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Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 05, 2011, 12:00:34 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
September 9 at 9:33am

मुर्गा कनै गै? (चौथु अर आखरी भाग)

चार साल बटि वू जेल म छाया, सरकरि चिठि ऐगे।
चिठि म ल्यख्यूं छाई चरि च्वरों की सजा खतम ह्वैगे।

सजा खतम ह्वे, घार म वूंका खुशी मनाणा छाय।
घ्यपळी काका कु क्य जी ह्वालु गौं वळा डरणा छाय।

घ्यपळी काका अर चर्या चोर स्वारा भाई छाई।
घ्यपळी काका अर चरि चोरों की कूड़ी मिली छाई।।

चोरों का घर्वला गाडि बुक कैरिक माणा पौंछि गैं।
अपणा घार लिजाओ यूथै जेलरल हाथ जोड़ी दीं।।

अस्वाल बाडा ल वूथैं द्याख, भीड़ु पर बिलक्यां छाई।
हैलि हैलिक एक हैंक पर वू थ्वबडा ल मरणा छाई।।

जेल बटि ल्याकी वू चर्यूं थै गाडि म बैठा द्याई।
गाडि म बैठदी चरि चोरों थै कौंप हूणी छाई।।

भरमपाल डरैबरल अब गाड़ी चलै द्याई।
घरघरसूणिकि चर्या चोर सीट मूड जाणा छाई।

गौं पौंछिकि बालबचा भै बंध कैथै नि पछ्यणा छाई।
जनि ल्वखु थैं द्यखणा छाई वू झस झस डरणा छाई।। ।
पखडिकि गौं वळूं ल वूथैं घरौं म पौंछा दे।
अधा राती मा चरि चोरों कू कुकडू कू ह्वैगे।।

सैर्या गौं का लोग मिटीन, कनु असुुगुनुु ह्वैगे।
अधराती म एक न यख त चर-चर बांसी गे।।

हात मुख ध्वैक फजलेक लोग नवर्या म पौंछीगे।
हमरू गौं म हे भगबानो कनु असुगुनु ह्वे गे।।

नवर्या ल ब्वाल चार साल पैलीजु मुर्गा घळका द्याई।
वै मुर्गा म पांच पीढि पैल्यकु तुमरू पुरण्या छाई।।

अब इनु कैरो यूं चरि चोरों थैं हरिद्वार ली जाण।
अपुणु पुरण्य अर वै मुर्गा कि नारैण बलि कैरि आण।।

एक सूना की एक चांदी की द्वी मूरत बणाओ।
गंगा म ब्वगैक यूंथै मनखी की जूनिम ल्याओ।।

नवै ध्ववै क राजि खुशि सबी हरिद्वार बटि ऐगीं।
वीं ही राती म चरि चोर फीरि बांग दीण लैगीं।।

हैंकी राती मालिक जण्या झणि क्या जी ह्वैगे।
एकी रातिम --चर्या चोर तडम लैगे।।

थाणादार कुकरेती झट गौं म पौंछीगे।
डंडा द्यखैक ल्वखु खुणि ब्वाल यूँ थै क्या जी ह्वै।

अस्वाल बाडाल ब्वाल कुकरेती जी स्वैनफ्लू ह्वैगे।
तबीत गौं वलौं ल चर्यूं थै खड्वलुंद दबै दे।

अस्वाल बाडा अर कुकरेती जी ल ब्वाल ऊँ शांतिः,
प्याट ई प्याट ब्वाल भलु ह्वैगे।
भौत बण्या रैंद छाई नपकनाथ ई,
अब हम खुणि निझरक ह्वैगे, ऊँ शांति शांति।।
नवर्या -पुछ्यरु या बक्या।

नाम, जगा, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक :-09/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
September 3 at 8:24am

मुर्गा कनै गै? (दुसुरु भाग)

हैंक ब्यखुनी चरि चोरों की फीरि मती मोरी गे।
घुंगर्या बरांड एक जैरकन वूंल कची घटगै दे।।

कची का पुटग जांदी वूंकी लगण लैगे घाण।
ग्यारा सौ फीरि डांड द्यूंला घ्यपळी घपगाण।।

अधा राती मा बबडाट करदा घ्यपळी कु घौर कु गैं।
घ्यपळी कु घार समझी वूंल पदनौं का द्वार भटगैं।।

अस्वाल बाडा ल समझैकि वूंकू घौर कु पैटा दीं।
निरभग्यों की उल्टी खोपड़ी हैंक बाट लगी गैं।।

बियण्या टैम घ्यपळी काका का घार माैं पौंछी गैं।
काका भ्यार जयूंछौ वूंकू समधी थै सटगै गैं।।

काकि त पैली भग्यान ह्वै गेछै, भुलि भि ब्यवै दे।
मुर्गा कु सूंणिकी काका कु समधी मिलणौं अयूं रै।।

काका कु भितर आणु क्य ह्वैई समधी कणाणू रै।
घ्यपळी काका ल चट फोन मिलैक पुलिस बुलै दे।।

थाणा लिजैक चरि चोरों क वूंल मुर्गा बणै द्याई।
थाणादार कुकरेती जी वूंथै लगलि ठ्वकणा छाई।।

तबी बुनूंच "दर्शन "फीरि बडु ह्वैलु बडु जनु रै।
कमजोर ल्वखु की हाय लगद नाजैज ना सतै।।

नाम, जगा, घटना सब काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित@:-दर्शनसिंह रावत "पडखंडांई "
दिनांक 03/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मुर्गा कनै गै?

एक ब्यखुनी घ्यपळी काका कु मुर्गा हरची गे।
चार च्वरौंल चोरिकि वैकू, ब्वगच्या बणै दे।।

पल्या गैरी गोटम वूंल, कुमेटी कैरी दे।
चट्ट बणैकी चुपचाप खौंला कुकरुंद धैरि दे।।

ताळ माथि का गुट्यळौं थैं वूंल पैली सीण दे।
सींटी नि मार प्रेशर जनुकै बडु ढुंगु धैरी दे।।

चूला का चौछडि बैठिकि वूंकी कछडी लगी गे।
दमद्याट कैरिकि वूंल चूला मा झैळ लगाई दे।।

एक घडी मा कुकरकु पुटग गैस भ्वरेई गे।
भट्टम भट्टम गगडाट करदा कुकर उतडे गे।।

कुकरकु फैर ल छै जोळा की गोट उजड़ी गे।
तीन चोरों की टंगडी टुटी एककु मुंड फुटिगे।।

गोर बाखरा तांद समेत सार्युं मा चली गैं।
अधा राती मा गौं का लोग भि गोटम पौंछी गैं।।

गोटम पौंछिकि गौं वलूं कू गबलाट ह्वै गे।
तब पता चाल घ्यपळी काकाकु मुर्गा च्वरे गे।।

फजलेक गौं मा भै बंधौं की पंचैत बैठि गे।
चरि चोरों थै ग्यारा सौ कू डांड भी पोडी गे।।

कुकर फुटण मा घ्यपळी काका कु भाग खुली गे।
ग्यारा सौ म घ्यपळी काका चार कुखडा ली ए।।

तबी बुनूंच "दर्शन "आज खैरि कमैक खै।
काणा की जोनि म जाण नथर भंडि खाण वलु नि ह्वै।

नाम,जगा अर घटना काल्पनिक छैं। कैसे कैकु क्वी संबंध नीछ।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 31/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
September 1 at 11:03am

घंघतोळ

घंघतोळ म छौं
कै ख्वाळ जि जौं?
द्वी ख्वाळ छन
अपणि हि मौ
तौं कु आपस म
नि हूंदु निभौ।

सालौं बिटे
तौंकु पणसरू
पैलि कैका घौर जौं
क्य जि करू?

दिन रातौ
तौं कु घपर~वळु
ये असमंजस से
मि कनक्वै कि बचु।

एक बाबु ददा कि औलाद
क्यांल योंकि मति म्वार
कै कि सला यि नि मन्दा
अपणि अकड़
जम्म नि छ~वडदा।
तुमी बथावा
अब क्य करू
थैला से बिड~या
यु असमंजस होणु
मीम घरू।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रखडी (राखी) कु त्योहार नजदीक च। जौं कि भैणि या भाई नि ह्वाला, वूं थैं कनु लगदु होलु। --------------------------------------------------

कनू छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भैणी नि देई।।
कनु छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भाई नि द्याई।।

एक भैणी मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
एक भाई मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।

जौं भयों कि भैणि ह्वैलि रखडी पैराला।
बिना भैणि वळा छ्वारा प्यटा प्यटि र्वाला।।
जौं भैण्यू का भाई ह्वाला रखडी पैराली।
बिना भायों वळी छे्वरी प्यटा प्यटी र्वेली।।

त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाला।
आंख्यू का कूणू मा छ्वारा आंसू लुकाला।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाली।
आंख्यू का कूणू मा छ्वेरी आंसू लुकाली।।

दगड्या भग्यान म्यारा रखडी पैराला।
अपणी भैण्यू का हथौं खटी मीठि खाला।।
दगड्या भग्यान मेरी रखडी पैराली।
अपणा भयों थै टीका पिठैई लगाली।।

त्योहार कू भैणी नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
त्योहार कू भाई नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।

निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालि भैणि, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालु भाई, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।

ऐंसु की रखडी,देवी तु ह्वै जैई दैणी।
भैण्यू थै तु भाई देई,भायों थैई भैणी।।
ऐंसु की रखडी, देवी................

सर्वाधिकार
सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई
दिनांक 25/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
August 22

पदनु कु थाड़ मा कछडी लगीं छाई।
जनि मि पौंछु त एकल पूछ,
भाई आज पंद्रा अगस्त छाई।।
मिल ब्वाल -छाई क्या छैंच।
रात तकि चलणी लग्यूं च।।
इथगा मा एक भै कुर्सि लि आई,
ब्वाल -सरकार यखम बैठो।
जरा एक बात बताओ।।
आज त कुछ मिलुणु छाई।
ब्वलद ई कुर्सि मा बिठै द्याई।।
कुर्सि मा बैठदी मेरि गैत बर्र बर्रा ग्याई।
सरकारकु सर्या भा मिफर ऐ ग्याई।।
मिल ब्वाल बोलो -क्या चैणू छाई।
बल पोरु बिटि अकौंट ख्वल्यूं छाई।।
रुप्या मीलला इनु सारु लग्यां छाई।
जु पल्ला मा छाई वूंल अकौंट खोलि द्याई।।
मिल ब्वाल आला, जरूर आला।
ऐंसु ना त भ्वाळ त जरूर आला।।
बलकन रुप्या तआ ही ग्या छाई।
तबरि त स्यु बसगाल लगि ग्याई।।
काळु बसगाळ मा बड़ि बड़ि गाड़ी
मोटर बोगि गैं।
रुप्या भि जख बिटि आणां छाई,
उनै खुणी उडै गैं।।
खुशि से पंद्रा अगस्त मनाओ।
तीन दा जोर से नारू लगाओ।।
भा ss र sssssत माता की।
इन्कला sssssssssssब।।
लोग नारू लगाणा छाई,
मि प्याट ही प्याट स्वचणू छाई।
मि भि कथगा मजबूर छाई,
किलैकि वैबत मि सरकार छाई।।

सर्वाधिक सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत पडखंडाई : दिनांक :-22/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dinesh Dhyani
August 20

. सीख
ब्यटा मि त्वैम कुछ बुन्न चांदु छाई
पण क्य ब्वन, छन्द हि नि आई
कबि त्वै थैं किताबौं म
कबि कम्प्यूटर परै व्यस्त पाई
म्यर मन को उमाळ
मन मा हि रैग्याई।
ब्यटा तु ता जण्दु छै
हम गरीब घरौं का मनखि छां
बाळपन म हमुन अक्वै कि पैरणु अर
छक्वै कि गफ~फा तक नि पाई।
वो त पितरौं कि कृपा से
अमणि हम्हरू बगत एै ग्याई
पण या ब्यटा बित्यां दिनौं थैं
कनक्वै बिसरणाई?
वनु बि बुल्दन कि जो
अपणु टैम बिसरि ग्याई
वो मनखि कि क्य ह~वाई?
ब्यटा इनै सूण
तु परिवारौ सौब से ठुल्लु छै
त्वै पैथर सैर परिवारौं जिम्मेदारि चा
अरे हम्हरू क्य भर~वसु
अमणि छां भौळ क्य ह~वा
अछांदु घाम क्य भर~वसु चा
कब अछै जा।
इलै बुनौं छौं
भै, बैंणा, घर परिवार
अपण्य पर~यो कि जिम्मेदारि
हूण खाण कि हो"िायारी
सीखि ल्हेदि अपणि जिम्मेदारि।
ब्यटा अब वन्नु बगत रि रैग्या
जब लाटा-कालौं न बि
अपणु टैम निकाळि द~या
अरे ये जमन म ता
सपन अर चालाक मनखि बि
नि खै सकणां त ब्यटा
हम्हरि क्या बिसात चा?
ब्यटा बुल्दन
अळग खुटौं कि हिटै भलि नि होंदि
अपणु परिवे"ा अर बिस्तार से
भैनै जैकि टपोस क्य काई
वै मनखि कि क्वी गत नि ह~वाई।
ब्यटा हम ता भंया का मनखि छां
इलै बुनौं छौं डाळौं मा छ~वीं नि लगा
अरे हवा म कबि बणां छन कैका महल?
अपणु विस्तार देखि छ~वीं लगा
अरे~ थामि ल्हेकि सरकारौं टंगडु
नौकरि छ~वटि चा ता क्या ह~वाई
जरा-जरा कै कि हि मनख्योंन
उन्नति काई।
ब्यटा पैलि अक्वै कि
अपणु खुटु त जमादि
मेरि बात मानि जादि
यनु गिच्चु नि मड़कादि
अरै पैलि त त्यारू बुबा छौं
नथर उमरौ लिहाज त खादि
जरसि थौ खा दि
भंया देखि हिटदि
असमानई असमान
नजर नि लगा
ब्यटा म्यरू ब्वल्यूं मानि जादि
जमनु अर अपणु विस्तार देखि
स्वीणा देखिदि
जैन यों बथौं का संज्ञान ल्याई
वै न हि दुन्य म अपणु
मुकाम बणाई।।
मेरी औण वळि गढवळि कविता संगzह धारवोर-धारपोर म बिटे एक कविता।
20/8/15.
aabhar.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Darshan Singh
August 17 · Edited

दगड्याें एक हैंस्वाड कविता भ्यजणू छौं।
आप ल्वखु थैं हैंसिसि ऐलि त धन्य समझुलु।

"जागरु मा रेलगाड़ी "

यीं ही हुडकि मा जागर लगणा छाई।
बडु गौं की बात छाई,
जागर थाड मा ना फांग मा लगणा छाई।
जगरी ल सब्यी द्यबता नचै की,
ब्वाल -जजमान जी ह्वैग्याई?
इथगा मा कुतग्यों की अवाज आई,
न न ना रेलगाड़ी त अजि रै ग्याई।
वु तीस पैंतीस खड़ा ह्वैकि,
कट्ठा नचदा छाई।
सैब सुणदरौं का तीन,
फ्यारा फिरांदा छाई।।
जगरी ल भि मुंड फर हाथ लगाई।
जनु वैसे भौत बडि गल्ति ह्वैग्याई।।
जगरी ल हाथ जोड़िकि हुडकि उठाई।
धौं धौं धौं छुक छुक छुक थाप लगाई।।
जगरी धौं धौं धौं छुक छुक छुक बजाणू छाई।
रेलगाड़ी का एक एक डब्बा ज्वणीणा छाई।।
पैलु फ्यारा त ठिक ठाक ह्वैग्याई।
दुसुरु फ्यारा मा एक डब्बा गोल ह्वैग्याई।।
गारड वलु डब्बा दौडिक अगनै आई।
ब्वाल बंद करा जागर,
नुकसान ह्वैग्याई।
सब्यों ल हाथ जोड़िकि पूछ-
परमेश्वरा बता क्या ह्वाई?
ब्वाल एक डब्बा ताळ,
कंडळि कु बुज्या पोडि ग्याई।।
वख स्याल विअयूं छाई,
वैल रेलकु डब्बा गंमजै द्याई।
रेलगाड़ी भि एक झटका मा,
खडि ह्वै ग्याई।
अब रेलगाड़ी कु नचुणु भि,
बंद ह्वै ग्याई।।

सर्वाधिक सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 17/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 धार मां कु गेणुं पार देख ऐ गे

धार मां कु गेणुं पार देख ऐ गे.... ग्वैर चली गेनी तू याखुली रे गे...
ओ ए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे-ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे..
धार मा कु गेणु पार देख ऐ गे, ग्वैर चली गेनी तू याखुली रे गे..
ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे-ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे

जागि जा रे ग्यैल्या- मि ना छोड़ी जै, जागि जा रे ग्यैल्या- मि ना छोड़ी जै...

सेरा बोण हेरी गौरु नि मिलीनि, हाथ खुट्युं म्यारा कांडा बैठी गे नि.. २
कख जू खुज्योलू रात पोड़ी गे, जागी जा रे ग्येल्या- मि ना छोड़ी जै...
ओ ए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे-ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे..

दगड़ा का छोरो न गोरु चरेनी, तिन डाल्यूं मां भमोरा बुखैनी.. २
गोरु नि देखि नि छेलु बैठीं रे, ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे...
जागी जा रे ग्येल्या- मि ना छोड़ी जै, जागी जा रे ग्येल्या- मि ना छोड़ी जै...

गौरु नि मिलला मिन घोर नी आंण, सेसुरियों तै मुख कनु के दिखाण.. २
जा तू जा रे ग्येल्या मी तैं छोड़ी दे, लछि मोरी ग्याई डेरा बोली दे.. .
ओ ए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे-ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे...

ना रो लछि त्यारा गौरु चलि गे नी, ग्वैरू छोरों न डेरा हके ऐ नी.. २
तू त खेलूँ मा मौरन बैठी गे,ओए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे...

जागी जा रे ग्येल्या- मि ना छोड़ी जै.
ओ ए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे...
जागी जा रे ग्येल्या- मि ना छोड़ी जै.
ओ ए लछि घोर रुमुक पोड़ि गे...
धार मां कु गेणुं पार देख ऐ गे

.....कण लाग जी आप थे जरूर बतवा जी
उत्तराखंडी गीत अनुवाद किया है उत्तराखंडी भाषा को बढ़वा देने के लिये
उत्तराखंड मनोरंजन अनुवाद किया है उत्तराखंडी भाषा को बढ़वा देने के लिये
बालकृष्ण डी ध्यानी
-देवभूमि बद्री-केदारनाथ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
September 29 at 3:32pm · Edited ·

श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015