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Garhwali Poems by Balkrishan D Dhyani-बालकृष्ण डी ध्यानी की कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 03, 2011, 12:06:15 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ
September 22
गढ़ बदलणु

गढ़वाल मेरु बदलाण लग्युं
आपरा पराया थै बिसरण लग्युं
भाग भागै की ब्योह कंण छ आज कल
नुणा नुणी सीखैसैर कंण छ आज कल ..२

कैल पढ़ाई कैल.... सीखाई..२
प्रेम की भाषा कैल बिंगाई
दोई नैना... चार कंण छ आज कल
भाग भागै की ब्योह कंण छ आज कल
नुणा नुणी सीखैसैर कंण छ आज कल ..२

गढ़ देश मेरु बदलण लग्युं ..२
प्रेम की बरखा मा बरसण लग्युं
सरूआम प्रेमी बाजार घूमण छ आज कल
भाग भागै की ब्योह कंण छ आज कल
नुणा नुणी सीखैसैर कंण छ आज कल ..२

लोक लाज त्यागी क्ख्क जाणा छ आज कल
रिती रिवाज बड़ों को मान होली जलणा छ आज कल
सैती पाली की बोई बाबा थै किले भुल जाण छ आज कल
भाग भागै की ब्योह कंण छ आज कल
नुणा नुणी सीखैसैर कंण छ आज कल ..२

गढ़वाल मेरु बदलाण लग्युं
आपरा पराया थै बिसरण लग्युं
भाग भागै की ब्योह कंण छ आज कल
नुणा नुणी सीखैसैर कंण छ आज कल ..२

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ
धैर्या बांध टूटा

धैर्या अपना खोने लगा
बाँध सारे खुलने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

धरती चुप ,पहाड़ बोलने लगा
आकर उसे कोई छेड़ने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

किसी ने उसकी धारा के वेग को रोका
मोड़ों को मोड़ ओर सीने को खोदा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

विरान अकेला छोड़ा
दूर तक उजाड़ा,दौड
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

अपना पराया खोया
अश्रु अश्रु संग ही रोया
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

धैर्या अपना खोने लगा
बाँध सारे खुलने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

देव भूमि बद्री-केदार नाथ
14 hours ago
कठपुतली खेल

अपने ही लगा रहा
बैठ अकेले से अकेला ठगा रह
कल्पनाओं पंख बीच ताला पड़ा रह
खुंठे मै खुद बंधा पड़ा रह
अपने में ही लगा रहा

उठाया मुझको उठ गया
सोच अपने से रूठ गया
उजाला था अँधेरा घिर गया
अकेला था,अकेला रह गया
अपने ही लगा रहा

खामोशी थी कुछ कह गया
पेड़ पैंसे से कैसे यंह लद गया
रिमोट था. कंट्रोल कर गया
कठपुतली खेल चल गया
अपने ही लगा रहा

अपने ही लगा रहा
बैठ अकेले से अकेला ठगा रह
कल्पनाओं पंख बीच ताला पड़ा रह
खुंठे मै खुद बंधा पड़ा रह
अपने में ही लगा रहा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
20 hours ago
आवा लुटा

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

रीता रीता वो डंडा कंठी
बंजा पुंगडा उघडा घाटी
कूड़ा मा लगा जीकडॉ का ताल

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

माया चाभी घुमाया सारा
तेडा-मेडा घुमैरी मोड़ा का धारा
कैकु बोलण सबुल कैल किनार

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

खुदेण खुदयाली सबूण भोरयाली
डैम का टुक तक आपरून लुटयाली
पलायन का बीज बल ओर पनप्याली

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

आवा लुटा प्रगती नाम १००% छुटाच
बोली लगीच अपरा बीजच ख्त्युंच
कैंम धैये लगाण कु आपोडच

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला


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देव भूमि बद्री-केदार नाथ
Monday
एक दिन सबुल

एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२
रै जाली रै जाली बस यख..२
तुम्हरो कियु कम
बाबा दादों को दियू नाम
एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२

डाली भी जमदी यख बल
सब दे जंद सब कुछ दे जंद
चोल्हो ढुंगा डाली पर
ढुंगा बदल बल डाला की माया ही अंद माया ही अंद
दादा भुल्हो ई बात तू किले भूल जंद किले भूल जंद
एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२

छोड़ा छाडीकी माटू अपरू
आपरू माटू किले छोड़ जंद , किले छोड़ जंद
माया दगडी वै मा माया किले णी अंद माया किले णी अंद
दोई आँखयूँ मा अंशुं बस हे ...............माया .२
कादगा अपरू थै तिल (गढ़ बिसराया )...३
बादमा मा पछतै की तिल क्या पाया तिल क्या पाया तिल क्या पाया
एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२

एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२
रै जाली रै जाली बस यख..२
तुम्हरो कियु कम
बाबा दादों को दियू नाम
एक दिन सबुल
माटू व्हैजाण यखी खापी जाण..२

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देव भूमि बद्री-केदार नाथ


देर सबैर

देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा आली
कब तक प्याली नलकों को पानी
पंतेद्र ऐकी ही वा.....तिस बुझली
देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा ही आली

देर हुंद सब दुरुस्त हुंदू
ऐ मण मील पैल क्ख्क सुणयाली
अब पुरी करण की बारी ऐई
म्यार भुल्हा तेण क्ख्क मोक लुकाई
देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा ही आली

देर देर क्दगा दूँण हुंदू
गढ़ देश तिल क्दगा फुंणडा होणों
आपरा हक अब मंगीले दी
गीच सील्युं क्या अब बोली लेदी
देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा ही आली

देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा आली
कब तक प्याली नलकों को पानी
पंतेद्र ऐकी ही वा.....तिस बुझली
देर सबैर हो भी जली
गढ़ राजधानी गढ़ मा ही आली


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अपने ही लगा रहा
बैठ अकेले से अकेला ठगा रह
कल्पनाओं पंख बीच ताला पड़ा रह
खुंठे मै खुद बंधा पड़ा रह
अपने में ही लगा रहा

उठाया मुझको उठ गया
सोच अपने से रूठ गया
उजाला था अँधेरा घिर गया
अकेला था,अकेला रह गया
अपने ही लगा रहा

खामोशी थी कुछ कह गया
पेड़ पैंसे से कैसे यंह लद गया
रिमोट था. कंट्रोल कर गया
कठपुतली खेल चल गया
अपने ही लगा रहा

अपने ही लगा रहा
बैठ अकेले से अकेला ठगा रह
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धैर्या अपना खोने लगा
बाँध सारे खुलने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

धरती चुप ,पहाड़ बोलने लगा
आकर उसे कोई छेड़ने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

किसी ने उसकी धारा के वेग को रोका
मोड़ों को मोड़ ओर सीने को खोदा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

विरान अकेला छोड़ा
दूर तक उजाड़ा,दौड
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

अपना पराया खोया
अश्रु अश्रु संग ही रोया
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

धैर्या अपना खोने लगा
बाँध सारे खुलने लगा
आज,हिमाला रोने लगा
दर्द बेकाबू होने लगा

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कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

रीता रीता वो डंडा कंठी
बंजा पुंगडा उघडा घाटी
कूड़ा मा लगा जीकडॉ का ताल

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

माया चाभी घुमाया सारा
तेडा-मेडा घुमैरी मोड़ा का धारा
कैकु बोलण सबुल कैल किनार

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
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खुदेण खुदयाली सबूण भोरयाली
डैम का टुक तक आपरून लुटयाली
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कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला

आवा लुटा प्रगती नाम १००% छुटाच
बोली लगीच अपरा बीजच ख्त्युंच
कैंम धैये लगाण कु आपोडच

कंन देखैणुच मयारू ऐ हिमाल
कंन देखैणुच मयारू कुमो-गढवाला


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