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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

त्री में जो भू-कम्प आया,उस पर लिखी इस रचना को गम्भीरता से पढें
मौन आभाश
क्यों आज हिमालय कांप गया,भू-कम्प की जंग तरंगों से
क्यों देवभूमि थर्राती है,यंहा अब इस दानव-दंग उमंगो से
क्यों परेशान है पर्वत भी, अब यंहा पराधीन के पंगों से
मौत का ताण्डव दिखता है,यंहा जलते दीपक मे पतंगो से
कौन निमन्त्रण देता हैे सरिता के तट पर बसने का
कौन निमन्त्रण देता है हर साल शिखर को धंसने का
कौन नियन्त्रण खोता है बाढों के भॅंवर बहावों का
ये भी तो एक तरीका है इस मौन धरा की आहों का
ना समझ विवेकी मानवता फिर भी पर्वत को घेर रही
दाखिल है आज सियासत में नाली, मुट्ठी की जोत बही
कब्जे में देवों की धरती क्यों राजनीति नर - मुण्डों से
उत्तराखण्ड क्यों पटा पडा है आज सियासी गुण्डों से
प्रकट प्रकोप प्रकृति का अपना अस्तित्व बचाने को
विध्वंश सदा से होता है नव - निर्मित सृष्टि रचाने को
समतुल्य सरस मानवता को प्रलय भी अंक लगाती है
व्यभिचार धरा में होता है विध्वंश स्वयं बन जाती है
इतिहास उठाओ पर्वत का ,बसता था कौन पहाडों में
सरिता ने किसे बहाया है उफान वेग की बाडों में
पाषाण चूर कर मिट्टी से मैदान बनाती आयी है
मानव के खातिर पर्वत ने ये समतल धरा बनायी है
ये देव धरा क्यों बिकती हेै अय्यास, वास के भावों से
आध्यात्म जगत की कुण्ठा है, नासूर स्वयं के घावों से
मठ,मन्दिर शिखर सुशोभित हेै शिखरों के शीश सरायों में
व्यभिचार प्रचार, प्रसार यहाॅं ,काषाय वस्त्र के सायों में
अब इस देव.भूमि में मानव को बसने का अधिकार नही है
यहाॅं रमण स्थली देवों की विषय, काम व्यभिचार नही है
ये प्रणय प्रेम का आलय है, अश्लील अधम व्यापार नही है
निष्कपट व्योम की छाया है,किंचित भी धुंध बयार नही है
अभिषाप मौन है शिखरों के नालायक समझ नही पाया
अब ये दण्ड,प्रचण्ड,घमण्डों का प्रलाप प्रलय ने ही खाया
ये मौन वेदना कुदरत की संवेदन सुर की बाणी है
नतमस्तक मौन हिमालय का अभिषाप धरा में प्राणी है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
February 6 at 12:27pm ·
नेता जिन ब्वोलि,
मैकु भोट जरुर द्येन....
ब्वोडा ब्वोन्नु,
किलै द्येण तुम्तैं भोट,
हे नेता जी,
यनु क्या फरकाई तुम्न,
जू हम तुम्तैं भोट द्यौला....
..कवि जिज्ञासू
6/2/2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
February 6 at 10:13am · New Delhi ·
हात अपणु ऊठावा,
पाड़ का बिकास का खातिर,
अळगस त्यागिक,
तय्यार ह्वे जावा,
एक घर कूड़ी बणैक,
पाड़ आवा जावा,
पाड़ तैं पीठ न लगावा
......कवि जिज्ञासू
6/2/2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
February 5 at 8:16pm ·
सुण हे दिदा,
मन रग्ग बग्ग होणु,
कै तैं अबरि जितौला,
यी चुनौ जब निब्टि जाला,
हे! फंसोरिक से जौला......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा ज़िग्यांसू
5/2/17, रचना-1066

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
13 hrs ·
खुबसूरत पिथौड़ागढ की दिखेणी सुंदर शाम।
भटेड़ी गाँव समणी, पर्वतराज कु हिम धाम।
काली गंगा बटणि, नेपाल अर देवभूमि नाम।
हर गंगे कनी च, मुल्को की तीस बुझाणो काम।
स्वर्ग यखी दगड़्यो,बटुंणु च इंसानो कु काम।
नमन प्रकृति कु च,निर्विवाद करणी अपणु काम।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
February 9 at 11:31pm ·
क्वी देघाट बटि अयु,क्वी अयू पिथौड़ागड़ सी।
भलु लगणु भै आज,एक दुसर थै मिलण सी।
देणु भी कुछ जरूरी, तुम थै पुरणी याद सी।
छ्यूती देणु तुम थै,धरयां स॔म्भाली सैंधण सी।
छ्वटी भेंट दगड़्यो,जुड़ी पुराणी कुछ याद सी।
रोज आंदु दिन इनु,ऑदु पहाड़ क्वी अपणु सी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
2 hrs ·
खूबसूरत गैना गाँव, सरल हृदय मनखी।
सुखी संसार दुन्या म, त च बस्यू यखी।
मवसा भरपूर छिन,शान्त चित रैंदु यखी।
जिन्दगी जीण अपणी,त भै आई जाणु यखी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

घिरयु डांड्यो सी,पवित्र गदेरा कु जल।
माछा भात कु प्रसिद्ध, शहर यु च थल।
मेजबानी च भली,गंगाजी की कल कल।
उत्तरणी कु कौथिग, बुलेंद यख म्यल।
शान पहाड़ो की च,देवतो कु च सुफल।
आण जरूर कभि, भेटणा कु खुणी थल।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
February 8 at 7:29am ·
लगि प्रवासी मन सी अब,अपणा गौं बचाणा कु।
पकड़ी बाटु गौं कु,चुनाव म भूमिका निभाणा कु।
फर्ज सबको बड़दु भै,उम्मीदवार थै जिताणा कु।
जौन ए बेड़ा उठयु,अपणी विरासत संभलणा कु।
वक्त अब कुछ कम,इंतजार आप का आणा कु।
मौका हथ भै बंदो,पहाड़ो म सरकार बनाणा कु।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
February 9 at 11:08am ·
उचि हिवली कांठी, बन्या दिवतो का धाम।
ए वार बद्री केदार, तै पार च माँ नंदा धाम।
गढ कुमाऊँ मिलणा, बनाणा देवभूमि धाम।
अमर पंच प्रयाग छी, विख्यात चार धाम।
भूमि तपस्वीयो की, ऋषि मुनियो कु धाम।
प्रार्थना दिवतो सी, चमकणु रौ तेरू नाम।