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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat
March 6 at 10:31am ·
कुछ थै जग्वाल च, ग्यारह मार्च की।
कोशिश हमरि च,घास कटै खत्म की।
नि बदलेणा दिन, कथा ऐ सदानी की।
हर दा आश रैंदी,कुछ नयु होणा की।
उंगली पटै गे भै, स्याई लगै लगै की।
पर उम्मीद लगी, दथुली चले चले की।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

म्येरा कविमन तैं बुरांस,
लग्दु छ अति प्यारु,
हैंस्दु मुल मुल डांड्यौं मा,
जख गौं मुल्क हमारु......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

March 4 at 7:30pm ·
पाड़ कु पाणी पेणु छौं,
पाड़ जवा अर तुम भी पेवा,
जल्मभूमि छ तुमारी,
तुम भी आनन्द लेवा.....
-कवि जिज्ञासू
4.3.2017

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

खित-खित हैंसी ल्हियां होरी मनाण से पैली,
दुःख-पिड़ा सब जगै दियाँ होलिका जगाण से पैली।
जम्मा नि सोचण कै कैन दिल दुखै होरी से पैली,
बिसारि कि सब गौळा भैटे जयाँ रंग लगाण से पैली।
कुजाणि मौका हज्जि कब ओ जीबन मा मेरा दगड़यों,
जिकुड़ी कु खौड़ सौरी दीण होरी का त्यौहार से पैली।
सभि दगड़यों का वास्ता "सुन्दर।।शांत।।सरल।।संगीतमय" होरी की अग्रिम शुभकामना छन

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड की कथा सुणौन्दो...........
अपरा गोरु कीला पर छोड़ी कि
कु करलू युंकी जग्वाल..
नेता बल सरा साल रै सेयुं
बछरू,बखरु लीगे स्याल..
सब्बि पार्टीयुं कु उचाणु धरयूं
ब्यांरा पर ऐसूं का साल...।
11 मार्च को रे दुध्या नर्सिंग
इबरी करि दे कुछ कमाल....
घोटाला करि की गैबुण छन होयां
चढ़ौ यूँ इबरी गैरसैण की उकाल...।
अपरा गोरु कीला पर छोड़ी कि
कु करलू युंकी जग्वाल..।।।।।
उचणु, धुपणु ,मुर्गा फाड़ेली
चौबट्टू करेली पिठाई न लाल..
जनता ढुंगा मा कपाल राउ फोड़नु
युंकु जम्मा नी हिल्दु बाल....।
हंकार ,जैकार , दोष, हन्त्या
यूँ पर नी लगदु क्वी चंडाल....
हे चौंल,धूप वाला बक्या
हमारू सैंकु करा सम्भाल...।
अपरा गोरु कीला पर छोड़ी कि
कु करलू युंकी जग्वाल..।।।।
पहाड़ की जनता तीस्यली रै मोन्नी
तेरु स्कूटर पैट्रोल पेणु रै चुण्याल...
अब ता जाग रे निहोणी करदरा
अब ता व्हे गेन सत्तरा साल..।
ढोल -जागर डौंर -थकुली
धरयाली नि सब्बि घँड्याल..
डाँडो माँ गदनों माँ तेरु छैल पूजी
पर अबि तक ऊनि छन हाल...।
उठ जा रे पहाड़ी भुला...
अब ता कुछ तू भी ब्वाल...।
अपरा गोरु कीला पर छोड़ी कि
कु करलू युंकी जग्वाल..।।।।।
- रोहित भट्ट ✒

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाल में होली उत्सव के कुछ प्रचलित गीत
मूल स्रोत्र श्री शिव शरण धस्माना ग्राम बौन्दर , पिन्ग्लापाखा
पुस्तक : डा शिवा नंद नौटियाल -----गढवाल के नृत्य गीत
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती
जब होली खिलंदर किसी गाँव में प्रवेश करते हैं तो वे गाते हैं नृत्य करते हैं
1-
खोलो किवाड़ मठ भीतर
दरसन दीज्यो माई आंबे -झुलसी रहो जी
तीलू को तेल कपास की बाटी
जगमग जोत जले दिन राती -झुलसी रहो जी
इष्ट देव , ग्राम देवता पूजा के बाद होली नर्तक गोलाकार में नाचते गाते हैं
जल कैसे भरूं जमुना गहरी जल कैसे भरूं जमुना गहरी
खड़े भरूं तो सास बुरी है
बैठे भरूं तो फूटे गगरी , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
ठाडे भरूं तो कृष्ण जी खड़े हैं
बैठे भरूं तो भीगे चुनरिया , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
भागे चलूँ तो छलके गगरी , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
यह अत्यंत जोशीला नृत्य गीत है जिसमे उल्ल्हास दीखता है और श्रृंगार भी है
इसके बाद भजन गीत है जो उसी उल्हास के साथ नृत्य-गीतेय शैली का है
-----2-------
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो जनम निवास जय देवी आदि भवानी I
कांगड़ा जनम निवास , जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो जौंला निसाण , जय देवी आदि भवानी I
कश्मीर जौंल़ा निसाण , जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो खड्ग ख़पर, जय देवी आदि भवानी I
बंगाल खड्ग खपर , जय देवी आदि भवानी I
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी I
--३--
यह गीत भी होली में प्रसिद्ध है . यह गीत श्रृंगार व दार्शनिक है
चम्पा चमेली के नौ दस फूला , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
पार ने गुंथी शिवजी के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
कमला ने गुंथी हार ब्रह्मा के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
लक्ष्मी ने गुंथी हार विष्णु के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
सीता ने गुन्ठो हार राम के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
राहदा ने गुंथे हार कृष्ण के गले में बिराजे
--४---
श्रृंगार व उत्स्साही रस भरा गीत है
मत मरो मोहन पिचकारी
काहे को तेरो रंग बनो है
काहे को तेरी पिचकारी बनी है, मत मरो मोहन पिचकारी
लाल गुलाल को रंग बनी है
हरिया बांसा की पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
कौन जनों पर रंग सोहत है
कौन जनों पर पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
रजा जनों पर रंग सोहत है
रंक जनों पर पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
---५--
जब होली खेलने वाली टोली होली खेल चुके होते हैं तो उन्हें होली इनाम मिलता है (पहले बकरा मिलता था , अब पैसा आदि ) और उस समय यह आशीर्वाद वाला नृत्य गीत खेला जाता है
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष ---१
बामण जीवे लाखों बरस
बामणि जीवें लाखों बरस --२
जिनके गोंदों में लड़का खिलौण्या
ह्व़े जयां उनका नाती खिलौण्या --३
जौंला द्याया होळी का दान
ऊँ थै द्याला श्री भगवान ----४
एक लाख पुत्र सवा लाख नाती
जी रयाँ पुत्र अमर रयाँ नाती ---५
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष
सौजन्य एवम आभार :
मूल स्रोत्र श्री शिव शरण धस्माना ग्राम बौन्दर , पिन्ग्लापाखा
पुस्तक : डा शिवा नंद नौटियाल -----गढवाल के नृत्य गीत

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

त्वै बुड्या को नाक लम्बो ( दो रूप में परिहासदार, मजेदार , हिलोरेदार लोक नृत्य -गीत )
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इंटरनेट प्रस्तुति एवं व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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त्वै बुड्या को नाक लम्बो
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी।
रै जा अ रै जा अअ चूची रै जा अ
कुछ नाक छिलण पड़ली
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी !!
त्वै बुड्या का फुल्यां जोंगा
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी। रै जा अ रै जा अअ चूची रै जा अ
त्वै बुड्या जोंगा मुंडण पड़ला
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी ! !
त्वै बुड्या को पेट बढ़यूं च
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी। रै जा अ रै जा अअ चूची रै जा अ
कुछ पेट घटौण पड़लो
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी !!
त्वै बुड्या की लम्बी दाड़ी
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी। रै जा अ रै जा अअ चूची रै जा अ
कुछ दाड़ी कटण पड़ली
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी ! !
त्वै बुड्या को लम्बो कोट
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी।
बुड्या - रै जा अ रै जा उन्नी करलो
जन्नी तू चांदी रै
नायिका - कुछ कोट काटण पड़लो
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी !!
तब्बी बुड्या को छोट्टू सुलार
त्वैकु बुड्या मैं रैंदु नी।
कुछ सुलार बढ़ौण पड़लो
तब्बी बुड्या त्वै मैं छोड़ू नी ! !
बुड्या - रै जा अ रै जा उन्नी करलो
जन्नी तू चांदी रै
नायिका त बुड्या ! त्वै मैं छोड़ू नी !!
( आभार व गीत सन्दर्भ - डा शिवांनद नौटियाल , गढ़वाल के लोकनृत्य -गीत पृष्ठ 304 )
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संग्राम बूड्या रूम झूम
संग्राम बूड्या रूम झूम त्वै बूढ़या मी ओंदु नी संग्राम बूढ़या रूम झूम।
त्वै बूढ़या कु लम्बू दाडू त्वै बूढ़या मी ओंदु नी।
दाडी दूडी पुन कटोलु फिर भी प्यारी छोडू नी।।
संग्राम बूड्या रूम झूम त्वै बूढ़या मी ओंदु नी..
त्वै बूड्याका गोरू भैसा त्वै बूढ़या मी ओंदु नी।
गोरू भैसा अगस्तमुनि चढ़ोलु फिर भी प्यारी छोडू नी।।
संग्राम बूड्या रूम झूम त्वै बूढ़या......
त्वै बूढ़या का पुगडा पटला त्वै बूढ़या मी ओंदु नी
पुगडा पटला बांझा रखलु फिर भी प्यारी छोडू नी।।
संग्राम बूढ़या रूम.......
Uma Bhatt द्वारा प्रेषित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ब्वगठ्या रै तु मान नि मान
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Poem by Riddhi BHatt
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ब्वगठ्या रै तु मान नि मान
सर्या पुजै त्यारा बान
क्वी ह्यनू च तेरि कैंदी
क्वी ह्यनू च रान
ब्वगठ्या रै तु मान नि मान....
डंगरी धरीं पळ्या कैकि
भद्वळि धरीं छळ्या कैकि
भगत बगछट हुयां छन
गंगाजल से धुयां छन
द्यबता नच्यां या नि नच्यां
वूंल मीट खाण
ब्वगठ्या रै तु मान नि मान......
खूब हुयीं चखळ - पखळ
गौं - गळ्या मा मरे धाद
नचै होण रात - भर
सुबेर खाण सुर्रा - भात
रीति पुटिगि कैरि कै
अयां छन मैमान
ब्वगठ्या रै तु मान नि मान.....
जगरी डौंर घुर्याणू च
डौंड्या ड्यबळा लुकाणू च
देवी मनी किटकताळ
नरसिंह ब्वनू म्यारू माल
फैलीं च बावन बयाळ
लग्यूं च मण्डाण
ब्वगठ्या रै तु मान नि मान.......
पाणि कु ल्वठ्या लेकि जगरी
मंत्र मनू गात मा
घेरा मर्यूं भक्तौं। कु
ज्यूंदाळ धर्यां हाथ मा
झड़बड़ - झड़बड़ कैर नथरि
यूंका जंदिन प्राण
ब्वगठ्या रै तु मान नि मान
सरया पुजै त्यार बान
रचनाकार ...रिद्धि भट्ट
{ Copyright...ridhi bhatt}
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

आनंद ब्वलु कि शान्ती, बुजर्गो की चौखट म।
मस्त च आज नव पीढ़ी, तुम्हारी धरी नींव म।
स्कूल चल्दु यख,भारत रत्न पंतजी कु नाम म।
मुंबई म परचम लगाणा,गोविंद तुमारू नाम म।
बदलदु समय चक्र भी,नि बदली विरासत म।
हिमालय कु नाम चलदु,आज भी असल्फा म।
हैसणा तुमारा आज, तुम्हरू ऐ लगयु बाग म।
लगदी मन की छ्वीई, पुरण्यो की विरासत म।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darsansingh Rawat

क्या जि पाई होलु मिन,ए गठबंधन कैरिक।
गाल प्वड़ी मेरू छोरा, ऐ का दगड़ि रै की।
छुटि मेरू अपणु डेरा,बुबा दगड़ी लैड़ि की।
काका बुआ भी छिटकी,ए गठबंधन देखिक।
कै मा लगाण मिन, भै अब अपणी खैरी की।
गाल प्वड़ि यु छोरा,यु गठबंधन भै कैरि की।