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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
June 18 at 10:16am ·

बात दिल में लगी तू ने जो भी कही

बात दिल में लगी तू ने जो भी कही
आँखों से बह गये अश्क वो भी कह गये यही
बात दिल में लगी तू ने जो भी कही

बहते हैं उन्हें अब जी भर के बह लेने दो
जुदाई उनकी अब अकेले अकेल सह लेने दो
बात दिल में लगी तू ने जो भी कही

एक तू ही तो था मेरा और कोई नहीं
उन हाथों से हाथ छूटते ही इस दिल ने कहा
बात दिल में लगी तू ने जो भी कही

जुबान खामोश, आँखें गुमसुम हो गयी
वो खोजती नजर बस दूर तक देखती रही
बात दिल में लगी तू ने जो भी कही

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
— with Mahi Singh Mehta.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
June 17 at 12:24pm ·

बात करना जरूरी था

बात करना जरूरी था
मेरे लिये
तुम से मिलना जरुरी था
मेरे लिये

फासले बढ़ जायेंगे
बढ़ जायेगी ये मजबूरियां
फिर भी ना चाहे
तड़पायेंगी ये दूरियां
ये दूरियों मिटाना जरुरी था
मेरे लिये
बात करना जरूरी था
मेरे लिये

ना दुआ काम आयेगी
ना ये दवा तब काम आयेगी
जब नासूर हो जायेगा जख्म
ये जिंदगी भर के लिये
वो घाव होने से पहले वो दवा जरुरी थी
मेरे लिये
बात करना जरूरी था
मेरे लिये.......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी
7 hrs ·

उत्तराखंड में है गाँव मेरा

उत्तराखंड में है गाँव मेरा
मै उस से जुदा वो सब से जुदा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

कहते हैं वहां पे दिखता है खुदा
मन में बसा वो मेरे वो क्यों हो गया जुदा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

कंकड़ कंकड़ बोलता है वहां
मै एक कंकड़ वहां क्यों ना बोल सका
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

ये बहती हवा उसके होने का अहसास दे
जा यंहा से बह के वहां जा के मेरा प्यार दे
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

अकेला यंहा मै है अकेला वहां वो
फासले बढ़ गये क्यों सीने गढ़ गयी दूरियां
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

पूछों किस को है ये किस की खता
चुप हूँ मै अब वो भी अब चुपचाप खड़ा
उत्तराखंड में है गाँव मेरा

डर है मुझे वो दिन ना आ जाये कहीं
ना हम कहें कभी की
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा
उत्तराखंड में था कभी गाँव मेरा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

मेरी अनुभूति
शब्द अपने आप देखना आज मेरे साथ आयेंगे
भेंट चुपके से मेर संग वो कर जायेंगे
कब से बैठ हूँ मै उनके इन्तजार में ये कलम पेज लिये
इस भक्त को दर्शन देने वो जरूर आज आयेंगे
ढूंढ़ना उनको इस तरहं मेरा व्यर्थ ना जायेगा
देखना एक दिन मेरे शब्द का भी सुनहरा वक्त आयेगा
बरसात होगी शब्दों की आज ये दिल से लगता है
काले काले बादल नभ में आ कर जो मुझ से कह रहे हैं
मेरी कविता में अपने दो बूंद वो बरसा जायेंगे
वो कैसे मुझे आज इस तरह सूखे सूखे भीगा जायेंगे
चुपचाप अकेले में जब मैंने अपने मन की आँखें खोली
एक एक सजीव निर्जीव मन मुझ से अब शब्द बन बोले
देखा मेरा इस तरहं निहारना शब्दों को ना व्यर्थ गया
एक शब्द तुमने भी पढ़ मेरे संग और अनुभूत किया
बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

दिल से निकले पहाड़

दिल से निकले......निकले पहाड़
गंगा जैसा है  ...... वैसा ही है मेरा प्यार
उड़ता गगन है दिल ये मेरा 
मै तो मग्न हूँ क्योंकि ये है मेरा

दिल से निकले......निकले पहाड़

खिलते हैं फूल यंहा .... यंहा खिलते हजार
मिल जाये दिल यंहा .... यंहा जो आ जाये एक बार
असीम सुख शांति ले खड़ा है ये हजारों साल
देख ले कोई उसे उसे हो जाये पल भर  में ही प्यार

दिल से निकले......निकले पहाड़

मैं ना कुछ कहूँगा तू ही आके यंहा सब सुन ले ना यार
कैसे निरंतर बहता है वो झरना ले साथ अपने इतना प्यार
ना समझना लेना तू की ये है कोई मेरा नया व्यापर
यंहा  बस दिल का दिल से सौदा होता है मिलता है बस प्यार

दिल से निकले......निकले पहाड़

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ये नियत   मेरी

रंग बदले
ढंग बदले
नियत  ना बदली जाये रे

गंगा नहा  ये
चाहे काबा पाये
वो पाप कैसे उतर जाये रे

अपने बदले
पराये बदले
मन मन में घुलता जाये रे 

सब बिछड़ जाये यंह पर
पापा पुण्य पीछे आये रे
मिलता सब यंही पर बोल तू कैसे बच जाये रे 

एकांत में जब
तुझसे आ के वो कहेगा
पल पल का हिसाब तेरा तू कहां ले जाये रे

रंग बदले
ढंग बदले
नियत  ना बदली जाये रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

कोई तू खुदा  नहीं  है 

कोई नहीं कहता  की वो बुरा  है
मैं भी नहीं  कहता की मैं  भी बुरा  हूँ

हाव भाव  तेरे सब कुछ वो कह जाते हैं
जुबान नही हैं  उन शब्दों  में फिर  भी बोल जाते  हैं 

आँखें सब अपने आप तेरी बयां कर जाती है
बोलते ही बातें सब तेरे पिछले निशां बता जाती  हैं

एक एक कदम तेरे अक्स का जिक्र करता  है
हाथों का मिलाना तेरे मुश्किलों का  फ़िक्र  करता  है

हर अदा तेरी कुछ ना कुछ अब कह जाती है
नजरें चुरना वो इस तरहं तेरा सब कुछ बता जाती है

कहने से ही स्वभाव मात्र झलक जाता है
आँखों का  पानी  तेरे दर्द  का अंदाज लगा देता है

अकेले  में तेरा रहना  वो दर्द  जगा देता  है
साथ साथ वो इस तरहं तेरा रहना वो दूरियां दिखा देता  है

समय से  कुछ  भी अब  तक छुपा  और छूटा  नहीं  है
इंसान  है अब  तक तो  कोई तू खुदा  नहीं  है 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कोशिश की थी मैंने मगर

कोशिश की थी मैंने मगर
नाक़ाम क्यों वो रह गयी
चाह मैंने उस मंजिल पे पहुंचना मगर
बीच राह में ही वो क्यों छूट गयी
कोशिश की थी मैंने मगर

सांसें तब भी साथ मेरे सांसें अब भी पास हैं  ...... २
आता जाता है यूँ पड़ाव जीवन का ऐसा होता कई बार है 
ना समझना कभी तुम ये हार ही  तुम्हरी आखरी हार है
कोशिश की थी मैंने भी मगर

याद रखना हरदम यही कोशिशें यें कामयाब होती हैं  ...... २
सपना हर कोई यंहा जी भर देखता ,पहला कदम जो उस पथ रखा जिसने आज है
मंजिलें मिलती है उसको ही सपनों को देखना उसका ही अधिकार है
कोशिश की थी मैंने भी मगर

निराश हो ना जाना पथ से तनिक पथिक तू भटक ना जाना रे  ...२
असफलता तेरी सीढ़ी,सफलता की एक दिन मिसाल बनेगा तू वो की मील  दीवार है
ले सहारा तेर पद चिन्हों का अनगिनत पद तेरे पीछे पीछे आज है 
कोशिश की थी मैंने भी मगर

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

दो बूंद जवानी लिख दूँ
आज अपने लहू से तेरी कहानी लिख दूँ
लहराते रहे इसी तरहं तू इस अहले चमन में
नाम तेरे मैं अपनी सारी जिंदगानी लिख दूँ

सभी मित्रो को ६९वे स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!
जय हिन्द... वन्दे मातरम

बालकृष्ण डी. ध्यानी

devbhumi

आने लगे हैं वो याद मुझे

आने लगे हैं वो याद मुझे
जैसे बैठे हों वो अब भी पास मेरे
आने लगे हैं वो याद मुझे  ......................

वो बात जो तूने मुझसे अब तक ना कही
गूंज रही है मेरे आस पास लगता है वो यहीं ही कहीं
आने लगे हैं वो याद मुझे  ......................

हर मौसम में अब उनका यूँ  दीदार होता
ये मौसम भी अब उनकी तरहं  रोज सजता  संवरता
आने लगे हैं वो याद मुझे  ......................

सांसों को वो मेरे वो अब महकाने लगे हैं
कैसे कैसे किस तरह मुझको वो अब याद आने लगे  हैं
आने लगे हैं वो याद मुझे  ......................

बालकृष्ण डी ध्यानी
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