडो मा...............

तेरी आँखि सदनी में दगड बचंदि रैंदी
जीकोडी धड़ धड़ तेरी  मिथे धिर बंधोंदी रैंदी माँ
तेर हाक सुनी की मि झट दौड़ी ते पास ऐजांदु 
भूकी मिटदी ना दोई घास तेरा हाथा कु नि खान्दु
तेर कंडो मा...............

तू इनि सदनी अपरा हाथ मेर मोंड मसल दी रे
मि तेर दोइया खुठड़ियों मा सदनी इनि पौड़ी रालों
मि थे मिल जालु  मेरु सर्ग यखी ये  भुंया मा माँ
मि तेर खुठीयूं को धोयुँ पाणी जब  रोज प्यालो
तेर कंडो मा...............

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आच १५ अगस्त

आच १५ अगस्त
मेरु देसा को झंडा
ऊँचों रे सदनी इनि ऊँचों रे
बथों दगडी ये हिंवाली काठी मा
सदनी इनि फर-फरनु रे इनि फर-फरनु रे
आच १५ अगस्त
मेरु देसा को झंडा
ऊँचों रे सदनी इनि ऊँचों रे

तीन रंगा कू  यु रंगीन कौथिग
यख सदनी लगदु रे इनि सदनी लगदु रे
गढ़वाल रैफाल जिकोड़ो मां शौर्या को तमगा
सजदु रे इनि सदनी सजदु रे
आच १५ अगस्त
मेरु देसा को झंडा
ऊँचों रे सदनी इनि ऊँचों रे

मेर हिन्द की सेना च मेरु  गैना
टीम टिप्र्राणु  रे इनि सदनी टीम टिप्र्राणु
चन्द्रसिंह गढ़वाली श्री देव सुमन शहीद भगत सिंह
ये माटी ऐ जानू रे इनि सदनी ऐ जानू रे
आच १५ अगस्त
मेरु देसा को झंडा
ऊँचों रे सदनी इनि ऊँचों रे
बथों दगडी ये हिंवाली काठी मा
सदनी इनि फर-फरनु रे इनि फर-फरनु रे
आच १५ अगस्त
मेरु देसा को झंडा
ऊँचों रे सदनी इनि ऊँचों रे

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एक दिन त  आलू गुरूजी

एक दिन त  आलू गुरूजी
क्वी अपरा अपरू थे भी खोज्यालो  गुरूजी
बस सब  म्यारु  ये सारू लिख्युं 
सरस्वती देबी चरणी च  गुरूजी

एक दिन त  आलू गुरूजी  ................

ना लालस च क्वी मेरु गुरूजी
ना  चैणु   च कुच  भी  मिथे  गुरूजी
पडि ले ला जब भटकि मनखी मिथे
दोई आंसूं त  भैर  पोडीला गुरूजी

एक दिन त  आलू गुरूजी  ................

बस आप कु आशीर्वाद  चैणु  गुरूजी 
ये कोरा कागज भला नई दिक्दा  गुरूजी
द्वि अखार जबै ऐमा अकरे जाँदा
तब ये जियूं  मा जीयु आन्दु  गुरूजी

एक दिन त  आलू गुरूजी  ................

एक दिन त  आलू गुरूजी
क्वी अपरा अपरू थे भी खोज्यालो  गुरूजी
बस सब  म्यारु  ये सारू लिख्युं 
सरस्वती देबी चरणी च  गुरूजी

एक दिन त  आलू गुरूजी  ................

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