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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Gyan Pant
March 2 at 3:51pm ·
जिम कार्बेट पार्काक् शेर ...
ऐला गर्मिन में
घर आला त देखिया
..... भ्यावहान् मोटर
तुमारै मोव थैं पुजि गे
पैराड़ पन इखौर इखौरै
थल , जयनगर होते
पिठौरगड़ न्है जैं ....
वां बटी कां जैं
मैं के नि कै सकन्यूँ .....
ऐला गर्मिन में
घर आला त देखिया
मोवै थैं नल लागी छ
पाँणि इफरात है रै
रामबाड़ि में
डिस्पेन्सरी खुलि रै
डाक्टर भले नि आवौ मगर
कंपोटर 'कि पोस्टिंग है रै
आ्ब दवायि छनै या न्हाँतिन
मैं के नि कै सकन्यूँ .....
ऐला गर्मिन में
घर आला त देखिया
जां तुमैलि बारखड़ि सिकी
उ इस्कूल
आ्ब इंटर है ग्यो
खेल मैदान और
कैन्टीन ले खुलि गे
कुर्सी - मेज और
मास्टर ले सब भै मगर
पढाई हुँछी या न हुनि
मैं के नि कै सकन्यू ....
ऐला गर्मिन में
घर आला त देखिया
पहाड़न् में
नेता भै
नेतागिरी ले भै मगर
मनखिनां नाम पर
गौन में
छा्र फोकी रयी भै ।

By - Gyan Pant

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

रौनक छै कभि द्वार ,ढकरियो कु छौ बासु मी।
राजा थोकदार धनी,खुशी सी बनांदा छाया मी।
आण्या जण्यो की,तब वासु कु सारू छौ मी।
बदली दुन्या बनी सड़क, इकल्वास प्वड़ु मी।
गदेरों का बाटा मिटी, बदलाव देखणु रौ मी।
गाँव खाली होण लगी,बस आंशु बगाणु रौ मी।
कै एक कु नि छयु भै, सार्वजनिक सम्पति मी।
अपणी कूड़ी नि सम्लणा,किलै पूछौ क्वी मी।
पर हाँ विरासत छु,याद पुरण्यो की दीणु रौलु मी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
March 3 at 12:41pm ·
गितारो कु गीत,छै कवियों की कविताआश।
नौन्यालु खुड़ि खेल,पात घस्यर्यो कु घास।
कल्पना प्रेमि की, त्वे जनि बांद की आश।
लगदी लटल्यो त,बणदी चकड़ेतो की फांस।
फंसेदी कोल्हु बीच,बणदी भै स्वाद सी रस।
गुण देखी त्यारा,खुश विदेशी हे फूल बुरांस।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बळ मी मतदाता छौं

बळ मी मतदाता छौं..
जणदू छौं मी भी खूब.
चुनौ कु बगत च अचगाळ,
इलै देवतों जनु पुजेणु छौं...

मान मनोबल हुणु च,
बातों मा खूब अल्झेणु च.
ब्याली तक पिचगाणु छायी,
आज ऊ गौल़ा भेंटेणु च...
पर मी बातों मा नि आणु छौं..

हाथ, फूल, कुर्सी, सैकल, हाथी,
छोटा दल, निर्दल सभ्या साथी.
नेता अगने-२, पिछने-२ चमचा,
मुंड टोपल़ा, गात पर खादी...
सभ्युं थै गौर से देखणु छौं..

पोटलों मां बांधी रख्यां वादा,
अर बुशल्या भाषण देणा छी.
पांच साल जू पूरा नि काया,
ऐंसू ऊनि लेकि फिर अयां छी...
टक्क लगै की मी सुणनों छौं..

भै-बैण्यों कु रिश्ता जोड़ना,
काका-काकी, बोड़ी-ब्वाडा ब्वना.
हाथ ज्वड़े खूब हूणी च,
मीठी-मीठी छ्वीं-बता कना...
बळ मी तुम्हरू ही अपडू छौं..

ब्याली तक यूं जै गौं कु,
अता न पता छायी..
बाटू बिरडीगे छाया ज़ख कु,
अचाणचक ऊ याद आयी...
ब्वना हम भी ये गौं क छौं..

आवा दिदों-भुल्यों आवा,
मतदान जरुर कन्नु जौंला.
विकास कारला जू पहाड़ कु,
इनु नेता थैं ऐंसू जितोंला..
सोच समझी वोट देणु जाणु छौं..

© 08-02-2017 (बुधवार)
अनूप सिंह रावत "गढ़वाली इंडियन"
ग्वीन मल्ला, बीरोंखाल, पौड़ी (उत्तराखंड)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मूसा बिरवाळु सी लड़ना छौ,
जु नेता ब्याली तक।
आज ऊंमा राम - लक्ष्मण सी,
भै - भयात ह्वेगेनी।
सोचणु रु मुंड मा हाथ धैरी की,
यु चमत्कार होई ता क्यान होई ?
फिर सुणि मिन बल,
चुनौ कु शंखनाद ह्वेगेनी।।

© 19-01-2017
अनूप रावत "गढ़वाली इंडियन"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

कुछ थै जग्वाल च, ग्यारह मार्च की।
कोशिश हमरि च,घास कटै खत्म की।
नि बदलेणा दिन, कथा ऐ सदानी की।
हर दा आश रैंदी,कुछ नयु होणा की।
उंगली पटै गे भै, स्याई लगै लगै की।
पर उम्मीद लगी, दथुली चले चले की।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
43 mins ·
एक डाम बणि न अभी, हैंकु बनाण किले च।
साठ साल टिहरी लगी,अब मन क्या आणु च।
नि भ्वरे प्वटकी टिहरी त,नजर अब पंचेश्वर च।
जनता तरसणी पर,बिजली भैर भ्यजेणी च।
ना ना नि हुण्या इनु,एक क्रान्ती बाट लगी च।
प्रश्न भै फिरि एक दा,पहाड़ी अस्मिता कु च।
उठो भै बंदो फिरी, यु वक्त एक क्रांति जरूरी च।
चाल थै कटणा कु,यूकेडी दगड़ खड़ु होणु ही च।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

रौनक छै कभि द्वार ,ढकरियो कु छौ बासु मी।
राजा थोकदार धनी,खुशी सी बनांदा छाया मी।
आण्या जण्यो की,तब वासु कु सारू छौ मी।
बदली दुन्या बनी सड़क, इकल्वास प्वड़ु मी।
गदेरों का बाटा मिटी, बदलाव देखणु रौ मी।
गाँव खाली होण लगी,बस आंशु बगाणु रौ मी।
कै एक कु नि छयु भै, सार्वजनिक सम्पति मी।
अपणी कूड़ी नि सम्लणा,किलै पूछौ क्वी मी।
पर हाँ विरासत छु,याद पुरण्यो की दीणु रौलु मी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat 

कभि डांडा छान्यो, कभि लखड़ो बूण म।
जंदरी ओखरयली, कभि चुल्लु फुकण म।
रैंदी पहाड़ त कुटम्बदारी,शहर त समाज म।
रूप च एक त,जीवन कई गुणों कु योग म।
न बराबरी कैरि सकदु,क्वी तेरी महानता म।
रूकदी पल पल भी,गर नि रैंदी तू घड़ि म।
फूल सी खड़ी पहाड़ो का,जीवन संघर्ष म।
रोज याद करदा,"नमन"च महिला दिवस म।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
March 6 at 10:07pm ·
एक डाम बणि न अभी, हैंकु बनाण किले च।
साठ साल टिहरी लगी,अब मन क्या आणु च।
नि भ्वरे प्वटकी टिहरी त,नजर अब पंचेश्वर च।
जनता तरसणी पर,बिजली भैर भ्यजेणी च।
ना ना नि हुण्या इनु,एक क्रान्ती बाट लगी च।
प्रश्न भै फिरि एक दा,पहाड़ी अस्मिता कु च।
उठो भै बंदो फिरी, यु वक्त एक क्रांति जरूरी च।
चाल थै कटणा कु,यूकेडी दगड़ खड़ु होणु ही च।