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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी12 hours agoअब क्या करूँ

अफ़सोस होता है एका एक
जो कहता है  आज रात १२०० बजे बाद
पांच रुपये डीजल के भाव बढा दिये जायेंगे 
हमारे किसे से ओर रुपये निकल दिये जायेंगे   
संताप होता है जेब जब
आंखें विषाद होती है
महीने का सारा विचार जब ढहा जता है
अफ़सोस होता है एका एक ...............

गंभीरता की छटा हटने लगती है
क्लेश का बुख़ार सर चढ़ कर बोलता है
पीड़ा होती है जब कोई इस तरह बोझ देता है
उदासी और रंज की इस समय में   
अपने आप से खेद बुहत होता है
व्यथा की गाथा का पन्ना रोज खोलता है
अफ़सोस होता है एका एक...................

झक्की जिंदगी तब लगने लगती है 
अपना ही आप से जब लड़ने लगता है
परेशान फिरता नजारा जब घूमता है
खाली किसे तब नजर आने लगते हैं
विशवास अपना वो खो देता है
अपने आप वो अब कहने लगता है
हर और रिक्त रिक्त लगने लगता है
अफ़सोस होता है एका एक...................

अफ़सोस होता है एका एक
जो कहता है  आज रात १२०० बजे बाद
पांच रुपये डीजल के भाव बढा दिये जायेंगे 
हमारे किसे से ओर रुपये निकल दिये जायेंगे   
संताप होता है जेब जब
आंखें विषाद होती है
महीने का सारा विचार जब ढहा जता है

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत — with Shweta Dhyani and 49 others. Photo: अब क्या करूँ अफ़सोस होता है एका एक जो कहता है  आज रात १२०० बजे बाद पांच रुपये डीजल के भाव बढा दिये जायेंगे हमारे किसे से ओर रुपये निकल दिये जायेंगे संताप होता है जेब जब आंखें विषाद होती है महीने का सारा विचार जब ढहा जता है अफ़सोस होता है एका एक ............... गंभीरता की छटा हटने लगती है क्लेश का बुख़ार सर चढ़ कर बोलता है पीड़ा होती है जब कोई इस तरह बोझ देता है उदासी और रंज की इस समय में अपने आप से खेद बुहत होता है व्यथा की गाथा का पन्ना रोज खोलता है अफ़सोस होता है एका एक................... झक्की जिंदगी तब लगने लगती है अपना ही आप से जब लड़ने लगता है परेशान फिरता नजारा जब घूमता है खाली किसे तब नजर आने लगते हैं विशवास अपना वो खो देता है अपने आप वो अब कहने लगता है हर और रिक्त रिक्त लगने लगता है अफ़सोस होता है एका एक................... अफ़सोस होता है एका एक जो कहता है  आज रात १२०० बजे बाद पांच रुपये डीजल के भाव बढा दिये जायेंगे हमारे किसे से ओर रुपये निकल दिये जायेंगे संताप होता है जेब जब आंखें विषाद होती है महीने का सारा विचार जब ढहा जता है बालकृष्ण डी ध्यानी देवभूमि बद्री-केदारनाथ मेरा ब्लोग्स http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत2Like ·  · Share

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बालकृष्ण डी ध्यानी सोच गढ़ देशा की

बैठी बैठी की क्या सोचणी छे.
बैठी बैठी की किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बादल फटयाँ गढ़ देशा मा
अपर भै बन्द छोडीकी गै कै देशा मा
अन्ख्युं मा बस्ग्याल छोडीकी बोई
उत्तराखंड भी आज रोणू छा
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

उत्तरकाशी,कपाल कोट
रूद्रप्रयाग कु उखीमठ दैवी विपदा घ्याल रोणू छा
आपरा समण कदगा अपरा हर्ची
अन्ख्युं मा बस बल बरखा झरकी रोणी छा
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बोगी जालो सरू गढ़ देशा ईणी
विचार कै बेटा ना गै अब बी बेल
अपर अपरा मा ना लगी रै छोछा
गढ़देशा की भी तू अब सोच   
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बैठी बैठी की क्या सोचणी छे.
बैठी बैठी की किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ "पुरानी किताबों का ढेर"

क्या करे ....कोई ना सुने मन की
बता दिल क्या करे .......
धड़कती है ...धडकन शब्द सब मौन
बता दिल क्या करे .......

रचनाओं के बोल कबाड़ी की गठरी खोल
बता दिल क्या करे .......
कविता छापी अब चुपचाप सुस्ता रही
बता दिल क्या करे .......

मुँह बाहर की ओर अंदर क्यों शोर
बता दिल क्या करे .......
ज्ञान की जलती बाती के नीचे कोइ ओर
बता दिल क्या करे .......

रचनाकरों के रचनाओं का वो छोर
बता दिल क्या करे .......
ढेर ही ढेर है पडा अब तेरे चाहों ओर
बता दिल क्या करे .......

क्या करे ....कोई ना सुने मन की
बता दिल क्या करे .......
धड़कती है ...धडकन शब्द सब मौन
बता दिल क्या करे .......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ देख लो

देख लो लुट गया कोई
देख लो ओर कोई लुट रहा अब भी 
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो दर्द का बहता दरिया
देख लो रोता हुये पहड़ों को 
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो प्रगती के नाम छला
देख लो उनका ही यंहा दमन भरा
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो रुदन का स्वर हर घर से आता हुआ
देख लो  बस पहड़ों पर मातम छाता हुआ
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो दर्द का अहसास अब तुम भी करलो
देख लो देखकर दो आंखें नम तुम भी करलो
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो सफ़ेद धारीयों को उनकी राजनीती को
देख लो राजा बिन तड़पती इस प्रजा को
देख लो अब तुम भी देख लो

देख लो लुट गया कोई
देख लो ओर कोई लुट रहा अब भी 
देख लो अब तुम भी देख लो

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ प्रथम पूज्य नमो नमः

आरती बाल गणेशा की
पार्वती तन मल चंदन की
पिता मात्रत्व छया की
प्रथम पूज्य गण देवा की
आरती बाल गणेशा की ......

लाडू मोदक खूब खाये
वाहन मूषक अति भाये
गज शीश धड पर सोये 
प्रथम पूज्य गण देवा की
आरती बाल गणेशा की ......

तीर्थ भ्रमण असमर्थ पाये
ज्ञान की ज्योत जलाये
ले परिक्रमा माता-पिता की
यज्ञ में प्रथम पूज्य वर पाये
आरती बाल गणेशा की ......

दुःख हर्ता सुख कर्ता हरी
रिद्धी सिद्दी के तुम हो स्वामी
मै मती मंद अब द्वार तुम्हरे
प्रभु हरो अब कष्ट हमारे 
प्रथम पूज्य गण देवा की
आरती बाल गणेशा की ......

आरती बाल गणेशा की
पार्वती तन मल चंदन की
पिता मात्रत्व छया की
प्रथम पूज्य गण देवा की
आरती बाल गणेशा की ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ
Tuesday
एक ओर क्रान्ती

एक आन्दोलन और होना चाहीये
मद मस्त घटाओं का मोड़ा होना चाहीये
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

खल बल दल के साथ अहिंसा के पल के साथ
जोश जूनून उमंग के साथ पूरा जोर होना चाहीये
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

पहाड़ के लिये उसके लूटे अधिकार के लिये
गैरसैण को भूले उन आपनो को जगाने के लिये
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

क्रान्ती की मशाल फिर अपनी हाथ में थाम
चल फिर कदम से कदमताल कर कुच कर
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

मट्टी फिर पुकार रही पहाड़ कर राह सिंहनाद
उठो पहाड़ के वीर सपूतों करो दिल्ली की ओर प्रस्थान
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

आन है हमे अपने पूर्वजों की क्रान्ती के उस सपने की
रक्त रंजित हो जायेंगे गैरसैण अब हम राजधानी बनायेंगे
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

सोच ना तो ,बहुत सोच लिया पहड़ों में तो बहुत सो लिया
जगा तेरी जागने की बारी आयी है चल निकल पड़ क्रान्ती पथ पर
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

एक आन्दोलन और होना चाहीये
मद मस्त घटाओं का मोड़ा होना चाहीये
एक आन्दोलन और होना चाहीये ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
Tuesday
यूँ ही टूटकर

यूँ ही टूट- टूटकर के गिरा वो आस ही पास
अरमानो का अधूरा अधूरा सा वो साथ ...२
अश्क से भीगी थी वो रात वो बात
अल्फ़ाजा का कौन देगा यंहा साथ .....२
यूँ ही टूटकर.......

उक़ूबत का समा जल जलकर अब बुझने लगा
उजाड़ बंजर पर वो हल चलने लगा ..२
रह रहकर उफ़्क पर उम्मीद से बाकी रही
उरूज पर उरियां का उबाल आता राहा ..२
यूँ ही टूटकर......

एहतियाज ऐ ऐयाश ऐहतमाम मै
इज़्ज़त का इज़्हार उनसे हो ना सका..२
घुंगुर यूँ ही बजते रहे इक़रार मेरा नाचता रहा
इत्तिका इत्तिफ़ाक़ पर गर यकीन आता राह..२
यूँ ही टूटकर......

यूँ ही टूट- टूटकर के गिरा वो आस ही पास
अरमानो का अधूरा अधूरा सा वो साथ ...२
अश्क से भीगी थी वो रात वो बात
अल्फ़ाजा का कौन देगा यंहा साथ .....२
यूँ ही टूटकर.......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
Tuesday
कै बेल ऐ अबैर ...

आज सवेर सवेर
किले वहगै...ऐ देर
डंडू मा कोयेडी छायीं चा
नींदी मा सुपुनीयुं मा
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा

तेरी याद तेरी खुद
सदनी दगडी दगडी ही ...रंहदी
यकुली मी..... जब रेंदू
आंसूं तल चुल जाँदी
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा............

दोपहरी को घाम
ना मिल्दो ......यख आराम
वो डाली की छेलू
याद दिलाणु..फर फर साफा तेरु
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा............

ब्योखुनी को घाम
राती मा...... जब झोली जांद
तेर ही याद ..याद सरला
दीण थै ढोली जांद
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा............

झील झील तारा ... दूर यख
कली रात कु ....कालू अंधारु
जुगनी सी तेरु खुद सरला
तेर माया थै चंम चम चमकंद
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा............

आज सवेर सवेर
किले वहगै...ऐ देर
डंडू मा कोयेडी छायीं चा
नींदी मा सुपुनीयुं मा
कै बेल ऐ अबैर
सरला तू अयींचा

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथMondayतू जै कै परदेश भी बेटा

सदनी ऐ दिण ईणी ही...... गैन
तू कै देश तू क्ख्क भी........रैण
तू जै कै परदेश भी
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

जापान.... जर्मनी बल .....स्विजरलैंड
अबुधाभी सउदी बल..... बाहरेन
तू जै कै परदेश भी बेटा
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

वख भी खुदालू तेरु .......उत्तराखंड
दौडी दौडी तू क्ख्क तक..... जैण
तू जै कै परदेश भी बेटा
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

विदेशी टक्का की तैमा ......माया बहुँत
देखुल मी भी कैमा मा .... माया बहुँत 
तू जै कै परदेश भी बेटा
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

तू छोडीकी गै और बोल कुछ.... णीच यख
मी पूछदू तैथै अब क्या सब छे.......क्या वख
तू जै कै परदेश भी बेटा
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

अपरू माटु त अखेर आपरू....... ही रैन
गंगा बोयी मा बोगी जाला पाप... या तरेण
तू जै कै परदेश भी बेटा
तेरु गढ़ देशा तेरु पीछणे ही.....  ऐंण

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
September 16
सोच गढ़ देशा की

बैठी बैठी की क्या सोचणी छे.
बैठी बैठी की किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बादल फटयाँ गढ़ देशा मा
अपर भै बन्द छोडीकी गै कै देशा मा
अन्ख्युं मा बस्ग्याल छोडीकी बोई
उत्तराखंड भी आज रोणू छा
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

उत्तरकाशी,कपाल कोट
रूद्रप्रयाग कु उखीमठ दैवी विपदा घ्याल रोणू छा
आपरा समण कदगा अपरा हर्ची
अन्ख्युं मा बस बल बरखा झरकी रोणी छा
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बोगी जालो सरू गढ़ देशा ईणी
विचार कै बेटा ना गै अब बी बेल
अपर अपरा मा ना लगी रै छोछा
गढ़देशा की भी तू अब सोच
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

बैठी बैठी की क्या सोचणी छे.
बैठी बैठी की किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी ईजा यकुली बैठी किले रोणी छे.
बैठी बैठी की क्या सोचणी छे...२

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