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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

devbhumi

पुरानी यादों के झरोखों से

पुरानी यादों के झरोखों से
अब भी वो सुनहरी धुप झांक देती  है

खिला देती है उस वक्त को जो पीछे छूटा
उस अपने से वो अकेले में मिला देती है

उभरने लगते हैं वो चित्र अपने आप में
उन अहसास के ख्यालों में अपना रंग भर देती है

ले जाती है वो मुझे अपने से वो दूर कहीं
बीती एक एक बात मुझ से वो दोहराती हैं 

काश ऐसा होता काश ऐसा किया होता
पिछले फैसलों पर वो फिर प्रश्न खड़ा कर देती है

निहरता रहता हूँ रोज उन झरोखों में
उस से झांकती किरण रोज एक नई कथा लगा जाती है 

पुरानी यादों के झरोखों से
अब भी वो सुनहरी धुप झांक देती  है

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

devbhumi

रुख़्सत हो जा

रुख़्सत हो जा
मेरी आँखों से वो आँखों का पानी

बह ना जा तू इस तरह बह ना जा
मेरे पहाड़ों से वो मेरी बहती जवानी

रुख़्सत हो जा
मेरी आँखों से वो आँखों का पानी

इस शाम को क्यों  ऐसे ढलना था
क्यों इस सवेरे को पूरी रात जलना था

रुख़्सत हो जा
मेरी आँखों से वो आँखों का पानी

किरण इन्तजार की अब लौट आने दो   
कली इन्तजार में ना अब मुरझाने दो 

रुख़्सत हो जा
मेरी आँखों से वो आँखों का पानी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

आज पहाड़ों में जमकर हो रही बरसात

आज पहाड़ों में जमकर हो रही बरसात
आ रहे हैं वो दिन मुझे फिर से याद

भीगा रहा है मौसम बरस के जंगलों में आज
दूर बैठा वो मन क्यों भीगे आज मेरे साथ 

पत्तों पत्तों ने धारण कर लिया है नया श्रृंगार
मेरे पास आ रही किस की वो करुणा पुकार

डर भी लगता है जब गरजता ये सावन
तब अपनों की यादों में उलझ जाता ये मन

कैसे होंगे मेरे अपने ढूंढता है वो पल पल
वियोग की ये दशा दर्शाती है ये जल थल

आज पहाड़ों में जमकर हो रही बरसात
आ रहे हैं वो दिन मुझे फिर से याद

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

मैं जला उस मशाल की तरह  ..................

मैं जला उस मशाल की तरह
अँधेरे को राह दिखाते उस प्रकाश की तरह   

मैं बना उस आकाश की तरह
अपने भीतर को खोजते उस संत की तरह

मैं बना उस समंदर की तरह
अच्छी बुरी चीजों को समाते विश्वम्भर की तरह

मैं बना इस धरती की तरह
त्याग ही सब कुछ है सीखते उस वृक्ष की तरह

मैं खड़ा उस पहाड़ की तरह
चुपचाप सृजन करते उस विशाल की तरह   

मैं बहा उस नदी की तरह
पल पल प्यास मिटते उस जल की तरह

मैं चला उस सफर की तरह
मुश्किलों से घिरते लड़ते उस पड़ाव की तरह

मैं जला उस मशाल की तरह  ..................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

शराबबंदी के लिये लड़ाई बेईमानी है

दारू ही दारू अब बिकेगी अब मेरे पहाड़ में
इस दारू के खिलाफ क्यों रोज लड़ रहे हैं हम इस पहाड़ में

बजार बजार में अब दारू की दुकाने खुलेंगी बिकेंगी
घुस लेकर देकर दून में अब आबकारी नीति जो यंहा बदलेगी

छलकेंगे जाम अब और रंगीन होगी उत्तरखंड की शाम
पहले ही टूटे हुये हैं इस बार तो हम चूर चूर हो जायेंगे

अपना कोई है जो इस गुलशन को इस तरह उजाड़ रहा है
देवभूमि को क्यों वो गन्दी राजनीती के खेल का शिकार बना रहा है

मेरी बेटी ब्वारी कब तक यंहा अकेली इस दारू के खिलाफ लड़ेंगी
हमारी आती जाती सरकारें ऐसे ही अपने चेहरे का रंग बदलेंगी

शराबबंदी के लिये लड़ाई यंहा पर बस अब बनी बेईमानी है
शराब के साथ जब इस तरह बहता वो रुपयों का पानी हो

दारू ही दारू अब बिकेगी अब मेरे पहाड़ में
इस दारू के खिलाफ क्यों रोज लड़ रहे हैं हम इस पहाड़ में

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कहो याद पुरानी

कहो याद पुरानी
एक गाँव था और उसकी कहानी है
नानी ने कही थी कभी 
अब भी मेरे वो जुबानी है
कहो याद पुरानी

रहते थे वहां हम सब मिलकर
ना इस तरह अब टुकड़ों  में जी कर
कुछ ना था पर सब कुछ था वो
अब सब कुछ है पर वो नहीं 
कहो याद पुरानी

प्रेम ही प्रेम था वंहा
बरसता था हाथों और बूढी आँखों से
अब खोजों क्यों उनको मै
माथे को जिन ओंठो हाथ ने चूमा था
कहो याद पुरानी

एक एक बात सच थी उस कहानी में
उस नूरानी आँखों की सयानी में
छलक जाती है अब भी उनकी याद
कैसा होगा अब वो मेरा पहाड़
कहो याद पुरानी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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आज भूल से रख दे कदम

आज भूल से रख दे कदम
वो हम दम मेरे
देख अब भी वहीँ बैठे मिलेंगे हम
वो हम दम मेरे
आज भूल से रख दे कदम

रूठे रहोगे तुम कब तक ऐसे
हम से छुपोगे तुम कब तक ऐसे
हम तो ऐसे ही बैठे रहेंगे तुम्हरी राहों में सनम
वो हम दम मेरे
आज भूल से रख दे कदम

हम तो बैठे हैं बैठे ही मिलेंगे
तुम ही तो हम से दूर गये सनम
देख तुझे देखे बिना ना निकलेगा ये दम
वो हम दम मेरे
आज भूल से रख दे कदम

जब  तक ना तुम आओगे
हम उस वक्त तक ना जायेंगे
दे दे तू दीदार अपने चेहरे का सनम 
वो हम दम मेरे
आज भूल से रख दे कदम

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परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी

परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी
खिंचाव तनाव साथ रोज अब मुलाकातें होती है मेरी

कैसा झंझट झमेला है वो तो हर हाल में अकेला है
चिंता, घबराहट का यूँ लगा रहता है लगातार मेला है

किसने रचा और यंहा किसने खेला ये खेला है
परेशानी का ये रंग क्यों होता वो सबसे अकेला है

कठिन है ये डगर बड़ा मुश्किलों से भरा है ये सफर
खीझ कर ही क्यों ना इस पर साथ चलना है हम सफर

परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी
खिंचाव तनाव साथ रोज अब मुलाकातें होती है मेरी

बालकृष्ण डी ध्यानी
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अय रियली  मिस यु मय उत्तराखंड

उत्तराखंड को लगे आज
सवेरे सवेरे भूकंप के झटके
पहाड़ मेरा बेचारा
यंह इस तरह ही रोज खाये लचके

देखो बादल फटे कभी
भूस्खलन के यंहा बड़े नखरे
सड़क फटे कभी बीच से यूँ ही
नदियों के वो उलझते रिश्ते

करोड़ों रूपये यंहा बस इस तरह जलते
एक पल भी ना जाने वो क्यों ना टिकते 
कल ही बना पुल आज बह जाये हँसते
उत्तराखंडी देखता रह जाये बस तरसते

देख तकलीफों को वो भी यंहा से खिसके
ऐसे हैं मेर पास कितने बड़े बड़े भगोड़ों के किस्से
करते हैं तंज अपने पर ही यूँ वो इस तरह
पूछ ले कोई उन्हें शर्म आती खुद को पहाड़ी कहने से   

पलायन के मगर बने खूब पक्के रस्ते
एक गया भी नहीं दुसरा चल दिया उसी रस्ते
फिर जाके वो भी मजबूरी में कह देते हैं दूर से
अय रियली  मिस यु मय उत्तराखंड

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आ रहा  है याद फिर .......

आ रहा  है याद फिर
वो गुजरा जमाना फिर मुझे
ले जा रहा  है वो साथ फिर
उस पुराने ठिकाने वो फिर मुझे
आ रहा  है याद फिर..........

वो बादलों की आढ़ में चाँद छुपा है आज फिर
टिमटिमाते सितारों की वो झिलमिलाती औ रात थी
शायद उनको अहसास था तुम्हारे आने का यंहा
आते ही निकल आया था वो चाँद बादलों की आढ़ से
आ रहा  है याद फिर..........

वो बैठना हम दोनों का एकदूजे के इतने समीप
इन हाथों को थमना एक दूसरे के हाथों में यूँ ही
तुम्हारा सिर वो गिर जाता था मेरे कन्धों के सहारे में
ऐसे ही बिता जाती थी वो रातें बस तुम्हारे प्यार में
आ रहा  है याद फिर..........

वो भी तो क्या मौसम थे
गुजर जाते थे बस यूँ  ही वो  तुम्हारे  साथ में
बरखा ना ना शीत ना ग्रीष्म का ना था हम पे कोई असर
बस हम यूँ ही भीग जाते थे हर मौसम तेर प्रेम की बरसात में
आ रहा  है याद फिर..........

अब तो ये रातें मेरी कटती नहीं
आज वो चाँद भी निकला मेरा बेवफा मगर
अब हर रोज मेरी अमावस  की काली रात है
जब से वो तेरा हाथ इन हाथों से छूटा जिधर
आ रहा  है याद फिर..........

बालकृष्ण डी ध्यानी
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